फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   China moving like a chess horse, will really back off from Pangong Tso

शतरंज के घोड़े की तरह चाल चल रहा चीन, क्या वाकई पैगांग त्सो से पीछे हटेगा?

Tue, 23 Jun 2020 08:36 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 23 Jun 2020 08:36 PM IST
सार

  • ढाई कदम आगे चलने के बाद दो कदम पीछे चलना चीन की आदत, रणनीति
  • पैगोंग त्सो झील के पास 8 किमी की लंबाई में बनाए हैं बंकर
  • चीन यहां से पीछे हटने का इच्छुक नहीं, बातचीत से भी करता है इंकार

विज्ञापन
China moving like a chess horse, will really back off from Pangong Tso
पैंगोंग झील - फोटो : For Refernce Only

विस्तार

गलवां नदी घाटी में 15 जून को पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 पर भारत-चीन सैनिकों की 8 घंटे की हिंसक झड़प के 7 दिन बाद अच्छी खबर आई है। भारतीय सेना ने कहा है कि चीन और भारत के बीच में तनाव कम करने पर सहमति बनी है।

विज्ञापन


सैन्य कमांडरों की सोमवार को बैठक सौहार्दपूर्ण, सकारात्मक और रचनात्मक माहौल में हुई है। दोनों देशों की सेनाओं ने पीछे हटने के लिए सहमति जताई है। हालांकि भारतीय सेना ने अभी इसका ब्यौरा नहीं दिया है कि किन-किन क्षेत्रों से भारत और चीन की सेनाओं के पीछे हटने पर सहमति बनी है।
विज्ञापन


सेना ने इतना जरूर कहा है कि सैन्य कमांडरों, अधिकारियों के बीच आगे चर्चा जारी रहेगी।

क्या है संभावना?

चीन ने लद्दाख के कई इलाकों में घुसपैठ की है। उसने डेपसांग में भी दावा ठोका है। गलवां नदी घाटी क्षेत्र को भी अपना बता दिया था। पैगांग त्सो झील क्षेत्र की आठ किमी की लंबाई में उसने मई 2020 से अबतक सैन्य संरचना, बंकर आदि बना लिए हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन


सामरिक दृष्टि से भारत के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण है। यहां से दौलत बेग ओल्डी हवाई पट्टी समेत अन्य पर सीधी नजर रखी जा सकती है। सैन्य सूत्र बताते हैं कि फिंगर 4 से आठ तक भारतीय सुरक्षा बलों को गश्त के लिए न जाने देना, गोगरा पोस्ट-हॉट स्प्रिंग इलाके को भी चीनी क्षेत्र में बताना, यह सब चीन के नए दावे हैं।

इस तरह से भारत के हिस्से की कोई 60 वर्ग किमी जमीन चीन ने अपने कब्जे में ले ली है और इसी को लेकर तनाव की स्थिति है।

समझा जा रहा है कि चीन ने गलवां नदी घाटी के पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 क्षेत्र से अपने सैनिकों को पीछे ले जाने पर सहमति जताई होगी। इस क्षेत्र से भारत ने भी अपने सैनिकों को कुछ पीछे आने पर अपनी रजामंदी दी होगी। डेपसांग समेत कुछ अन्य क्षेत्रों से भी उसने सैनिकों को भारत के साथ पीछे हटने का भरोसा दिया होगा।

लेकिन शतरंजी घोड़े की चाल वाले चीन पर भरोसा मुश्किल

डोकलाम के 73 दिन के भारत-चीन सैनिकों की तानातनी याद कीजिए। चीन की सेना 200 मीटर पीछे हटी और फिर 100 मीटर आगे आ गई। सामरिक रणनीतिकारों का कहना है कि चीन 1962 से इसी तरह की रणनीति पर चला है।

उसकी चाल पूरी सतरंजी घोड़े जैसी है। चीन रणनीतिक रूप से पहले थोड़ा फौज को पीछे ले जाने पर सहमति जताता है और बाद में अवसर देखकर धीर-धीरे आगे बढ़कर सहमति और समझौते को तोड़ देता है।

