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कोरेगांव जातीय जंग: भगवा मंसूबों पर फिरा पानी, संघ के समरसता अभियान को झटका
संजय मिश्र, नई दिल्ली
Updated Thu, 04 Jan 2018 09:15 AM IST
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कोरेगांव की जातीय हिंसा ने भगवा परिवार के अरमानों पर पूरी तरह से पानी फेर दिया है। एक तो संघ परिवार के समरसता अभियान को झटका लगा है। दलितों को साथ जोड़ संघ हिन्दुत्व के अपने एजेंडे को प्रभावी बनाना चाहता है। रोहित वेमूला मामले के बाद संघ ने दलित समाज में अपनी पैठ बढ़ाने के मकसद से समरसता अभियान चलाया है। मगर भाजपा शासित राज्यों में आए दिनों दलितों के खिलाफ होने वाले मामले संघ के इस समरसता अभियान को पलीता लग रहे हैं। पुणे के कोरेगांव की घटना भी संघ के मकसद में रोड़ा अटकाने वाली है।
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यही वजह है कि पुणे में जातीय हिंसा शुरू होने के तुरंत बाद संघ ने अपनी प्रतिक्रिया जताते हुए मामले से न सिर्फ दूरी बनाई है। बल्कि कहा है कि वह समाज में समरसता को बढ़ावा देने का कार्य करता है। तो दूसरी ओर संघ-भाजपा के लिए राजनीतिक और वैचारिक रूप से अहम माना-जाने वाला तीन तलाक का विधेयक भी संसद की दहलीज पर अटकता दिख रहा है। राज्यसभा में हंगामें की वजह से तीन तलाक पर सांसत में फंसी कांग्रेस को बच निकलने का मौका मिल गया है। राज्यसभा में तीन तलाक विधेयक पेश होते ही हंगामा मचा और सदन अगले दिन तक के लिए स्थगीत हो गई। उम्मीद कम है कि इस विधेयक को राज्यसभा में मंजूरी मिले।
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तीन तलाक को संसद की दहलीज पार करना हुआ मुश्किल
तीन तलाक को लोकसभा से बेशक मंजूरी मिल गई है। मगर वर्तमान शीत सत्र में इस विधेयक को संसद की दहलीज पार करने में मुश्किलें लग रही हैं। एक तो विपक्ष इस बिल को संसद की समिति के पास भेजे जाने की मांग कर रहा है। तो दूसरी ओर कोरेगांव की घटना को लेकर संसद में हुए हंगामें से विपक्ष को बच निकलने का मौका मिल गया है। जबकि सरकार की रणनीति है कि बिल पर वोटिंग कराकर कांग्रेस को वह बेनकाब करे। मगर यहां भी सरकार के मंसूबों को झटका लगते दिख रहा है। कोरेगांव की घटना को दलित अत्याचार से जोड़ते हुए कांग्रेस ने बुधवार को संसद के दोनों ही सदनों में हंगामा काटा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के जरिए संघ-भाजपा पर हमले के बाद कांग्रेस नेता मल्लिकार्जून खडग़े ने भगवा परिवार पर सियासी हमला बोलते हुए कहा कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं वहां दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं। उन्होंने भाजपा को दलित विरोधी पार्टी बनाया।
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दलित राजनीति से क्यों असहज है संघ
