रक्षा पर भारत से चार गुना ज्यादा खर्च करता है चीन, अमेरिका है सबसे आगे: रिपोर्ट
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चीन अपने रक्षा पर भारत से चार गुना ज्यादा खर्च करता है। चीन सेना पर राजस्व की एक बहुत बड़ी राशि खर्च करता है और उन्हें पेंशन भी देता है। अमेरिका दुनिया का पहला देश है जो रक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च करता है। उसका रक्षा बजट आठ देशों के रक्षा बजट के बराबर है।
यह ताजा आंकड़े वैश्विक थिंक टैंक स्टॉकहोल्म इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) ने जारी किए हैं। इसमें दिखाया गया है कि विश्व भर में सैन्य खर्च 2018 में 2.6 प्रतिशत बढ़कर एक लाख 80 हजार करोड़ डॉलर हो गया है।
रिपोर्ट का कहना है, '2018 में रक्षा पर खर्च करने वाले देशों में 649 अरब डॉलर (करीब 45 लाख करोड़ रुपये) के साथ पहले नंबर पर अमेरिका है। 177.61 अरब डॉलर (करीब 12.5 लाख करोड़ रुपये) के साथ चीन दूसरे नंबर है।
चीन के रक्षा खर्च में भी साल 2009 से 83 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। सैन्य खर्च के मामले में चीन, सऊदी अरब और भारत से आगे है। जबकि भारत का रक्षा बजट 3.18 लाख करोड़ रुपये है। इस दौरान रूस के रक्षा खर्च में कमी दर्ज की गई है। साल 2016 से उसके रक्षा खर्च में गिरावट आ रही है।
एसआईपीआरआई ने ज्यादा विवरण नहीं दिए हैं। भारत द्वारा रक्षा पर खर्च होने वाले 66.5 बिलियन यानी 4.6 लाख करोड़ में रक्षा पेंशन भी शामिल है जो इसका एक चौथाई हिस्सा है। बची हुई एक तिहाई राशि में रोजाना का खर्च, तनख्वाह और 15 लाख सुरक्षाबलों को मेंटेन किया जाता है।
सेना को आधुनिक बनाने और उन्हें नए हथियार देने में 4.6 लाख करोड़ का केवल एक चौथाई हिस्सा खर्च किया जाता है। ऐसे में भारत बेशक रूस को पीछे छोड़कर दुनिया में रक्षा पर खर्च करने वाला चौथा देश है इसके बावजूद हमारी सेना के पास कई चीजों की कमी है। जिसमें लड़ाकू विमान, पनडुब्बियों से लेकर बुनियादी इंफेंट्री हथियार और रात में लड़ने की काबिलियत शामिल हैं।
रक्षा के अंदरुनी सूत्रों का कहना है कि भारतीय सुरक्षाबलों को अपने गैर परिचालन फ्लैब और मैनपावर को कम करने की जरूरत है। खासतौर से 12 लाख सेना में। साथ ही बड़े पैमाने पर वास्तविक एकीकरण किया जाना चाहिए। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'यह पर्याप्त राशि नहीं है। केंद्र सरकार द्वारा आवंटित कुल बजट में रक्षा को केवल 32-33 प्रतिशत ही मिलता है। लंबे समय तक चलने वाले हथियारों की योजना और प्राथमिकता के आधार के बिना विदेश से भारी मात्रा में हथियार खरीदना हमेशा नहीं चल सकता है।'
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