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CAPF: क्या 'बेगार' से परेशान हैं अर्धसैनिक बलों के 'जवान', 50155 ने छोड़ी नौकरी तो 654 ने कर ली आत्महत्या

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Thu, 22 Jun 2023 06:14 PM IST
सार

पिछले पांच साल में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के 50155 जवानों ने नौकरी छोड़ दी। वहीं 654 सिपाहियों ने आत्महत्या करने जैसा घातक कदम उठाया है। इसके पीछे कारण क्या है? आइए समझते हैं...

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capf paramilitary forces jawans are in 50155 left the job and 654 committed suicide
capf jawans - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

नई दिल्ली:  पिछले 48 घंटे में दो बड़ी घटनाएं हुई हैं। पहली घटना दिल्ली के द्वारका जिले में स्थित आईटीबीपी के छावला कैंप में देखने को मिली। सेकंड इन कमांडेंट 'टूआईसी' के घर पर उसके बेटे ने जवान को कई गोलियां मार दी। जवान ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया। दूसरी खबर, राजस्थान के चूरू जिले से आई है। बीएसएफ जवान सुरेश बेनीवाल की मौत हो गई है।

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सुरेश के परिजनों का कहना है कि कमांडेंट ने उसे पटना स्थित अपने घर भेजा हुआ था। वहां पर घर की मरम्मत चल रही थी। किन्हीं कारणों से उसकी मौत हो गई। परिजनों ने कहा, वे जवान का पार्थिव शरीर तब तक नहीं लेंगे, जब तक  मौत के कारणों की जांच नहीं हो जाती। इससे पहले सीआरपीएफ के दो कमांडेंट का नाम भी ऐसे मामले में सामने आ चुका है। उन्होंने अपनी तैनाती वाले स्थान से जवानों को अनाधिकृत तौर पर बेगार के लिए बहुत दूर भेज दिया था। कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स मार्टियर्स वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह कहते हैं, जवानों के साथ ठीक नहीं हो रहा। कई वजहों से वे परेशान हैं। अगर सब कुछ ठीक होता तो पांच साल में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के 50155 जवानों ने नौकरी नहीं छोड़ी होती और 654 सिपाही आत्महत्या करने जैसा घातक कदम नहीं उठाते। 


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अफसरों के घरों पर मारे गए दो जवान ... 

आईटीबीपी कैंप में अधिकारी के आवास पर मारे गए जवान की पहचान भूपेंद्र सिंह (36) के रूप में हुई है। वह जवान कैंप में 'कुक' का काम करता था। उसके शरीर में कई गोलियां लगी हैं। दिल्ली पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर टूआईसी के बेटे दिग्विजय को गिरफ्तार कर लिया है। उसने अपने पिता की लाइसेंसी पिस्टल से जवान पर गोलियां चलाई। 

 

दूसरी घटना बीएसएफ से जुड़ी है। राजस्थान के चूरू जिले में हमीरवास थाना क्षेत्र के रबोडी गांव निवासी सुरेश बेनीवाल, बीएसएफ में सिपाही के पद पर नौकरी कर रहा था। सुरेश के बड़े भाई राम स्वरूप के मुताबिक, इस मामले की निष्पक्ष जांच की जाए। बीएसएफ ने सुरेश को 10 जून से छुट्टी पर दिखाया है। अगर वह छुट्टी पर था तो घर क्यों नहीं आया। 17 जून को सुरेश से मेरी बात हुई थी। उसने बताया कि वह पटना में कमांडेंट साहब के घर पर है। उसकी ड्यूटी तो किसी दूसरे राज्य में थी। 

सुरेश ने कहा, अफसर के घर में रंग पुताई और मरम्मत का काम चल रहा है। 18 जून को राम स्वरूप के पास फोन आया कि सुरेश की पत्नी सुशीला का नंबर दो। कुछ ही देर में मालूम पड़ गया कि सुरेश अब इस दुनिया में नहीं रहा। बतौर राम स्वरूप बीएसएफ ने सुरेश को 10 जून से 11 जुलाई तक छुट्टी पर दिखाया है। अगर वह छुट्टी पर था तो सीओ के घर पर क्या कर रहा था। परिजनों का आरोप है कि सुरेश को फर्जी तरीके से छुट्टी पर दिखाया गया है। बीएसएफ ने पोस्टमार्टम कराने से पहले परिजनों को सूचना तक नहीं दी। यह मामला बीएसएफ की 17 वीं बटालियन का है। इसके सीओ अजीत कुमार बताए जाते हैं।

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सीआरपीएफ में भी फर्जी अटैचमेंट के मामले आए सामने  

सीआरपीएफ कमांडेंट नीरज पांडे को लेकर भी फर्जी अटैचमेंट की खबरें सामने आई थी। उन्होंने नोएडा में अपने एक व्यावसायिक स्थल पर तीन जवान विजय दहिया, प्रेम चंद्र गौतम और प्रदीप कुमार भट्ट को तैनात कर रखा था। फाइलों में उन जवानों की तैनाती लखनऊ मुख्यालय पर थी, लेकिन हकीकत में ये जवान अधिकांश समय नोएडा में रहते थे। 230 वीं बटालियन के कमांडेंट दिनेश सिंह चंदेल पर भी ऐसा ही आरोप लगा। उनकी बटालियन के ड्राइवर 'हवलदार' मो. तारिक लंबे समय से इलाहाबाद में तैनात हैं। कायदे से उन्हें अपनी बटालियन, जो छत्तीसगढ़ में तैनात हैं, वहां होना चाहिए था। यह मामला तब खुला, जब मो. तारिक ने निजी झगड़े में अपने पड़ोसी पर गोली चला दी। पुलिस ने केस दर्ज कर लिया। जब जांच शुरू हुई तो मामले का खुलासा हुआ। 

