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गले के नीचे नहीं उतरता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ये तर्क

Sun, 16 Jul 2017 08:47 AM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Sun, 16 Jul 2017 08:47 AM IST
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controversy betweem bihar cm nitish kumar and lalu prasad yadav
nitish kumar

सुशासन बाबू के नाम से मशहूर बिहार के मुख्यमंत्री और जद(यू) अध्यक्ष नीतिश कुमार का भ्रष्टाचार या राजनीतिक विचारधारा के मामले में तर्क गले के नीचे नहीं उतरता। इससे जुड़े सवाल पर जद(यू) के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव और पार्टी के प्रवक्ता केसी त्यागी भी अपने होठ सिल लेते हैं।

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पार्टी के अंदरखाने में यह चर्चा आम है कि बिहार के मुख्यमंत्री और जद(यू) अध्यक्ष अपनी छवि और महत्वाकांक्षा के बीच में फंस गए हैं। एक वरिष्ठ सूत्र का भी मानना है कि कुछ तो वजह है जो लालू और नीतीश के बीच में संवाद कम हो गया है और इसकी कीमत महागठबंधन को चुकानी पड़ रही है।

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लालू -नीतिश का साथ

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lalu prasad yadav

लालू और नीतीश के पटना में कॉलेज के दिनों के साथी हैं। तब लालू छात्रनेता थे और जेपी आंदोलन से जुड़े थे। नीतीश भी लालू से छोटे नेता थे और वह भी इसी का हिस्सा थे, दोनों में निभती थी। लालू 1977 में  जनता दल के टिकट चुनाव लड़े, सांसद चुने गए।

जबकि इसी साल नीतीश कुमार जनता दल के टिकट से विधानसभा चुनाव हार गए। 1980 में लालू लोकसभा हार गए, लेकिन विधानसभा जीत गए। वहीं नीतीश फिर विधानसभा चुनाव हार गए। 1985 में लालू और नीतीश दोनों साथ-साथ बिहार विधानसभा में पहुंचे।

1989 में दोनों नेता चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे। इसके ठीक एक साल बाद 1990 में बिहार विधानसभा में जनता दल को स्पष्ट बहुमत मिलने पर लालू प्रसाद राज्य के मुख्यमंत्री बने। तब नीतीश कुमार लालू प्रसाद की आंखों के तारे कहे जाते थे।  

अलग हो गए लालू और नीतिश कुमार

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लालू प्रसाद यादव - फोटो : Self

क्रांतिकारी नेता जार्ज फर्नांडीज ने समता पार्टी का गठन किया। समता पार्टी ने भाजपा के साथ मिलकर राजनीतिक लड़ाई लडऩे का फैसला किया और तब नीतीश कुमार ने 1994 में लालू प्रसाद का साथ छोड़ दिया। जद(यू) के केसी त्यागी कहते हैं कि लालू और नीतीश के इस अलगाव का कारण लालू में बढ़ रहा अहंकार, व्यवहार में भारी बदलाव था। हालांकि केसी भी मानते हैं तब तक लालू बिगड़ नहीं थे।

तब तो नहीं था लालू पर आरोप
राजनीति के पंडित भी मानते हैं कि 1994  तक लालू प्रसाद पर कोई आरोप नहीं लगा था। बिहार की राजनीति को करीब से देखने वाले एक पूर्व राज्य कांग्रेस अध्यक्ष का कहना है कि 1994 में लालू बिहार में गरीबों, पिछड़ों के नेता के रूप में मशहूर हो चुके थे।

तब लालू सामाजिक न्याय दिलाने वाले राजनेता का राज्य में प्रतीक बन चुके थे। वह उन दिनों गरिबों, पिछड़े तबकों में आत्म सम्मान जगा रहे थे, राज्य का मुख्यमंत्री रहकर सामाजिक लड़ाई लड़ रहे थे। केसी त्यागी भी मानते हैं कि लालू तबतक सामाजिक चेतना फैलाने में लगे थे। उनपर कोई आरोप नहीं था। त्यागी कहते हैं कि 1995 के बाद लालू प्रसाद के ऊपर भ्रष्टाचार जैसे आरोप लगने की स्थिति आई।

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फिर भी अलग हो गए नीतिश कुमार

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nitish kumar

समाजवाद और सामाजिक बदलाव तथा कांग्रेस विरोध की राजनीति कर रहे नीतिश कुमार 1994 में लालू प्रसाद से अलग हो गए। नाता तोड़ लिया। नीतीश कुमार ने उस समता पार्टी के साथ रहना कुबूल किया जो सांप्रदायिक राजनीति का अगुआ बन रही भाजपा के साथ राजनीतिक गठजोड़ कर रही थी।

जबकि तब लालू प्रसाद के ऊपर भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं थे, राजनीति के कुछ पंडित इसे नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा से जोड़ते हैं, क्योंकि तबतक लालू बिहार की राजनीति के वटवृक्ष बन चुके थे और उनके नीचे रहकर दूसरे का स्वतंत्र विकास संभव नहीं था।

