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उपचुनाव: बड़ी जीत के बदले भाजपा को मिली करारी हार, अब सपा-बसपा की काट ढूंढ रहा आलकमान

Wed, 14 Mar 2018 07:35 PM IST
हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 14 Mar 2018 07:35 PM IST
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BJP is worried on gorakhpur and Phulpur by election results 2018

मिशन 2019 के लिए मजबूत तैयारी का संदेश देने के लिए भाजपा की रणनीति तो गोरखपुर-फूलपुर में बड़ी जीत हासिल करने की थी, मगर पार्टी दोनों सीटें गंवा बैठी। वह भी तब जब उपचुनाव से ठीक पूर्व केंद्रीय और राज्य स्तर पर दोनों संसदीय क्षेत्र के लिए दर्जनों अहम घोषणा ही नहीं की गई, बल्कि केंद्र और राज्य के दर्जनों मंत्रियों ने दोनों सीटों पर डेरा भी डाला। 

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पार्टी नेतृत्व खासतौर से गोरखपुर के नतीजे से हतप्रभ है। नेतृत्व हार के लिए सपा-बसपा के बीच अचानक हुए गठबंधन और कमजोर बूथ मैनेजमेंट को जिम्मेदार मान रहा है। नेतृत्व अब यह भी मानता है कि अगले लोकसभा चुनाव में बीते लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन दुहराने के लिए उसे नई व्यूहरचना का सहारा लेना पड़ेगा। 
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दरअसल पार्टी नेतृत्व को फूलपुर से नकारात्मक परिणाम की आशंका थी, मगर करीब तीस साल पुराना गोरखपुर का किला ढलने की आशंका दूर-दूर तक नहीं थी। नेतृत्व का मानना था कि अचानक सपा-बसपा के बीच अचानक बने समीकरण से निपटने के लिए ठीक से रणनीति नहीं बनाई गई। इसके अलावा दोनों ही सीटों पर बूथ मैनेजमेंट के बुरी तरह फेल होने के कारण अन्य चुनाव की तरह कार्यकर्ता बड़ी संख्या में समर्थकों को बूथ में लाने में नाकाम रहे। 
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फूलपुर में बाहरी उम्मीदवार और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के खिलाफ नाराजगी भी पार्टी के खिलाफ गई। पार्टी के रणनीतिकारों में शामिल एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक फूलपुर में उपचुनाव में सत्तारूढ़ दल की हार का पुराना इतिहास रहा है। मगर गोरखपुर से ऐसे नतीजे की उम्मीद पार्टी को नहीं थी। कम मतदान की स्थिति में भाजपा बेहतर बूथ प्रबंधन से बाजी मारती रही थी, मगर दोनों सीटों पर ऐसा लगा जैसे कार्यकर्ताओं के साथ संवादहीनता की स्थिति थी। 

चौकन्नी भाजपा रणनीति में करेगी बड़ा बदलाव 

BJP is worried on gorakhpur and Phulpur by election results 2018

उपचुनाव में दोनों सीटें हारने और सपा-बसपा का गठबंधन भविष्य में बरकरार रहने की संभावनाओं के मद्देनजर पार्टी राज्य में अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करेगी। इस बदलाव की झलक सबसे पहले जल्द होने वाले योगी मंत्रिमंडल विस्तार में दिखेगा।

खासतौर पर गैरयादव पिछड़ी जातियों और गैरजाटव दलित जातियों को साधने के लिए नई व्यूह रचना तैयार होगी। चुनाव में सहयोगी दलों का बेहतर इस्तेमाल न होना भी हार के कारणों में गिना जा रहा है। ऐसे में सहयोगी दलों से बेहतर संवाद कायम करने का सिलसिला नए सिरे से शुरू होगा। 

बड़ा संदेश देने के बदले गंवाई सीटें 
केंद्रीय नेतृत्व सपा-बसपा को झटका देने के लिए इन दोनों ही सीटों पर बीते लोकसभा चुनाव से बड़ी जीत हासिल करना चाहता था। नेतृत्व को मालूम था कि बड़ी जीत हासिल होते ही लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा-कांग्रेस के साथ आने की संभावना न सिर्फ कमजोर होगी, बल्कि यह भी संदेश जाएगा कि सभी विरोधियों केएकजुट होने की स्थिति में भी भाजपा को हराना मुमकिन नहीं है।

मगर नतीजे के बाद बाजी पलट गई है। राजग के खिलाफ तिकड़ी के साथ आने की संभावनाओं को मजबूती दे दी है। इसके अलावा योगी-मौर्य अपने दम पर कुछ कर दिखाने का मिले मौके को गंवा दिया है। 

सारी ताकत झोंकने के बाद भी मिली हार 
हर हाल में जीत हासिल करने के लिए पार्टी ने विकास को भी बड़ा हथियार बनाया था। इस रणनीति के तहत चुनाव से पहले दोनों सीटों केलिए केंद्रीय और राज्य स्तर पर कई अहम योजनाओं की घोषणा की गई। केंद्र के दर्जन भर से अधिक मंत्री के अलावा मोदी मंत्रिमंडल के ज्यादातर सदस्यों ने इन दो सीटों पर डेरा डाला। इसके बावजूद साइकिल को मिले हाथी के साथ ने तस्वीर बदल कर रख दी। 

ये थी केंद्रीय स्तर पर अहम घोषणा- 
मेगा फूड पार्क का निर्माण 
भारत नेट परियोजना 
फाफामाऊ में गंगा नदी पर छह लेन का पुल 
हंडिया-औराई खंड का छह लेन में चौड़ीकरण 
पुरामुफ्ती-कौड़िहार को चार लेन का बनाने 
बाईपास रोड जंक्शन से इलाहाबाद सिटी मार्ग दो की जगह चार लेन 
चार लेन की यूपी-एमपी बोर्ड की सड़क 

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