ओबीसी आरक्षण विवाद से कन्नी काट रही भाजपा और सपा
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यही वजह है कि मंगलवार को हुई राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की बैठक में यूपी के प्रतिनिधि भी शामिल होने नहीं पहुंचे। तो केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत ने भी बैठक से दूरी बनाई। दरअसल समाजवादी पार्टी ओबीसी को मिले 27 प्रतिशत आरक्षण के अंदर उपवर्गीकरण के पक्ष में नहीं है। जबकि आयोग की बैठक में ओबीसी आरक्षण के नीति पर मंथन होना था।
आयोग ने प्रस्ताव पारित कर ओबीसी के हित के लिए सरकार के सामने जो प्रमुख मांगे रखी हैं। उसमें इंदिरा साहनी मामले का हवाला देते हुए ओबीसी आरक्षण को उपवर्ग में बांटने का मामला प्रमुख है। समाजवादी पार्टी इस मामले का विरोध करती रही है। बताया जा रहा है कि विवाद से बचने के लिए ही यूपी का नुमाइंदा बैठक में शामिल होने नहीं आया।
क्या है ओबीसी आरक्षण का उपवर्गीकरण
तो गुजरात में पटेल, हरियाणा में जाट और महाराष्ट्र में मराठों ने आरक्षण की मांग कर भाजपा के लिए संकट पैदा कर रखा है। उपर से सरकार पर जातिगत जनगणना के आंकडे़ को सार्वजनिक करने का दबाव है। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की बैठक से केंद्रीय मंत्री गहलोत के दूरी बनाने की मुख्य वजह यही मानी जा रही है।
सूत्र बताते हैं कि यूपी चुनाव की सियासी मजबूरी को भांपते हुए ही आयोग ने ओबीसी वर्ग के हित को ध्यान में रखते हुए प्रस्ताव के रूप में पीएम को अपनी कुछ मांगे भेजी है। मगर सपा-भाजपा की बेरूखी से आयोग की मांगों को झटका लगा सकता है। लेकिन आशा भरा रूख दिखाते हुए आयोग के सदस्य डा. शकील उज जमान अंसारी का कहना है कि पीएम मोदी पिछड़ी बिरादरी से हैं। इसलिए लोगों में उत्साह जगा है कि ओबीसी के सारे मसले हल हो जाएंगे।
क्या है ओबीसी आरक्षण का उपवर्गीकरण
वर्तमान में पूरे ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। लेकिन इसका लाभ कुछ संपन्न जातियों को ही मिल पा रहा है। आरक्षण का लाभ वंचितों को मिले इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय ने इंदिरा साहनी मामले में रूख स्पष्ट करते हुए ओबीसी आरक्षण के उपवर्गीकरण करने की बात कही है। उपवर्गीकरण के जरिए ओबीसी का 27 प्रतिशत आरक्षण विभिन्न जातियों की तीन श्रेणी में बंट जाएगा। आयोग ने इसी उपवर्गीकरण पर जोर दिया है।