लालू प्रसाद से अलग होने के बाद नीतीश कुमार की बाद में राजनीति पूरी तरह के लालू के विरोध पर टिक गई। इसी बिना पर उन्होंने बाद में समता पार्टी और शरद यादव की जद(यू) के विलय का तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि यह जार्ज को काफी हद तक नागवार लग रहा था।

सजायाफ्ता लालू को गले लगाया

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nitish and lalu

समय ने फिर चाल बदली। 2015 में नीतीश कुमार ने रणनीतिकारों की सलाह पर महागठबंधन में शामिल होना स्वीकार कर लिया, जबकि इस गठबंधन में जनता दल परिवार की जन्मजात विरोधी कांग्रेस हिस्सेदार थी। लालू प्रसाद यादव भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जा चुके थे।

सजायाफ्ता कैदी थे। जमानत पर रिहा थे और देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा चुनाव लडऩे के अयोग्य करार दिए जा चुके थे। खास बात यह भी है कि यह महागठबंधन सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में आने की तर्ज पर रोकने(प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक रफ्तार पर लगाम कसने ) के लिए बना था।

यह भी जग जाहिर हो चुका था कि लालू के बिहार के माफिया शहाबुद्दीन समेत तमाम लोगों के साथ रिश्ते हैं। उन पर भ्रष्टाचार के अन्य मुकदमे अभी चल रहे हैं। इसके बाद जद(यू) के नेता और मुख्यमंत्री नीतिश कुमार को लालू प्रसाद यादव के साथ आने में कोई परेशानी नहीं हुई।

खूब हुई आंख मिचौली

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modi and nitish

राजनीति में सफलता पाने के लिए सब जायज है।  नीतिश कुमार और लालू प्रसाद की जोड़ी के साथ यह कहावत फिट बैठती है। नीतिश अल्पसंख्य हितों का ख्याल रखकर बयान देते रहे। जद(यू) राजनीतिक मोर्चा खोलती रही, लेकिन इसी के साथ मुख्यमंत्री नीतिश कुमार चाहे नोटबंदी हो या राष्ट्रपति का चुनाव या कुछ और अवसर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा भाजपा के सुर में सुर मिलाते रहे।

नीतिश कुमार के इस प्रयास को जब भाजपा के करीब जाते माना गया तो पार्टी  के प्रवक्ता केसी त्यागी भी लगातार बचाव करते दिखे। केसी त्यागी का हमेशा कहना रहा कि जिन मुद्दों को केन्द्र में रखकर नीतिश कुमार (जनता दल, यूनाइटेड)ने भाजपा (नरेन्द्र मोदी)से अलग होने का निर्णय लिया था,

उन स्थितियों में कोई बदलाव नहीं आया है। बल्कि हालात और जटिल हुए हैं। त्यागी का लगातार कहना रहा कि इसलिए भाजपा के साथ जद(यू ) के जाने का कोई सवाल ही नहीं है। लेकिन मौजूदा समय में तमाम सवालों पर केसी त्यागी भी हालात की गंभीरता देखकर चुप्पी साध लेते हैं।

अनुत्तरित सवाल

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tejasvi yadav

1. बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव कहते हैं कि उनपर जिस अनियमितता का आरोप लग रहा है, उससे उनका कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि तब वह अल्पवयस्क थे। सवाल यह है कि अल्पवयस्क का अभिभावक उसके माता पिता होते हैं। वह उसके जाने-अनजाने में उसके नाम से कहां-कहां निवेश करते हैं। क्या इसके लिए उस अल्पवयस्क को दोषी मान लिया जाए? फिर इसका अंदाजा नीतिश कुमार जैसे राजनीतिज्ञ को महागठबंधन बनते समय क्यों नहीं था? जद(यू) ऐसे सवाल को टाल जाता है।
2. उच्चतम न्यायालय द्वारा भ्रष्टाचार के  दोषी ठहराये गए, चुनाव लडऩे के और किसी संवैधानिक के अयोग्य करार दिए गए जमानत पर रिहा लालू प्रसाद यादव के प्रभुत्व वाली पार्टी के साथ जद(यू) ने क्यों  राजनीतिक गठजोड़ किया?
3. कांग्रेस पार्टी के प्रभुत्व वाली यूपीए-2 सरकार पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगे थे, उसके नेताओं को जेल तक जाना पड़ा और इसके बाद भी वह राजनीतिक दल महागठबंधन का हिस्सा बना?
4. महागठबंधन के दो घटक कांग्रेस और राजद एक लाइन पर चल रहे थे। ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री कई बार विरोधाभासी बयान क्यों देते नजर आए। जबकि देश में गोवध के नामपर अखलाक की हत्या, भीड़ द्वारा गोवंश वध के नाम पर लोगों की हत्या, सामाजिक, सांप्रदायिक तनाव के मुद्दे अधिक गंभीर रूप लेते गए?
5. क्या महागठबंधन टूटेगा, क्योंकि लालू प्रसाद यादव ने भी बिहार के उपमुख्यमंत्री और अपने पुत्र तेजस्वी यादव के इस्तीफा न देने की घोषणा कर दी है। यदि ऐसा हुआ तो क्या सत्ता में बने रहने के लिए जद(यू) फिर भाजपा से समर्थन लेगी या उसके साथ राजनीतिक गठबंधन करेगी?

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