संसदीय स्थायी समिति ने की है टिप्पणी 

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों से जवानों और कैडर अधिकारियों का मोह भंग क्यों हो रहा है। वे बीच राह में ही नौकरी छोड़ रहे हैं। अगर पिछले पांच वर्ष की बात करें तो सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी, सीआईएसएफ और असम राइफल्स में 50155 कर्मियों ने नौकरी को अलविदा कह दिया है। इतना ही नहीं, इन बलों में आत्महत्या के केस भी बढ़ रहे हैं। गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने इस बात को बहुत गंभीरता से लिया है। समिति ने अपनी 242 वीं रिपोर्ट में साफतौर पर कहा है कि जवानों और अधिकारियों द्वारा नौकरी छोड़ने का सीधा असर फोर्स के मनोबल पर पड़ता है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को चाहिए कि जो लोग छोड़कर जा रहे हैं, उनका साक्षात्कार लें, सर्वे रिपोर्ट तैयार करें। इसके जरिए उन कारणों का पता चल सकेगा कि जिसके चलते जवान और अधिकारी, नौकरी छोड़ रहे हैं। इसके बाद सीएपीएफ में वे सभी जरुरी बदलाव किए जाएं, जिससे नौकरी छोड़ने वालों की संख्या कम होने लगे।
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पांच साल में 654 जवानों ने की आत्महत्या

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी, सीआईएसएफ, असम राइफल्स और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड में जवानों व अधिकारियों द्वारा आत्महत्या करने के मामले कम नहीं हो पा रहे हैं। गत पांच वर्ष में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के 654 जवानों ने आत्महत्या कर ली है। आत्महत्या करने वालों में CRPF के 230, बीएसएफ के 174, सीआईएसएफ के 89, एसएसबी के 64, आईटीबीपी के 51, असम राइफल के 43 और एनएसजी के 3 जवान शामिल हैं।

संसदीय समिति ने कहा है कि आत्महत्या के केस, बल की वर्किंग कंडीशन पर असर डालते हैं। सेवा नियमों में सुधार की गुंजाइश है। जवानों को प्रोत्साहन दें। रोटेशन पॉलिसी के तहत पोस्टिंग दी जाए। लंबे समय तक कठोर तैनाती न दें। तबादला नीति ऐसी बनाई जाए कि जवानों को अपनी पसंद का ड्यूटी स्थल मिल जाए। अगर ऐसे उपाय किए जाते हैं तो नौकरी छोड़कर जाने वालों की संख्या कम हो सकती है। 
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जवानों को नहीं मिल रही '100' दिन की छुट्टी 

2019 के अंत में यह घोषणा की गई थी कि सीएपीएफ जवानों को प्रतिवर्ष सौ दिन की छुट्टी मिलेगी,  अब चौथे साल में भी इस योजना को लागू नहीं किया जा सका है। इस योजना में ऐसा प्रावधान बताया गया था कि इसके लागू होने के बाद कोई भी जवान 100 दिन अपने परिवार के साथ व्यतीत कर सकता है। कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स मार्टियर्स वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा 2021 में इस बाबत केंद्रीय गृह मंत्रालय से आरटीआई के जरिए यह पूछा गया था कि कितने जवानों को एक साल में 100 दिन की छुट्टी मिली है। कुछ नियमों का हवाला देकर इस सवाल का जवाब नहीं दिया गया। 

गत संसद सत्र में इस विषय को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा, इस बात का प्रयास चल रहा है कि सीएपीएफ कार्मिक अपने परिवारों के साथ यथासंभव प्रतिवर्ष 100 दिन बिता सकें। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद सत्र के दौरान राज्यसभा में बताया था कि इन बलों में आत्महत्याओं और भ्रातृहत्याओं को रोकने के लिए जोखिम के प्रासंगिक घटकों एवं प्रासंगिक जोखिम समूहों की पहचान करने तथा उपचारात्मक उपायों से संबंधित सुझाव देने के लिए एक कार्यबल का गठन किया गया है। कार्यबल की रिपोर्ट तैयार हो रही है।

जवानों की ठीक तरह से सुनवाई नहीं हो पाती 

 'कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स मार्टियर्स वेलफेयर एसोसिएशन' के महासचिव रणबीर सिंह का कहना है, इन जवानों को घर की परेशानी नहीं है। सरकार इस मामले में झूठ बोल रही है। इन्हें ड्यूटी पर क्या परेशानी है, इस बारे में सरकार कोई बात नहीं करती। जवानों को पुरानी पेंशन से वंचित रखा जा रहा है। सिपाही से लेकर कैडर अफसरों तक की प्रमोशन में लंबा वक्त लग रहा है। नतीजा, जवान टेंशन में रहने लगते हैं। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को भारतीय सेना के बराबर शहीद का दर्जा तक नहीं दिया जा रहा। 

बीएसएफ के पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद कहते हैं, कई जगहों पर वर्कलोड ज्यादा है। जवान ठीक से सो नहीं पाते हैं। वे अपनी समस्या किसी के सामने रखते हैं, तो वहां ठीक तरह से सुनवाई नहीं हो पाती। ये बातें जवानों को तनाव की ओर ले जाती हैं। कुछ स्थानों पर बैरक एवं दूसरी सुविधाओं की कमी नजर आती है। कई दफा सीनियर की डांट फटकार भी जवान को आत्महत्या तक ले जाती है। समय पर प्रमोशन या रैंक न मिलना भी जवानों को तनाव देता है। 

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