बेरोजगारी दर आठ फीसदी के पार: ग्रामीण क्षेत्रों में नौकरी मांगने वालों की फौज बढ़ाएगी भाजपा का संकट
पांच राज्यों में चल रहे चुनावों में उत्तराखंड, गोवा और पंजाब के चुनाव संपन्न हो चुके हें, जबकि उत्तर प्रदेश और मणिपुर में इस समय भी चुनाव चल रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी दर 3.0 फीसदी है, जिसे राष्ट्रीय औसत को देखते हुए काफी संतोषजनक कहा जा सकता है। उत्तराखंड में बेरोजगारी दर 3.5 फीसदी, पंजाब में 9.0 फीसदी और गोवा में 11.6 फीसदी रिकॉर्ड की गई है...
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भाजपा ने पूरे चुनाव को ‘राष्ट्रवाद और हिंदुत्व’ के मुद्दे के आसपास केंद्रित करने का प्रयास किया है, जबकि विपक्ष उसे युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, नौकरियों के अवसरों में हो रही कमी और बढ़ती महंगाई के मुद्दों पर घेरने का प्रयास किया है। सरकार के लिए महंगाई और बेरोजगारी दोनों ही मोर्चों पर बुरी खबर है। यूक्रेन-रूस संकट के कारण क्रूड तेल कीमतों में हो रही रिकॉर्ड बढ़ोतरी से महंगाई के बेलगाम होने का खतरा मंडरा रहा है, तो इसी बीच फरवरी माह में राष्ट्रीय बेरोजगारी दर बढ़कर 8.1 फीसदी हो गई है। ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी दर का बढ़ना सरकार के लिए संकट का कारण बन गया है। चूंकि उत्तर प्रदेश में छठें और सातवें चरण का चुनाव होना बाकी है जो पूरी तरह अवध-पूर्वांचल के ग्रामीण इलाके ही हैं, सरकार को इन क्षेत्रों में अतिरिक्त परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, सरकार के लिए राहत की खबर जरूर हो सकती है कि उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी दर केवल तीन फीसदी ही दर्ज की गई है।
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आंकड़ों के अनुसार फरवरी माह के अंत में देश में बेरोजगारी दर बढ़कर 8.1 फीसदी हो गई है। शहरी क्षेत्रों की बेरोजगारी दर 7.6 फीसदी तो ग्रामीण क्षेत्रों में 8.3 फीसदी हो गई है। ग्रामीण इलाकों में इस समय खेती के कामकाज बहुत तेजी से चल रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी का बढ़ना सरकार के लिए चिंता का विषय है।
पिछले वर्ष पूरे विश्व के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था पर कोरोना का गंभीर साया भी मंडरा रहा था। इसके बाद भी फरवरी 2021 में राष्ट्रीय बेरोजगारी दर 6.89 फीसदी पर ही सीमित थी। इस वर्ष जबकि कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर अपने खात्मे की ओर है, पूरे देश में कोरोना संक्रमण बहुत कम हो चुका है और सभी सेक्टर पूरी तरह खोले जा चुके हैं, बेरोजगारी दर 8.1 फीसदी पर पहुंच गई है। इससे रोजगार-अर्थव्यवस्था के सरकार के आंकडों पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
इसके पूर्व बेरोजगारी दर मई 2021 में 11.84 फीसदी, जून 2021 में 9.17 फीसदी और अगस्त 2021 में 8.32 फीसदी थी। इसके बाद से बेरोजगारी दर आठ फीसदी से कम पर ही बनी हुई थी, लेकिन इस समय जबकि सरकार उत्पादन और निर्यात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी का दावा कर रही है, बेरोजगारी दर का बढ़ना सरकारी दावों की पोल खोलते हैं।
यदि ग्रामीण बेरोजगारी दर की बात करें तो भी पिछले एक साल में यह मई 2021 में सर्वाधिक 10.55 फीसदी पर थी। इसके बाद ग्रामीण बेरोजगारी में राष्ट्रीय स्तर पर गिरावट आनी शुरू हुई और जून 2021 में 8.75 फीसदी रहने के बाद यह लगातार आठ फीसदी से कम के स्तर पर बनी रही। बीते जनवरी माह में ही यह 5.84 फीसदी तक आ गई थी। लेकिन अचानक फरवरी माह में ही इसके आठ फीसदी से ऊपर चले जाने को रोजगार के मोर्चे पर गंभीर संकट के रूप में देखा जा रहा है।
चुनावी राज्य में बेरोजगारी
पांच राज्यों में चल रहे चुनावों में उत्तराखंड, गोवा और पंजाब के चुनाव संपन्न हो चुके हें, जबकि उत्तर प्रदेश और मणिपुर में इस समय भी चुनाव चल रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी दर 3.0 फीसदी है, जिसे राष्ट्रीय औसत को देखते हुए काफी संतोषजनक कहा जा सकता है। उत्तराखंड में बेरोजगारी दर 3.5 फीसदी, पंजाब में 9.0 फीसदी और गोवा में 11.6 फीसदी रिकॉर्ड की गई है।
सबसे ज्यादा बेरोजगारी वाले राज्यों में हरियाणा 23.4 फीसदी, राजस्थान 18.90 फीसदी, त्रिपुरा 17.1 फीसदी, जम्मू-कश्मीर 15 फीसदी, हिमाचल प्रदेश 13.9 फीसदी, बिहार 13.3 फीसदी और देश की राजधानी दिल्ली में 11.6 फीसदी है। पूर्वोत्तर और उत्तर-पूर्वी राज्यों में बेरोजगारी दर सबसे कम है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
आर्थिक मामलों के जानकार डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा ने अमर उजाला को बताया कि खेती में कामकाज के सीजन में बेरोजगारी का बढ़ना चिंताजनक है। यह साबित करता है कि इस सीजन में भी लोगों को अपेक्षित काम नहीं मिल रहा है। इससे सरकार को ग्रामीण इलाकों में चल रही राशन योजना सहित अन्य कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। यदि यूक्रेन-रूस संकट बढ़ता है तो इससे केवल यूरोप ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से भी उत्पादन प्रभावित होगा। इससे भी बेरोजगारी दर में वृद्धि हो सकती है।
सरकार के लिए दोहरे मोर्चे पर संकट बढ़ेगा। एक तरफ तो उसके पास स्वयं भी आर्थिक दबाव है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से उसे आयात खर्च बढ़ाना होगा। वहीं, तेल कीमतें बढ़ने से उत्पादन प्रभावित होगा जिससे बेरोजगारी बढ़ेगी। बेरोजगार लोगों के लिए राशन उपलब्ध कराना और कल्याणकारी योजनाओं को जारी रखना अतिरिक्त संकट का कारण बनेगा। यदि विश्व बाजार तेल कीमतों को संभालने में सफल नहीं होता तो यह बड़ी चुनौती साबित होगा।