भारतीय सेना से 2019 में सेवानिवृत्त हुए सैन्य अधिकारी के अनुसार पैगांग में चीन ने काफी मजबूत उपस्थिति दर्ज कर ली है। वहां से वह पीछे नहीं हटना चाहता। लेकिन फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है।

हालांकि पूर्व सैन्य अफसर का कहना है कि भारतीय सैन्य अधिकारी बहुत अच्छी रणनीति के साथ काम कर रहे हैं। इसके आगे चीन का झुकना उसकी मजबूरी बन सकती है।

सूत्र का कहना है कि चीन की सेना का पीछे हटना प्रक्रिया के तहत समय ले सकता है, क्योंकि वह भारतीय क्षेत्र में तोप, भारी वाहन समेत काफी बड़ा लाव लस्कर लेकर घुस आए हैं।

15 जून की घटना का पड़ेगा दूरगामी असर

रक्षा और विदेश मामलों के वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार भी 15 जून को दोनों देशों के सैनिकों की हिंसक झड़प और उसके बाद की स्थिति को काफी गंभीर मानते हैं। पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव इस घटना के बाद रिश्ते के 60-70 के दशक में पहुंच जाने की संज्ञा देती हैं।

एक अन्य पूर्व विदेश सचिव शशांक का भी मानना है कि कहीं न कहीं भारतीय पक्ष से चूक हुई है। चीन ने उसका बड़ा फायदा उठाया, धोखा देने में सफल रहा। लेकिन इस बार जो उसने किया है, उससे भरोसा खोया है।

वायुसेना के पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह का कहना है कि कमांडिंग आफिसर सहित 20 भारतीय सैनिकों की शहादत कोई मामूली बात नहीं है। अब यह जख्म तो हमेशा याद रहेगा।

विदेश सचिव एस जयशंकर ने भी अपने समकक्ष वांग यी से 17 जून को हुई बातचीत में भी 15 जून की घटना को दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्ते पर बड़ा असर डालने वाला बताया था।  

चीन सीमा पर पुनरावृत्ति का अवसर नहीं दे सकता भारत

पूर्व वायुसेनाध्यक्ष एयरचीफ मार्शल पीवी नाइक कहते हैं भारत-चीन सीमा पर हमेशा सतर्क रहने की जरूरत है। पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह का कहना है कि इससे निश्चित रूप से भारत ने सबक लिया है।

इसलिए अब वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएएसी) पर स्थायी तौर पर सुरक्षा, निगरानी तथा सैन्य संरचना के उपाय करने होंगे। एनबी सिंह ने केन्द्र सरकार के सीमा पर अवसंरचना विकास के कदम को सही बताया और कहा कि इसमें तेजी लाने की जरूरत है।

मेजर जनरल (पूर्व) लखविंदर सिंह का कहना है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास चुनौतियों को ध्यान में रखकर इफैंट्री, आर्टिलरी समेत अन्य तैयारियों को दुरुस्त करना होगा।

नियमित निगरानी के उपकरणों आदि पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि इस घटना से साफ है कि चीन की मंशा ठीक नहीं है।

एनबी सिंह कहते हैं कि पिछले दो दशकों से चीन की घुसपैठ बढ़ी है। पिछले पांच-छह सालों से घुसपैठ में आक्रमता के लक्षण देखने को मिले, लेकिन 2017 में डोकलाम में भूटान सीमा तक चीन की फौज के आने के बाद से घुसपैठ टकराव का रूप ले रही है।



पिछले एक महीने के भीतर भारत और चीन की फौज के बीच तीन बार (पांच मई को लद्दाख, 9 मई को नाकु ला, 15 जून को पेट्रोलिंग प्वाइंट 14) पर हिंसक झड़प हो चुकी है।

इससे साफ है कि अब चीन अपना रवैया तेजी से बदल रहा है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed