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चंद्रयान-3: सफल हुआ तो चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग वाला चौथा देश बनेगा भारत, अब तक यही कर पाए हैं कारनामा

Fri, 18 Aug 2023 06:10 AM IST
जलज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जलज मिश्रा Updated Fri, 18 Aug 2023 06:10 AM IST
सार

चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र पर्यावरण और उनकी ओर से पेश की जाने वाली कठिनाइयों के कारण बहुत अलग भूभाग है और इसलिए अब तक अज्ञात बना हुआ है। चंद्रमा पर पहुंचने वाले पिछले सभी अंतरिक्ष यान भूमध्यरेखीय क्षेत्र में, चंद्र भूमध्य रेखा के उत्तर या दक्षिण में कुछ डिग्री अक्षांश पर उतरे थे।

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Chandrayaan 3 If successful India will become the fourth country to have a soft landing on the moon
Chandrayaan 3 - फोटो : Social Media

विस्तार

भारत मिशन चंद्रयान-3 के तहत दूसरे प्रयास में चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग में सफल रहा तो इसमें महारथ वाला चौथा देश बन जाएगा। अब तक यह कारनामा सिर्फ अमेरिका, चीन और सोवियत संघ कर सके हैं। चंद्रयान-3 का लैंडर विक्रम चांद के दक्षिणी ध्रुव की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग में सक्षम है। वह वहां रोवर प्रज्ञान को उतारेगा जो चांद की सतह पर भ्रमण कर रासायनिक अध्ययन करेगा और इसरो को जानकारी भेजेगा। लैंडर और रोवर के पास चांद की सतह पर विभिन्न प्रयोग करने के लिए वैज्ञानिक पेलोड हैं।
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पहली बार ध्रुवीय क्षेत्र में उतरेगा अंतरिक्ष यान
चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र पर्यावरण और उनकी ओर से पेश की जाने वाली कठिनाइयों के कारण बहुत अलग भूभाग है और इसलिए अब तक अज्ञात बना हुआ है। चंद्रमा पर पहुंचने वाले पिछले सभी अंतरिक्ष यान भूमध्यरेखीय क्षेत्र में, चंद्र भूमध्य रेखा के उत्तर या दक्षिण में कुछ डिग्री अक्षांश पर उतरे थे। ध्रुवीय क्षेत्र में उतरने वाला चंद्रयान-3 पहला अंतरिक्ष यान होगा।
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लैंडर की हो रही नियमित जांच
चंद्रयान-1 के परियोजना निदेशक एम अन्नादुरई ने बताया कि लैंडर मॉड्यूल का अलग होना बड़ा मौका है। अब हमें पता चलेगा कि लैंडर कैसा काम कर रहा है। लैंडर अब प्रमाणित होगा और इसकी जांच की जाएगी, जिसके बाद इसे धीरे-धीरे चांद के करीब लाया जाएगा। फिर इसे आवश्यक निर्देश दिए जाएंगे, ताकि यह 23 अगस्त को लक्षित स्थान तक जाने और सुरक्षित लैंडिंग करने के लिए सिग्नल ले ले। उन्होंने कहा, यह शुरुआत है और आगे के सभी पड़ावों को बहुत सावधानी से देखना होगा। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र का पता इसलिए भी लगाया जा रहा है, क्योंकि इसके आसपास स्थायी रूप से छाया वाले क्षेत्रों में पानी की मौजूदगी की संभावना हो सकती है।
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