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चुनाव से पहले शाह की सांसदों को हिदायत, 'क्या करें और क्या ना करें'
हिमांशु मिश्र/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 15 Jun 2016 09:11 AM IST
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उत्तर प्रदेश के भाजपा सांसदों का दिन का चैन और रातों की नींद अगले सात-आठ महीने तक गायब रहेगी। दरअसल पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने विधानसभा चुनाव तक सांसदों को न सिर्फ अपने अपने संसदीय क्षेत्र में जमे रहने बल्कि हर दिन का कार्यक्रम बना कर इसकी सूचना राज्य इकाई को देने का फरमान सुना दिया है।
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राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के तत्काल बाद इलाहाबाद में सूबे के सांसदों से मुखातिब शाह ने राज्य इकाई को सांसदों की गतिविधियां और कार्यक्रमों की मासिक रिपोर्ट केंद्रीय नेतृत्व को भेजने का निर्देश दिया है।
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इस दौरान सांसदों को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार पर किसी प्रकार की टीका टिप्पणी करने के साथ ही विवादास्पद बयान न देने की भी सख्त हिदायत दी गई है। सांसदों से दो टूक लहजे में कहा गया है कि संसदीय क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाली विधानसभा चुनाव की जीत हार की पहली जिम्मेदारी संबंधित सांसद पर होगी।
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बैठक में शाह ने कुछ सांसदों ने लगे हाथों विकास पर्व से संबंधित कार्यक्रम और गोद लिए गए गांवों में विकास कार्यों की जानकारी भी ली। गौरतलब है कि इस बैठक में पोस्टरबाजी विवाद के कारण चर्चा में रहे सांसद वरुण गांधी उपस्थित नहीं थे।
राज्य संगठन से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि बैठक की शुरुआत में शाह ने पार्टी के लिए सूबे में होने जा रहे विधानसभा चुनाव का सियासी महत्व समझाया। उन्होंने दो टूक लहजे में कहा कि सांसदों की निष्क्रियता, लोगों से बरती जाने वाली दूरियां जैसे मुद्दे पार्टी को सियासी नुकसान दे सकते हैं।
शाह ने आपत्तिजनक बयानबाजी और सीएम पद के उम्मीदवारी पद दावा जताने जैसे मामलों को बर्दाश्त न करने की भी बात कही। इसी बैठक में शाह ने संगठन से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों से कहा कि राज्य इकाई सांसदों की अपने अपने संसदीय क्षेत्र में लगातार उपस्थिति सुनिश्चित करे। कोई भी सांसद बिना राज्य इकाई की अनुमति के अपने संसदीय क्षेत्र से बाहर न जाए।
इसके अलावा शाह ने संगठन को सांसदों की गतिविधियों से संबंधित हर महीने की रिपोर्ट तैयार कर केंद्रीय नेतृत्व को भेजने का निर्देश दिया। इससे पहले सांसदों से एक महीने के भावी कार्यक्रम की लिखित जानकारी लें।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक राज्य की 80 में से 71 सीटों पर कांबिज होने के कारण नेतृत्व नहीं चाहता कि सांसदों की निष्क्रियता से सियासी घाटा हो। यही कारण है कि कार्यकारिणी की बैठक के तत्काल बाद शाह ने सांसदों के साथ राज्य संगठन के भी पेंच कस दिए।