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Ayush Talk: कोरोनाकाल में आयुर्वेदिक औषधियों की रही अहम भूमिका, अभी भी जारी है कई तरह के शोध
Thu, 20 Oct 2022 07:04 PM IST
हिमांशु मिश्रा
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Thu, 20 Oct 2022 07:04 PM IST
सार
केंद्रीय आयुष मंत्रालय और राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में 'आयुर्वेद क्षेत्र में नैदानिक अनुसंधान' विषय पर वेबीनार आयोजित हुआ। इसमें बतौर वक्ता एनएएसी के अध्यक्ष डॉ. भूषण पटवर्धन ने शिरकत की।
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डॉ. भूषण पटवर्धन
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
कोरोनाकाल में आयुर्वेदिक औषधियों ने काफी अहम भूमिका निभाई। संक्रमण से बचाव के लिए आयुर्वेदिक औषधियों का प्रयोग हुआ। पिछले दो साल में इसके लिए खूब शोध भी हुए। इन शोध के नतीजे काफी सकारात्मक हैं। इनसे मालूम चलता है कि किस तरह से आयुर्वेदिक औषधियों ने करोड़ों लोगों को संक्रमण से बचाया और उन्हें शारीरिक व मानसिक तौर पर मजबूत बनाया।
ये बातें गुरुवार को केंद्रीय आयुष मंत्रालय और राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वेबीनार से निकलकर सामने आई। 'आयुर्वेद क्षेत्र में नैदानिक अनुसंधान' विषय पर आयोजित वेबीनार में बतौर वक्ता एनएएसी के अध्यक्ष डॉ. भूषण पटवर्धन ने शिरकत की। लंबे समय से आयुर्वेद पर काम कर रहे डॉ. भूषण ने आयुष के क्षेत्र में होने वाले शोध कार्यों और कोरोनाकाल में अपनाए गए उपायों के बारे में खुलकर बताया।
आइए जानते हैं वेबीनार में उन्होंने क्या-क्या कहा?
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ये बातें गुरुवार को केंद्रीय आयुष मंत्रालय और राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वेबीनार से निकलकर सामने आई। 'आयुर्वेद क्षेत्र में नैदानिक अनुसंधान' विषय पर आयोजित वेबीनार में बतौर वक्ता एनएएसी के अध्यक्ष डॉ. भूषण पटवर्धन ने शिरकत की। लंबे समय से आयुर्वेद पर काम कर रहे डॉ. भूषण ने आयुष के क्षेत्र में होने वाले शोध कार्यों और कोरोनाकाल में अपनाए गए उपायों के बारे में खुलकर बताया।
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आइए जानते हैं वेबीनार में उन्होंने क्या-क्या कहा?
आयुष में कोरोना पर किस तरह का शोध कार्य चल रहा है?
पिछले दो साल से कोरोना को लेकर आयुष पर कई तरह से शोध कार्य हो रहे हैं। 150 अलग-अलग तरह के नैदानिक अनुसंधान प्रकल्प पूरे भारत में हुए। 160 से ज्यादा अस्पतालों में ये चिकित्सा और नैदानिक अनुसंधान किया गया। इनमें से 75 आयुर्वेद के ऊपर हैं, 30 होमियोपैथी, 14 सिद्ध, 12 यूनानी और 19 योग के ऊपर हैं। इस तरह से राष्ट्रीय स्तर पर कई शोध कार्यक्रम चल रहे हैं।
पिछले दो साल से कोरोना को लेकर आयुष पर कई तरह से शोध कार्य हो रहे हैं। 150 अलग-अलग तरह के नैदानिक अनुसंधान प्रकल्प पूरे भारत में हुए। 160 से ज्यादा अस्पतालों में ये चिकित्सा और नैदानिक अनुसंधान किया गया। इनमें से 75 आयुर्वेद के ऊपर हैं, 30 होमियोपैथी, 14 सिद्ध, 12 यूनानी और 19 योग के ऊपर हैं। इस तरह से राष्ट्रीय स्तर पर कई शोध कार्यक्रम चल रहे हैं।
औषधीय तरीकों से कोरोना का कैसे इलाज हो सकता है?
