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Bombay HC: '21वीं सदी में भी लड़कियों को वस्तु समझा जाता है', एक साल की मासूम से जुड़े केस में छलका जज का दर्द

Wed, 15 Feb 2023 10:49 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Wed, 15 Feb 2023 10:49 PM IST
सार

महिला को जमानत देते हुए जस्टिस एसएम मोदक ने कहा कि सारे मामले पर गौर करने के बाद वो बेहह दर्द महसूस कर रहे हैं। जिस महिला ने बच्ची को खरीदा उसने मानवता को शर्मसार करने वाला काम किया है। 

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Bombay HC says Even in 21st century girls treated as commodity and used as medium for financial benefits
बॉम्बे हाईकोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

महाराष्ट्र में एक साल की बच्ची को बेचे जाने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बेहद भावुक टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि 21वीं सदी में भी लड़कियों को एक वस्तु समझा जाता है और उन्हें वित्तीय लाभ के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायधीश न्यायमूर्ति एस एम मोदक की एकल पीठ ने आठ फरवरी को मामले में आरोपी महिला को जमानत देते हुए अपने एक फैसले में यह टिप्पणी की। 

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अदालत ने दी आरोपी महिला को जमानत
हालांकि मामले में जस्टिस एसएम मोदक ने बच्ची को खरीदने वाली आरोपी महिला अश्विनी बाबर को 25,000 रुपये के मुचलके पर जमानत दे दी। जमानत देते हुए अदालत ने कहा कि उसे जेल में रखने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि मामले की सुनवाई जल्द शुरू नहीं होगी और उसके खुद दो नाबालिग बच्चे हैं और उनके कल्याण पर भी विचार करने की जरूरत है।
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क्या है पूरा मामला
ये मामला बेहद हैरान करने वाला है। दरअसल, बच्ची की मां ने रुपयों की सख्त जरूरत के चलते अश्विनी बाबर से रुपये लिए थे। जब वह रुपये चुकाने में सक्षम नहीं थी तो उसने अपनी एक साल की बच्ची को अश्विनी बाबर को बेच दिया। बाद में जब उसने धीरे-धीरे पूरा कर्ज वापस कर दिया और अपनी बच्ची को वापस मांगा तो आरोपी दंपति ने उसे वापस करने से मना कर दिया। ऐसे में पीड़ित महिला ने पुलिस के पास शिकायत की। शिकायत के आधार पर सतारा पुलिस ने  बच्ची को खरीदने वाली महिला और उसके पति सहित एक अन्य को गिरफ्तार कर लिया। हालांकि बाद में बच्ची को उसकी मां को लौटा दिया गया। यह मामला निचली अदालत में गया, जहां अदालत ने बच्ची को खरीदने वाली महिला के पति और एक अन्य शख्स को जमानत पर रिहा कर दिया। लेकिन महिला को जमानत देने से इनकार कर दिया। महिला को जमानत ना देने के पीछे निचली अदालत का कहना था कि ये जघन्य अपराध है। लिहाजा आरोपी को जमानत नहीं दी जा सकती। उसके बाद मामला बॉम्बे हाईकोर्ट के पास आया। जहां हाईकोर्ट ने महिला को जमानत दे दी। 
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अदालत ने की टिप्पणी
महिला को जमानत देते हुए जस्टिस एसएम मोदक ने कहा कि सारे मामले पर गौर करने के बाद वो बेहह दर्द महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि "नैतिकता और मानवाधिकारों के सिद्धांतों" के संदर्भ में यह बेहद आपत्तिजनक है कि एक साल की लड़की को उसकी मां ने बेच दिया। अदालत ने कहा कि 'बिक्री शब्द का उपयोग करने में बहुत दर्द होता है, लेकिन जीवन की कठिन सच्चाई यह है कि बच्ची की मां ने उसे पैसे की जरूरत के कारण बेच दिया था। ऐसे में उसके हालात का भी सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। अदालत ने कहा कि जिस महिला ने बच्ची को खरीदा उसने मानवता को शर्मसार करने वाला काम किया है। 

चार्जशीट में यौन अपराधों के पीड़ितों की पहचान उजागर न करें
एक अन्य मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने सभी जांच एजेंसियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि वे आरोपपत्र में यौन अपराधों के पीड़ितों की पहचान का खुलासा ना करें। इतना ही नहीं अदालत ने निर्देश का पालन नहीं करने पर कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। 8 फरवरी को हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच के जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और अभय वाघवासे की खंडपीठ ने कहा कि जांच एजेंसियों को ऐसे मामलों में संवेदनशील होना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि  ऐसे दस्तावेज जिसमें पीड़ित की पहचान हो रही हो उन्हें केवल सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत किया जाए। 

पीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 228-ए कुछ अपराधों के पीड़ित की पहचान का खुलासा करने पर रोक लगाती है, लेकिन समय-समय पर देखा गया कि इस नियम का पालन नहीं किया जा रहा था। 27 वर्षीय विधवा से बलात्कार के आरोपी 33 वर्षीय व्यक्ति को जमानत देने के आदेश में न्यायाधीशों ने यह टिप्पणी की।

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