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चमोली त्रासदीः कहां गया 1965 का प्लूटोनियम पैक? ग्लेशियर टूटने से नुकसान हुआ तो फैल सकता है गंभीर परमाणु प्रदूषण

Wed, 10 Feb 2021 10:31 AM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 10 Feb 2021 10:31 AM IST
सार

  • भारत ने चीन पर सीमावर्ती क्षेत्रों में निगाह रखने के लिए 1965 में स्थापित करना चाहा था रडार सिस्टम, इसे स्थापित करने के पहले प्रयास में खो गया था प्लूटोनियम पैक
  • अगर ग्लेशियर टूटने के कारण प्लूटोनियम पैक को नुकसान हुआ तो जन-जल को हो सकता है बड़ा खतरा

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Link between plutonium device, avalanche unlikely: Leader of ’65 expedition
चमोली में तपोवन डेम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चमोली त्रासदी ने उत्तराखंड और गंगा नदी में परमाणु विकिरण की गंभीर चिंता पैदा कर दी है। इस चिंता का कारण यह है कि 1965 में उत्तराखंड में नंदा देवी पर्वत के शिखर पर रडार सिस्टम स्थापित करने के दौरान एक प्लूटोनियम पैक खो गया था, जो आज तक नहीं मिला है।

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पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता है कि अगर चमोली में ग्लेशियर टूटने से इस प्लूटोनियम पैक को कोई नुकसान हुआ, तो इससे उत्तराखंड राज्य और गंगा नदी के जल में गंभीर परमाणु विकिरण का प्रदूषण पैदा हो सकता है। इससे पर्यावरण के साथ-साथ जनता को भी भारी नुकसान हो सकता है। उत्तराखंड सरकार ने इसे खोजने के लिए अपनी चिंता जाहिर की है।
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उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने अमर उजाला से कहा कि अक्तूबर 1965 में चीन की सीमावर्ती गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भारत सरकार ने अमेरिका के सहयोग से एक रडार सिस्टम लगाने की योजना बनाई थी। जब तकनीकी टीम रडार सिस्टम लगाने के लिए जा रही थी, तब उनके साथ एक प्लूटोनियम पैक भी था, जिसे इस रडार सिस्टम के साथ लगाया जाना था।
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लेकिन इसी दौरान एक तेज बर्फीला तूफान आ गया और सैनिकों को वह प्लूटोनियम पैक वहीं छोड़कर वापस आना पड़ा। बाद में मौसम ठीक हो जाने के बाद हमारे सैनिक तकनीकी टीम के साथ वहां पहुंचे, लेकिन प्लूटोनियम पैक के साथ-साथ अन्य सामान तूफान में खो गया, जो आज तक खोजा नहीं जा सका। बाद में दूसरा पैक ले जाकर रडार सिस्टम तो स्थापित कर दिया गया, लेकिन आशंका है कि पहले वाला प्लूटोनियम पैक आज भी वहीं कहीं बर्फ के नीचे दबा पड़ा हुआ है। इन प्लूटोनियम पैक की अनुमानित उम्र सौ साल के करीब होती है।

सतपाल महाराज ने कहा कि इस प्लूटोनियम पैक के अभी भी सक्रिय होने की आशंका है। अगर चमोली में ग्लेशियर टूटने के दौरान इस प्लूटोनियम पैक को कोई क्षति होती है, तो इससे उत्तराखंड राज्य और यहां के जल-जीवन के लिए परमाणु विकिरण का गंभीर संकट पैदा हो सकता है। यह केवल उत्तराखंड ही नहीं, गंगा जल प्रवाह से जुड़े अन्य राज्यों और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में भी परमाणु विकिरण की गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है, इसलिए इस प्लूटोनियम पैक की खोज की जानी चाहिए। वे इसके लिए प्रयास कर रहे हैं।


सतपाल महाराज ने अगस्त 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर इस मामले पर अपनी गंभीर चिंता जताई थी। उन्होंने संसद में भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा था कि अगर इस प्लूटोनियम पैक के कारण कोई दुर्घटना होती है, तो इससे भयंकर तबाही आ सकती है, इसलिए इसकी खोज की जानी चाहिए। हालाकि, अभी तक इसके लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किया गया है।

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