कोरोना को दूर रखने के लिए शरीर की इम्यूनिटी को मजबूत करना सबसे बड़ी चुनौती है। ये बहुत महत्वपूर्ण होता है। दूसरी चीज कि हमारे शरीर में अलग-अलग तरह के शौक आते हैं, जिसे इन्फ्लेमेशन कहा जाता है। कोरोना इन दोनों को प्रभावित करता है। आज के आधुनिक विज्ञान में इन दोनों को व्यवस्थित रखने के लिए ज्यादा उपाय नहीं है। अभी वैक्सीन तो बनी है, लेकिन ये निर्धारित समय के लिए होती है। ऐसे में अगर लोग खुद की इम्यूनिटी मजबूत कर लेते हैं तो वह कई तरह की बीमारियों से लड़ने में सक्षम हो जाएंगे।
इसी को लेकर कोरोनाकाल में मिनिस्ट्री ऑफ आयुष ने स्टडी की। उस दौरान हाईड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का खूब प्रयोग किया गया। ये सुरक्षित भी नहीं थी, फिर भी लोगों ने इसका इस्तेमाल किया। उस वक्त आयुष मंत्रालय ने छह अलग-अलग अस्पतालों में काम कर रहे फ्रंट लाइन वर्कर्स के बीच इसका ट्रायल किया। सभी को अश्वगंधा दिया गया और पता किया गया कि क्या इससे बचाव हो सकता है क्या? इसके नतीजे काफी सकारात्मक आए। मालूम चला कि हाईड्रोक्सीक्लोरोक्वीन से बेहतर अश्वगंधा है। इसकी रिपोर्ट भी अब प्रकाशित हो चुकी है।
कोरोना को दूर रखने के लिए शरीर की इम्यूनिटी को मजबूत करना सबसे बड़ी चुनौती है। ये बहुत महत्वपूर्ण होता है। दूसरी चीज कि हमारे शरीर में अलग-अलग तरह के शौक आते हैं, जिसे इन्फ्लेमेशन कहा जाता है। कोरोना इन दोनों को प्रभावित करता है। आज के आधुनिक विज्ञान में इन दोनों को व्यवस्थित रखने के लिए ज्यादा उपाय नहीं है। अभी वैक्सीन तो बनी है, लेकिन ये निर्धारित समय के लिए होती है। ऐसे में अगर लोग खुद की इम्यूनिटी मजबूत कर लेते हैं तो वह कई तरह की बीमारियों से लड़ने में सक्षम हो जाएंगे।
इसी को लेकर कोरोनाकाल में मिनिस्ट्री ऑफ आयुष ने स्टडी की। उस दौरान हाईड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का खूब प्रयोग किया गया। ये सुरक्षित भी नहीं थी, फिर भी लोगों ने इसका इस्तेमाल किया। उस वक्त आयुष मंत्रालय ने छह अलग-अलग अस्पतालों में काम कर रहे फ्रंट लाइन वर्कर्स के बीच इसका ट्रायल किया। सभी को अश्वगंधा दिया गया और पता किया गया कि क्या इससे बचाव हो सकता है क्या? इसके नतीजे काफी सकारात्मक आए। मालूम चला कि हाईड्रोक्सीक्लोरोक्वीन से बेहतर अश्वगंधा है। इसकी रिपोर्ट भी अब प्रकाशित हो चुकी है।
रिसर्च और डेवलपमेंट के क्षेत्र में चल रही परियोजनाएं क्या हैं?
