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किसके हाथ का उड़ेगा तोता, सीबीआई संकट में किसे होगा नफा और किसे नुकसान
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 26 Oct 2018 09:24 PM IST
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cbi
- फोटो : PTI
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सीबीआई निदेशक की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने दिशा निर्देश जारी करते हुए मामले की सुनवाई 12 नवंबर तक टाल दी है, लेकिन इसी के साथ यह चर्चा भी तेज हो गई है कि इस संकट से किसके हाथ का तोता उड़ने वाला है। दिशा निर्देश से सुप्रीम कोर्ट सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय, सीवीसी और सीबीआई के बीच में आ गया है। कोर्ट ने इस मामले में जहां सीवीसी को दो सप्ताह में अपनी जांच पूरी करके बंद लिफाफे में सौंपने के लिए कहा है।
उच्चतम न्यायालय के इस कदम को न्यायविद भी काफी अहम मान रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने दिशा निर्देश में केंद्र सरकार, सीवीसी, सीबीआई को अपना पक्ष अलग-अलग रखने के लिए कहा है। इसके अलावा सीबीआई के अंतरिम निदेशक एम नागेश्वर राव को सीमाओं में बांध दिया है। नागेश्वर राव नीतिगत मामलों में कोई निर्णय नहीं ले सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राव केवल सीबीआई के रुटीन मामलों को ही देखेंगे। इसके अलावा अदालत ने नागेश्वर राव द्वारा लिए गए निर्णय के बाबत भी बंद लिफाफे में जानकारी मांगी है। एक तरह से सीबीआई के अंतरिम निदेशक एम नागेश्वर राव को अदालत ने फिलहाल रबर स्टांप बता दिया है। कुल मिलाकर अदालत ने जहां केंद्र सरकार को परोक्ष रूप से आईना दिखाया है, वहीं सीबीआई जैसी संस्था की साख बचाने की दिशा में अदालत का दिशा-निर्देश देखा जा रहा है।
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क्या है सीबीआई निदेशक की याचिका
सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा ने उच्चतम न्यायालय में खुद को जबरन छुट्टी पर भेजे जाने, सभी अधिकार जब्त किए के आदेश को चुनौती दी है। वर्मा ने नियमों का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रधानमंत्री, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की समिति दो साल के लिए करती है।
नियुक्ति होने के बाद सीबीआई निदेशक को बिना इस तीन सदस्यीय समिति की अनुमति के समय से पहले (दो साल) न तो उनके पद से हटाया जा सकता है और न ही उसका तबादला किया जा सकता है। वर्मा ने अंतरिम निदेशक के फैसले पर भी सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से सीबीआई के अंतरिम निदेशक ने जांच एजेंसी के अधिकारियों के स्थानांतरण किए हैं, उससे सीबीआई द्वारा की जा रही जांच के प्रभावित होने की आशंका है।
सुप्रीम कोर्ट के शुक्रवार के दिशा-निर्देश को देखते हुए स्पष्ट है कि अदालत ने वर्मा की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार, सीवीसी और सीबीआई को न केवल अपना पक्ष रखने को कहा है।
क्या होगा असर
उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों से सीबीआई के दैनिक कामकाज पर इसका असर पडऩे की पूरी संभावना है। माना जा रहा है कि इससे जांच एजेंसी में न केवल पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि एजेंसी के अफसरों पर किसी तरह का दबाव बनाने में मुश्किल आएगी। हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अदालत के दिशा-निर्देश का स्वागत किया है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा कि जांच के बाद स्थिति अपने आप स्पष्ट हो जाएगी। वहीं विपक्ष के नेता और कांग्रेस पार्टी के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने अदालत के दिशा-निर्देशों को केंद्र सरकार के मुंह पर करारा तमाचा बता रहे हैं।
किसके हाथ का उड़ सकता है तोता?
