दिल्ली सहित चार राज्यों में बजने वाला है चुनाव का बिगुल, समझिए पूरा सियासी समीकरण
- दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटों पर आम आदमी पार्टी का कब्जा
- हरियाणा में भाजपा ने बनाया था इतिहास, 90 विधानसभा सीटों में 47 पार्टी की
- महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी करेंगी भाजपा-शिवसेना गठबंधन से मुकाबला
- झारखंड विधानसभा चुनाव में छाया रहेगा पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण का मुद्दा
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विस्तार
लोकसभा चुनाव के करीब 4 महीने बाद अब विधानसभा चुनाव की सरगर्मी बढ़ने जा रही है। इसे लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में इस साल के आखिर में चुनाव होने वाले हैं, जबकि दिल्ली में 2020 की शुरुआत में चुनाव होंगे। आइए जानने की कोशिश करते हैं कि इन चार राज्यों का क्या है सियासी समीकरण और इस बार किसके हाथ लग सकती है बाजी।
दिल्ली में दिलचस्प हो सकती है चुनावी जंग
दिल्ली विधानसभा का कार्यकाल फरवरी 2020 में पूरा हो जाएगा। उम्मीद जताई जा रही है कि चुनाव आयोग इसी साल के अंत में दिल्ली के चुनाव कराने की घोषणा कर सकता है। इस साल हुए लोकसभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज करने के बाद भारतीय जनता पार्टी की कोशिश रहेगी कि दिल्ली में भी सरकार उसी की बने, वहीं वर्तमान में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी भी भाजपा को कड़ी टक्कर देगी। पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव की तरह इस बार परिणाम के एकतरफा होने की संभावनाएं बेहद कम हैं।
दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटों पर आम आदमी पार्टी का कब्जा है। साल 2015 में हुए दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भाजपा को महज तीन सीटों पर जीत मिली थी। इस बार स्थिति वैसी न हो इसके लिए भाजपा तैयारी शुरू कर चुकी है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने प्रकाश जावड़ेकर को चुनाव प्रभारी और हरदीप सिंह पुरी और नित्यानंद राय को चुनाव सह प्रभारी नियुक्त किया है।
हालांकि, आप सरकार और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा हाल में लिए गए कई फैसले भाजपा की राह में रोड़ा डाल सकते हैं। दो सौ यूनिट तक मुफ्त बिजली देने का केजरीवाल का फैसला मतदाताओं को अपनी ओर फिर से आकर्षित कर सकता है। हालांकि, हाल ही में आम आदमी पार्टी की चांदनी चौक विधानसभा से विधायक अलका लांबा की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात से कयास लगाए जा रहे हैं कि वह कांग्रेस में शामिल हो सकती हैं।
दिल्ली में कांग्रेस की स्थिति की बात करें तो पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के निधन के बाद यहां कांग्रेस और कमजोर हुई है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस राज्य में खाता भी नहीं खोल पाई थी। ऐसे में दिल्ली में कांग्रेस की कोशिश रहेगी कि किसी तरह से राज्य में खाता तो खोला ही जाए। कुछ आप नेताओं से कांग्रेस नेताओं की मुलाकात इस बात की आहट जरूर दे रही है कि कांग्रेस इस बार पिछली बार जैसा परिणाम न होने देने की पूरी कोशिश में है।
हरियाणा में क्या कायम रह पाएगा भाजपा का वर्चस्व?
हरियाणा विधानसभा के चुनाव अक्तूबर महीने में होने हैं। साल 2014 में हुए हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इतिहास बनाते हुए पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई थी। राज्य की कुल 90 विधानसभा सीटों में भाजपा ने 47 सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं, कांग्रेस को 15, इंडियन नेशनल लोकदल को 19 सीटें मिली थीं। इसके अलावा अन्य व निर्दलीयों ने नौ सीटों पर जीत दर्ज की थी।
हरियाणा में पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो भाजपा की सफलता का सबसे बड़ा कारण बिखरा विपक्ष था। कांग्रेस में चल रही गुटबाजी और इनेलो के बिखराव ने भाजपा की जीत तय करने में अहम भूमिका निभाई थी। इनेलो का दो भागों में बंट जाने से जाट मतदाताओं के सामने यह स्थिति आ गई कि वह दुविधा में फंस गए कि वह इनेलो का साथ दें या कांग्रेस का। राजनीति के विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे जाट मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के पास आया।
वहीं, कांग्रेस की बात करें तो हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी हाईकमान ने संगठन में बड़ा बदलाव किया है। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष पद से अशोक तंवर और कांग्रेस विधायक दल के नेता पद से किरण चौधरी की छुट्टी कर दी गई है। राज्यसभा सांसद कुमारी सैलजा को हरियाणा कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया गया है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को चुनाव प्रबंधन समिति का चेयरमैन नियुक्त करने के साथ ही सीएलपी लीडर व नेता विपक्ष की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है।
ऐसे में कांग्रेस को फिर सत्ता में लाने की जिम्मेदारी हुड्डा के कंधों पर आ गई है। उन पर जीत दिलाने का दबाव रहेगा। चुनाव से ठीक पहले संगठन में हुए बड़े बदलाव को अगर हुड्डा विरोधी खेमे ने अंदरखाने स्वीकार नहीं किया तो कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में भीतरघात का सामना करना पड़ सकता है। तंवर के कई समर्थक टिकट की आस लगाए हुए थे। ऐसे में तंवर व सीएलपी किरण चौधरी खेमे को चुनाव में पूरे उत्साह के साथ उतारना सैलजा व हाईकमान के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।
क्या महाराष्ट्र में कमाल कर पाएगा भाजपा-शिवसेना का साथ?
महाराष्ट्र में भी इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। 288 विधानसभा सीटों वाले महाराष्ट्र में साल 2014 का चुनाव भाजपा और शिवसेना ने अलग-अलग लड़ा था। 124 सीटों पर जीत हासिल करने के साथ भाजपा राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। चुनाव के बाद भाजपा-शिवसेना की सरकार बनी थी। इस बार कयास लगाए जा रहे हैं कि दोनों पार्टियां मिलकर चुनाव लड़ेंगी।
हालांकि, राज्य में सीट बंटवारे को लेकर भाजपा की योजना शिवसेना को सौ से ज्यादा सीटें न देने की है। सीट बंटवारे को लेकर शिवसेना द्वारा बैठक बुलाए जाने संबंधी प्रस्तावों को भी भाजपा लगातार टाल रही है। वहीं, इस बार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और एनसीपी मिलकर भाजपा-शिवसेना गठबंधन से मुकाबला करने के लिए तैयार हैं।
झारखंड में खासा असर डालेगा पिछड़ा वर्ग आरक्षण का मुद्दा
साल 2014 में झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 81 में से 37 सीटों पर जीत हासिल की थी। भाजपा और अजसू ने मिलकर राज्य में सरकार बनाई थी। बाद में झारखंड मुक्ति मोर्चा के छह विधायक भाजपा में आ गए थे। वर्तमान में राज्य में भाजपा के 43 विधायक हैं वहीं, झारखंड मुक्ति मोर्चा के 19 और कांग्रेस के छह विधायक हैं। भाजपा ने इस बार झारखंड में 65 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है।
आगामी विधानसभा चुनाव में पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण का मुद्दा खासा असर डालेगा। बता दें कि राज्य में ओबीसी का 14 फीसदी आरक्षण है और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने इसे बढ़ाकर 27 फीसदी करने का वादा किया है। ऐसे में पिछड़े वर्ग को लुभाने के लिए भाजपा क्या कदम उठाएगी यह देखने वाला होगा।