आयुर्वेद में कई तरह के शोध हुए। जानवरों पर भी परीक्षण किया गया। इसके अनुसार, पहले जानवर में इस तरह का वायरस डेवलप किया गया। फिर शोध से मालूम चला कि अलग-अलग आयुर्वेदिक वनस्पति का उपयोग करके वायरस को खत्म किया जा सकता है। ये तरह के वायरस पर असरदार होता है। इसके अलावा, नाक के जरिए कोरोनावायरस को रोकने के लिए भी शोध किया गया। ये संक्रमण इंसान के शरीर में नाक के जरिए ही प्रवेश करती है। ऐसे में एक अणुतेल पर भी शोध किया गया। ये पता करने की कोशिश हुई कि क्या इस तेल को नाक में डालने से कोरोनावायरस को शरीर में आने से रोका जा सकता है? इस शोध की रिपोर्ट भी आ चुकी है और इसके नतीजे काफी अच्छे मिले हैं। ये तेल कोरोनावायरस को नाक के जरिए शरीर में आने पर काफी हद तक रोकने में कामयाब हुई है।
आयुर्वेद में कई तरह के शोध हुए। जानवरों पर भी परीक्षण किया गया। इसके अनुसार, पहले जानवर में इस तरह का वायरस डेवलप किया गया। फिर शोध से मालूम चला कि अलग-अलग आयुर्वेदिक वनस्पति का उपयोग करके वायरस को खत्म किया जा सकता है। ये तरह के वायरस पर असरदार होता है। इसके अलावा, नाक के जरिए कोरोनावायरस को रोकने के लिए भी शोध किया गया। ये संक्रमण इंसान के शरीर में नाक के जरिए ही प्रवेश करती है। ऐसे में एक अणुतेल पर भी शोध किया गया। ये पता करने की कोशिश हुई कि क्या इस तेल को नाक में डालने से कोरोनावायरस को शरीर में आने से रोका जा सकता है? इस शोध की रिपोर्ट भी आ चुकी है और इसके नतीजे काफी अच्छे मिले हैं। ये तेल कोरोनावायरस को नाक के जरिए शरीर में आने पर काफी हद तक रोकने में कामयाब हुई है।
आयुष टास्क फोर्स क्या है?
ये टास्क फोर्स आयुष मंत्रालय ने बनाया है। इसमें देश के बहुत बड़े-बड़े वैज्ञानिक शामिल हैं। ये टास्क फोर्स ऐसी है, जिसमें आयुर्वेद और आयुष के अलावा मॉर्डन साइंस के वैज्ञानिक भी शामिल हैं। ये वैज्ञानिकों का एक नेटवर्क है। इस टास्क फोर्स के जरिए ही कोरोनाकाल में आयुष से जुड़ी दवाओं का एक ग्रुप बनाया गया। जो संक्रमित मरीज को दिया गया। जिनसे वह जल्दी ठीक हुए और उनका मानसिक स्तर भी बेहतर हुआ। इसमें योग को भी शामिल किया गया।
ये टास्क फोर्स आयुष मंत्रालय ने बनाया है। इसमें देश के बहुत बड़े-बड़े वैज्ञानिक शामिल हैं। ये टास्क फोर्स ऐसी है, जिसमें आयुर्वेद और आयुष के अलावा मॉर्डन साइंस के वैज्ञानिक भी शामिल हैं। ये वैज्ञानिकों का एक नेटवर्क है। इस टास्क फोर्स के जरिए ही कोरोनाकाल में आयुष से जुड़ी दवाओं का एक ग्रुप बनाया गया। जो संक्रमित मरीज को दिया गया। जिनसे वह जल्दी ठीक हुए और उनका मानसिक स्तर भी बेहतर हुआ। इसमें योग को भी शामिल किया गया।
क्या आयुर्वेद एलोपैथिक दवाओं में भी शामिल होता है?
जी, दवा तो दवा ही होता है। कोरोनाकाल के दौरान भी ऐसा ही हुआ। आयुर्वेदिक दवाओं का प्रयोग कोरोना को रोकने और सही करने के लिए आधिकारिक तौर पर किया। इसके नतीजे अच्छे आए थे। लोगों को इसका काफी फायदा मिला।
आयुर्वेदिक दवाओं के शोध में समान तरीका अपनाया जाता है?
नहीं, मॉर्डन ट्रायल से हटकर आयुर्वेदिक दवाओं का ट्रायल होता है। हालांकि, हम ये भी कोशिश करते हैं कि मॉर्डन तरीका भी उसमें अपनाया जाए।
जी, दवा तो दवा ही होता है। कोरोनाकाल के दौरान भी ऐसा ही हुआ। आयुर्वेदिक दवाओं का प्रयोग कोरोना को रोकने और सही करने के लिए आधिकारिक तौर पर किया। इसके नतीजे अच्छे आए थे। लोगों को इसका काफी फायदा मिला।
आयुर्वेदिक दवाओं के शोध में समान तरीका अपनाया जाता है?
नहीं, मॉर्डन ट्रायल से हटकर आयुर्वेदिक दवाओं का ट्रायल होता है। हालांकि, हम ये भी कोशिश करते हैं कि मॉर्डन तरीका भी उसमें अपनाया जाए।