दलित राजनीति के उभर से संघ को अपने हिन्दूत्व के एजेंडे में पलीता लगने की आशंका रहती है। यही वजह है कि संघ ने अपने पार्टी शासित सरकारों के अलावा भाजपा को भी निर्देश दे रखा है कि वे अनुसूचित जाति के प्रति संवदेनशील दिखें। देश से छूआछूत समाप्त करने के नाम पर संघ ने बीते दो वर्षों से समरसता अभियान के तहत एक गांव, एक कुंआ, एक शमशान और एक मंदिर के मुहिम पर जोर दे रखा है। मगर समय-समय पर होने वाली दलित उत्पीडऩ की घटनाएं संघ के इस अभियान को पलीता लगा देती हैं। संघ रणनीतिकारों का मानना है कि दलित समुदाय के कटने से न सिर्फ हिन्दूत्व की मुहिम कमजोर पड़ेगी। बल्कि भाजपा का सियासी सफर भी मुश्किल होगा। जब-जब समाज में जातिवाद की राजनीति का उभार हुआ है। तब-तब भगवा परिवार के हिन्दूवादी एजेंडे को मात खानी पड़ी है। राम मंदिर ढांचा ढहाए जाने के बाद चार राज्यों में दोबरा से हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को मुलायम सिंह और मायावती के गठजोड के आगे यूपी में करारी मात खानी पडी थी। तो हिन्दूत्व की उभार के कमी में लंबे समय तक पार्टी का सूबे की सत्ता से बनवास रहा। इसके अलावा बीते बिहार विधानसभा चुनाव में भी नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव की जातीय गोलबंदी में भाजपा को मात खानी पड़ी थी। हाल ही में जातीय जंग का परिणाम भाजपा को गुजरात सरीखे राज्य में भी देखने को मिली है। हिन्दूत्व के प्रयोगशाला कहे जाने वाले राज्य में पार्टी की सरकार मुश्किल से बची है। यही वजह है कि भगवा परिवार देश की राजनीति को हिन्दूत्व के जरिए जातिय जंग से बचाने की कवायद में लगा रहता है। मगर समय-समय पर दलितों के खिलाफ होने वाले मामले और अन्य जातियों के आंदोलन उसकी राह में रोड़ा अटकाते रहते हैं।
काम नहीं आ रहे बौद्धिक योद्धा
रोमित बेमूला मामले के बाद भगवा परिवार की बनी एंटी दलित की छवि को थामने के लिए संघ ने जेनंद कुमार सरीखे अपने वरिष्ठ प्रचारक को काम में जुटाते हुए विभिन्न वर्गों में बौद्धिक योद्धाओं का निर्माण किया। ताकि वैचारिक जंग को वह जीत सके। मगर ये बौद्धिक योद्धा भी संघ के काम नहीं आ पा रहे हैं। उना की घटना को विपक्ष गुजरात में भूनाने में कामयाब रहा। तो जिग्रेश मेवानी उस घटना से बडे चेहरा बनकर उभरे हैं। उत्तर प्रदेश में भी भीम आर्मी का उदय भगवा परिवार के लिए भविष्य में संकट बढ़ा सकता है। अब पुणे की घटना के बाद जो हालात उभरे हैं उससे भी भागवा परिवार को झटका लगने के आसार हैं।
मराठा बनाम दलित के बजाय पेशवा बनाम दलित बनी कोरेगांव की जंग
कोरेगांव की जंग मराठा बनाम दलित बनने के बजाय पेशवा बनाम दलित बनती दिख रही है। मराठा मतदाता मूल रूप से भाजपा विरोधी है। उसपर कांग्रेस और रांकपा का कब्जा है। भाजपा रणनीतिकारों को उम्मीद थी की कोरेगांव की जंग मराठा बनाम दलित बनने से कांग्रेस और रांकपा को सियासी नुकशान होगा। और मराठा भाजपा की झोली में गिरेगा। शुरू में यह बात प्रचारित करने की कोशिश भी दिखी। मगर कोरेगांव की जंग पेशवा बनाम दलित होती जा रही है। पेशवाओं को भाजपा का समर्थक माना जाता है। वैसे राज्य में इनकी राजनीतिक ताकत न के बराबर है। अब लड़ाई पेशवा बनाम दलित बनने से भाजपा के साथ का दलित भी उसका साथ छोड़ सकता है। ऐसी स्थिति देखने को भी मिल रही है। केंद्र सरकार में मंत्री एवं भाजपा के सहयोगी नेता राम दास अठावले ने जिग्रेश मेवानी के सूर में सूर मिलाया है।