CRPF: जांबाज शहीद कमांडर भालेराव की पत्नी का निधन, अब परिवार में बची आठ वर्षीय बेटी, सीआरपीएफ पर टिकीं निगाहें
CRPF: सीआरपीएफ में भालेराव के साथियों का कहना है कि अब परिवार में उनकी बेटी वेदांगी बची है। भालेराव को इंटरनल सिक्योरिटी अकादमी में उसे 'बेस्ट ट्रेनी इन आउटडोर सब्जेक्ट', का सम्मान मिला था। सहयोगी रहे अधिकारियों का कहना है कि संकट की इस घड़ी में सीआरपीएफ द्वारा उनकी बेटी को फैमिली पेंशन दी जानी चाहिए...
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बेटी को सीआरपीएफ से मिले फैमिली पेंशन
सीआरपीएफ में भालेराव के साथियों का कहना है कि अब परिवार में उनकी बेटी वेदांगी बची है। भालेराव के पिता का 1994 में निधन हो गया था। उनके बड़े भाई अमोल और छोटे भाई सुयोग, दोनों टीचर हैं। नितिन की शहादत के बाद उनका परिवार बड़ी मुश्किल से सामान्य अवस्था में आया था। अब 11 फरवरी को नितिन भालेराव की पत्नी रश्मि का भी निधन हो गया है। वेदांगी, नासिक के ही एक स्कूल में तीसरी कक्षा की छात्रा है। नितिन, सीआरपीएफ का जांबाज ग्राउंड कमांडर था। अखिल भारतीय पुलिस कमांडो मुकाबले में उसने सीआरपीएफ दल का नेतृत्व किया था। इंटरनल सिक्योरिटी अकादमी में उसे 'बेस्ट ट्रेनी इन आउटडोर सब्जेक्ट', का सम्मान मिला था। नितिन के सहयोगी रहे अधिकारियों का कहना है कि संकट की इस घड़ी में सीआरपीएफ द्वारा उनकी बेटी को फैमिली पेंशन दी जानी चाहिए।
कोबरा ने नक्सलियों के घर में घुसकर ललकारा था
नक्सलियों का गढ़ रहे मिनपा में कैंप लगाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ था। वहां एक बड़ी मुठभेड़ हुई थी, जिसमें डीआरजी के 17 जवान शहीद हुए थे। तीन नक्सली भी मारे गए थे। नक्सली, हमले के बाद एके-47 जैसी 15 बदूंकें और जवानों के पास मौजूद वायरलैस उपकरण आदि लूट कर भाग गए थे। डीआरजी के करीब आठ हजार जवान नक्सलियों के इस गढ़ में कैंप लगाने का प्रयास कर चुके थे, लेकिन सफलता नहीं मिली। दस साल से वहां कैंप स्थापित करने की कोशिशें चल रही थी। सीआरपीएफ की कोबरा इकाई ने यहां कैंप लगाने के लिए कदम आगे बढ़ाए। कोबरा ने नक्सलियों के इस गढ़ में भीतर घुस कर उन्हें ललकारा। नितिन पी भालेराव की टीम भी उसी ओर बढ़ रही थी। कोबरा दस्ते में कुल छह टीमें बनाई गई थीं। डी 206 से तीन टीमें 10, 11 व 12 गठित की गई, जबकि कोबरा 206ए से 1, 2 व 3 टीम बनी थी। कोबरा डी की टीमों की कमान चीता गणेश वलुंज के हाथ में थी, जबकि कोबरा 206ए टीमों की कमान पंथेर रमेश यादव को सौंपी गई। टू आईसी दिनेश कुमार सिंह इस ऑपरेशन को ओवरऑल कमांड कर रहे थे। उनके साथ असिस्टेंट कमांडेंट नितिन भालेराव भी थे।
घायल हुए, मगर हथियार नहीं छोड़े
चूंकि उस वक्त रात थी, तो इन्हें बारूदी सुरंग का अंदाजा नहीं था। जिस जगह पर ये विस्फोट हुआ, वहां पहले से इस तरह की कोई संभावना नजर नहीं आई। विस्फोट के बाद दिनेश कुमार सिंह, नितिन भालेराव और सिपाही श्रीराम दूर जाकर गिरे। बारूदी सुरंग के विस्फोट में बुरी तरह से जख्मी होने के बावजूद उन्होंने अपने हथियार नहीं छोड़े। विस्फोट के तुरंत बाद नक्सलियों ने घात लगाकर हमला बोल दिया। इसका मतलब नक्सली केवल बारूदी सुरंग के विस्फोट तक सीमित नहीं थे, उन्होंने घायल जवानों पर हमला कर हथियार लूटने की योजना बना रखी थी। उसी के तहत नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। घायल होने के बाद भी इन तीनों ने उनकी फायरिंग का जवाब दिया। उन्हें अपने करीब नहीं आने दिया। कुछ ही देर में वहां दूसरी टीम भी पहुंच गई। उसके बाद नक्सलियों को वहां से खदेड़ दिया गया। इस हमले में नौ जवान घायल हो गए। नितिन भालेराव ने रायपुर के रामकृष्ण अस्पताल में दम तोड़ दिया था।