इसका पता अदालत का अंतिम फैसला आने के बाद लगेगा। यदि उच्चतम न्यायालय अपने फैसले में सीबीआई निदेशकर आलोक वर्मा की अनिश्चित कालीन छुट्टी को असंवैधानिक करार दे देता है, तो उनके सम्मान की वापसी हो जाएगी। ऐसा होने पर यह निर्णय सीवीसी के साथ-साथ केंद्र सरकार की साख पर भी असर डाल सकता है।
जबकि विपक्ष के राजनीतिक दल इसे अपने पक्ष में भुना सकते हैं। ऐसा होने पर सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सीबीआई के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि इस मामले में कई तकनीकी पेंच हैं। मामला अदालत में लंबित है। इसलिए कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन जिस तरह से अंतरिम निदेशक के पद पर तैनात किए जाने के बाद पूर्ण निदेशक की तरह एम नागेश्वर राव ने स्थानांतरण आदि का निर्णय लिया है, वह नियमत: सही नहीं है।
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उच्चतम न्यायालय के इस कदम को न्यायविद भी काफी अहम मान रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने दिशा निर्देश में केंद्र सरकार, सीवीसी, सीबीआई को अपना पक्ष अलग-अलग रखने के लिए कहा है। इसके अलावा सीबीआई के अंतरिम निदेशक एम नागेश्वर राव को सीमाओं में बांध दिया है। नागेश्वर राव नीतिगत मामलों में कोई निर्णय नहीं ले सकते।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राव केवल सीबीआई के रुटीन मामलों को ही देखेंगे। इसके अलावा अदालत ने नागेश्वर राव द्वारा लिए गए निर्णय के बाबत भी बंद लिफाफे में जानकारी मांगी है। एक तरह से सीबीआई के अंतरिम निदेशक एम नागेश्वर राव को अदालत ने फिलहाल रबर स्टांप बता दिया है। कुल मिलाकर अदालत ने जहां केंद्र सरकार को परोक्ष रूप से आईना दिखाया है, वहीं सीबीआई जैसी संस्था की साख बचाने की दिशा में अदालत का दिशा-निर्देश देखा जा रहा है।
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क्या है सीबीआई निदेशक की याचिका
सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा ने उच्चतम न्यायालय में खुद को जबरन छुट्टी पर भेजे जाने, सभी अधिकार जब्त किए के आदेश को चुनौती दी है। वर्मा ने नियमों का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रधानमंत्री, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की समिति दो साल के लिए करती है।
नियुक्ति होने के बाद सीबीआई निदेशक को बिना इस तीन सदस्यीय समिति की अनुमति के समय से पहले (दो साल) न तो उनके पद से हटाया जा सकता है और न ही उसका तबादला किया जा सकता है। वर्मा ने अंतरिम निदेशक के फैसले पर भी सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से सीबीआई के अंतरिम निदेशक ने जांच एजेंसी के अधिकारियों के स्थानांतरण किए हैं, उससे सीबीआई द्वारा की जा रही जांच के प्रभावित होने की आशंका है।
सुप्रीम कोर्ट के शुक्रवार के दिशा-निर्देश को देखते हुए स्पष्ट है कि अदालत ने वर्मा की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार, सीवीसी और सीबीआई को न केवल अपना पक्ष रखने को कहा है।
क्या होगा असर
उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों से सीबीआई के दैनिक कामकाज पर इसका असर पडऩे की पूरी संभावना है। माना जा रहा है कि इससे जांच एजेंसी में न केवल पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि एजेंसी के अफसरों पर किसी तरह का दबाव बनाने में मुश्किल आएगी। हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अदालत के दिशा-निर्देश का स्वागत किया है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा कि जांच के बाद स्थिति अपने आप स्पष्ट हो जाएगी। वहीं विपक्ष के नेता और कांग्रेस पार्टी के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने अदालत के दिशा-निर्देशों को केंद्र सरकार के मुंह पर करारा तमाचा बता रहे हैं।
किसके हाथ का उड़ सकता है तोता?
इसका पता अदालत का अंतिम फैसला आने के बाद लगेगा। यदि उच्चतम न्यायालय अपने फैसले में सीबीआई निदेशकर आलोक वर्मा की अनिश्चित कालीन छुट्टी को असंवैधानिक करार दे देता है, तो उनके सम्मान की वापसी हो जाएगी। ऐसा होने पर यह निर्णय सीवीसी के साथ-साथ केंद्र सरकार की साख पर भी असर डाल सकता है।
जबकि विपक्ष के राजनीतिक दल इसे अपने पक्ष में भुना सकते हैं। ऐसा होने पर सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सीबीआई के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि इस मामले में कई तकनीकी पेंच हैं। मामला अदालत में लंबित है। इसलिए कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन जिस तरह से अंतरिम निदेशक के पद पर तैनात किए जाने के बाद पूर्ण निदेशक की तरह एम नागेश्वर राव ने स्थानांतरण आदि का निर्णय लिया है, वह नियमत: सही नहीं है।