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Delhi: 29 सप्ताह का गर्भ गिराने की अनुमति मामले में केंद्र का हाईकोर्ट का रूख, जानिए क्या है मामला
Tue, 16 Jan 2024 10:48 PM IST
आदर्श शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: आदर्श शर्मा
Updated Tue, 16 Jan 2024 10:48 PM IST
सार
महिला को 29 सप्ताह के गर्भावस्था को खत्म करने की अनुमति देने वाले अपने आदेश को वापस लेने के लिए केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है।
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दिल्ली हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
महिला को 29 सप्ताह के गर्भावस्था को खत्म करने की अनुमति देने वाले आदेश को वापस लेने के लिए केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। केंद्र ने कहा कि बच्चे के जीवित रहने की संभावनाएं हैं। कोर्ट को अजन्मे बच्चे के जीवन की रक्षा के करने पर विचार करना चाहिए।
महिला की मेडिकल जांच कर रहे एम्स ने भी अदालत का रुख किया है। एम्स के डॉक्टरों द्वारा मामले में दी गई राय पर भरोसा करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तरफ से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अपने आवेदन में कहा कि वर्तमान मामला यह स्पष्ट करता है कि गर्भापात तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि डॉक्टर भ्रूणहत्या न कर दें, नहीं तो समय से पहले प्रसव हो सकता है।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने 15 जनवरी के आदेश में कहा कि मानसिक तनाव से पीड़ित महिला की 12 और 13 जनवरी की रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि समय से पहले प्रसव पीड़ा शुरू करने की संभावना ज्यादा है। सीजेरियन की नौबत आ सकती है। जिसका याचिकाकर्ता की भविष्य की गर्भधारण पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। गौरतलब है कि महिला के साथ-साथ भ्रूण के स्वास्थ्य के मद्देनजर कोर्ट ने महिला को 16 से 18 जनवरी को एम्स में मनोरोग मूल्यांकन और परामर्श से गुजरने को कहा है। साथ ही कोर्ट ने एम्स को महिला और भ्रूण से जुड़ी रिपोर्ट को पेश करने को कहा है।
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वहीं मंत्रालय ने अपने याचिका में पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया जिसमें 26 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति देने वाले अपने पहले के आदेश को वापस ले लिया गया था और इस तरह एक मेडिकल बोर्ड की राय के मद्देनजर गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति नहीं दी गई थी। गौरतलब है कि ोपिछले साल फरवरी माह में महिला की शादी हुई थी, लेकिन अक्तूबर में उसके पति की मौत हो गई थी। जिसके बाद वह अपने माता-पिता के साथ चली गई, उस दौरान पता चला कि वह 20 सप्ताह की गर्भवती थी।
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महिला की मेडिकल जांच कर रहे एम्स ने भी अदालत का रुख किया है। एम्स के डॉक्टरों द्वारा मामले में दी गई राय पर भरोसा करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तरफ से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अपने आवेदन में कहा कि वर्तमान मामला यह स्पष्ट करता है कि गर्भापात तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि डॉक्टर भ्रूणहत्या न कर दें, नहीं तो समय से पहले प्रसव हो सकता है।
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न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने 15 जनवरी के आदेश में कहा कि मानसिक तनाव से पीड़ित महिला की 12 और 13 जनवरी की रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि समय से पहले प्रसव पीड़ा शुरू करने की संभावना ज्यादा है। सीजेरियन की नौबत आ सकती है। जिसका याचिकाकर्ता की भविष्य की गर्भधारण पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। गौरतलब है कि महिला के साथ-साथ भ्रूण के स्वास्थ्य के मद्देनजर कोर्ट ने महिला को 16 से 18 जनवरी को एम्स में मनोरोग मूल्यांकन और परामर्श से गुजरने को कहा है। साथ ही कोर्ट ने एम्स को महिला और भ्रूण से जुड़ी रिपोर्ट को पेश करने को कहा है।
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वहीं मंत्रालय ने अपने याचिका में पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया जिसमें 26 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति देने वाले अपने पहले के आदेश को वापस ले लिया गया था और इस तरह एक मेडिकल बोर्ड की राय के मद्देनजर गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति नहीं दी गई थी। गौरतलब है कि ोपिछले साल फरवरी माह में महिला की शादी हुई थी, लेकिन अक्तूबर में उसके पति की मौत हो गई थी। जिसके बाद वह अपने माता-पिता के साथ चली गई, उस दौरान पता चला कि वह 20 सप्ताह की गर्भवती थी।