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राजनीति के बुरे दौर से गुजर रहे हैं शरद यादव

Sun, 16 Jul 2017 12:23 AM IST
शशिधर पाठक , नई दिल्ली
शशिधर पाठक , नई दिल्ली Updated Sun, 16 Jul 2017 12:23 AM IST
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sharad yadav is facing problem in indian politics
sharad yadav

राजनीति में जनता दल परिवार के हिमायती शरद यादव अपनी पार्टी में  सजावटी तस्वीर भर बनकर रह गए हैं। जद(यू) के पूर्व अध्यक्ष जहां बिहार में महागठबंधन को बचाये रखने की आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं, वहीं सूत्र बताते हैं कि सुशासन बाबू की छवि के बरअक्स मुख्यमंत्री नीतिश कुमार किसी को घास डालने तक के लिए तैयार नहीं हैं।

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इस स्थिति से शरद यादव की तिलमिलाहट काफी बढ़ा दी है। शरद यादव से जब महागठबंधन के बाबत पूछा गया तो उन्होंने दो टूक कहा कि महागठबंधन है, था और रहेगा। इसके बारे में वह इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकते। पटना में राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने भी स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी सरकार में रहे या न रहे लेकिन महागठबंधन के लिए उनकी पार्टी कोई खतरा नहीं है।
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लालू प्रसाद ने इसके साथ यह भी स्पष्ट कर दिया कि राज्य के उपमुख्यमंत्री और उनके पुत्र तेजस्वी यादव इस्तीफा नहीं देंगे। जिसे जो कार्रवाई करनी होगी करे। वहीं नीतिश कुमार ने भी स्थिति की गंभीरता को देखते हुए विधायक दल की बैठक बुलाई है। माना यह जा रहा है कि लगातार महागठबंधन की वकालत कर रहे शरद यादव के लिए यह परीक्षा की घड़ी है।

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जनता दल परिवार को एक करने की थी मुहिम

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फाइल फोटो

शरद यादव के एक करीबी सूत्र के अनुसार शरद यादव की नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव से बराबर बात हो रही है। वह जद(यू) और राजद के कई अन्य नेताओं के भी संपर्क में हैं। शररद यादव चाहते हैं कि किसी तरह से यह गतिरोध दूर हो जाए, लेकिन अंदरखाने से खबर है कि खुद नीतिश कुमार ही उन्हें अधिक भाव नहीं दे रहे हैं।

वह पार्टी के पूर्व अध्यक्ष, राज्यसभा सांसद और सम्मानित राजनीतिज्ञ भर होकर रह गए हैं। शरद यादव जनता दल परिवार को एकजुट देखना चाहते हैं। इसके लिए वह पिछले कुछ सालों से लगातार सक्रिय हैं। बताते हैं महागठबंधन बनने की पृष्ठभूमि में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

राय भी जुदा-जुदा

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मुलायम सिंह यादव

इसमें और दलों को जोडऩे के लिए वह राष्ट्रीय लोकदल के प्रमुख चौधरी अजीत सिंह, इनेलो के ओम प्रकाश चौटाला, अभय चौटाला, समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव समेत अन्य के संपर्क में थे।  2017 में उ.प्र. के विधानसभा चुनाव में भी वह जनता दल परिवार की एकता देखना चाहते थे। ताकि सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में आने से रोका जा सके, लेकिन सफल नहीं हो पाए।

नीतिश कुमार और शरद यादव की राय भी मेल नहीं खाती। वहीं पार्टी के प्रवक्ता केसी त्यागी और नीतिश कुमार की राय में फर्क नहीं होता। त्यागी पूरी तरह से नीतिश कुमार की वकालत करते हैं। नोटबंदी के दौरान भी नीतिश कुमार और शरद यादव की राय जुदा-जुदा थी।

ताजा प्रकरण में विरोधाभास साफ है। इससे पहले भी कई बार ऐसे अवसर आए जब नीतिश कुमार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों का समर्थन करते रहे और शरद यादव की लाइन इससे जुदा रही।

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