डकैतों का गढ़ चंबल घाटी अब ऐसे जानवरों का ठिकाना, जो अब लुप्त
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पहली महिला डकैत पुतलीबाई से लेकर मानसिंह, मोहर सिंह, माधौ सिंह जैसे डकैतों की गरजती बंदूकों से कांपने वाले चंबल के बीहड़ की स्थिति अब पूरी तरह बदल गई है।
चंबल की वादियां अब दुनिया भर में लुप्त प्राय स्थिति में पहुंचे घड़ियालों का घर बन गई हैं। डकैतों का खौफ खत्म होने से यहां पर्यटकों का जमावड़ा रहने लगा है। चंबल घाटी ईको टूरिज्म की ओर बढ़ चली है।
50 के दशक से 21वीं सदी की दहलीज तक चंबल के बीहड़, डकैतों के लिए कुख्यात रहे। यहां मानसिंह, मोहर सिंह, माधौ सिंह, तहसीलदार, निर्भय गुर्जर, रज्जन गुर्जर, जगजीवन परिहार, फक्कड़, अरविंद गुर्जर, पुतली बाई, फूलन देवी, लवली पांडेय, सीमा परिहार, कुसुमा नाइन, नीलम तक की दहशत रही है।
1979 में बनना शुरू हुई थी चंबल सेंचुरी
चंबल की रवायत बदलने की शुरुआत 1979 में चंबल सेंचुरी की घोषणा के साथ शुरू हुई। घड़ियालों के संरक्षण का काम 1981 में शुरू हुआ। इनकी संख्या 2016 की गणना के मुताबिक 1162 तक पहुंच गई है। एमपी, यूपी और राजस्थान में होकर बहने वाली चंबल नदी अब घड़ियालों का घर बन गई है। यहां कछुआ, डॉल्फिन और मगरमच्छ की आबादी भी लगातार बढ़ रही है।
बर्ड फेस्टिवल में आ रहे है लाखों पर्यटक
दो साल से बर्ड फेस्टिवल होने से पर्यटक भी आकर्षित हुए हैं। यहां 286 प्रजाति की देशी विदेशी चिड़ियों को भी चंबल की वादियां भा रही हैं। डिप्टी रेन्जर गिरजेश तिवारी ने बताया कि घड़ियालों के घर के रूप में चंबल की पहचान बनी है। चिड़ियों की आबादी भी फलफूल रही है। इनके कारण बड़ी संख्या में पर्यटक आने लगे हैं। डकैत के नाम से कुख्यात रहे अतर सिंह ने बताया कि चंबल के बीहड़ में अब कोई डकैत नहीं रहा। पर्यटन के रूप में इसके विकास से लोगों के लिए रोजगार की संभावनाएं बढे़ंगी। चंबल सफारी जरार के डायरेक्टर आरपी सिंह का कहना है कि ईको टूरिज्म के रूप में विकास होने से रोजगार के अवसर पर भी बढे़ंगे।