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वो धमाका जिसने राजीव गांधी को मार डाला

रेहान फजल/बीबीसी संवाददाता Updated Sat, 21 May 2016 10:57 AM IST
assassination day of rajiv gandhi
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अपनी हत्या से कुछ ही पहले अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने कहा था कि अगर कोई अमेरिका के राष्ट्रपति को मारना चाहता है तो ये कोई बडी बात नहीं होगी बशर्ते हत्यारा ये तय कर ले कि मुझे मारने के बदले वो अपना जीवन देने के लिए तैयार है। "अगर ऐसा हो जाता है तो दुनिया की कोई भी ताकत मुझे बचा नहीं सकती।  21 मई, 1991 की रात दस बज कर 21 मिनट पर तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में ऐसा ही हुआ।  तीस साल की एक नाटी, काली और गठीली लडकी चंदन का एक हार ले कर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की तरफ बढी।  जैसे ही वो उनके पैर छूने के लिए झुकी, कानों को बहरा कर देने वाला धमाका हुआ।  उस समय मंच पर राजीव के सम्मान में एक गीत गाया जा रहा था.... राजीव का जीवन हमारा जीवन है...अगर वो जीवन इंदिरा गांधी के बेटे को समर्पित नहीं है... तो वो जीवन कहाँ का?  वहाँ से मुश्किल से दस गज की दूरी पर गल्फ न्यूज की संवाददाता और इस समय डेक्कन क्रॉनिकल, बंगलौर की स्थानीय संपादक नीना गोपाल, राजीव गांधी के सहयोगी सुमन दुबे से बात कर रही थीं।





नीना याद करती हैं, "मुझे सुमन से बातें करते हुए दो मिनट भी नहीं हुए थे कि मेरी आंखों के सामने बम फटा।  मैं आमतौर पर सफेद कपडे नहीं पहनती।  उस दिन जल्दी-जल्दी में एक सफेद साडी पहन ली।  बम फटते ही मैंने अपनी साडी की तरफ देखा।  वो पूरी तरह से काली हो गई थी और उस पर मांस के टुकडे और खून के छींटे पडे हुए थे।  ये एक चमत्कार था कि मैं बच गई।  मेरे आगे खडे सभी लोग उस धमाके में मारे गए थे।" नीना बताती हैं, "बम के धमाके से पहले पट-पट-पट की पटाखे जैसी आवाज सुनाई दी थी।  फिर एक बडा सा हूश हुआ और जोर के धमाके के साथ बम फटा।  जब मैं आगे बढीं तो मैंने देखा लोगों के कपडो में आग लगी हुई थी, लोग चीख रहे थे और चारों तरफ भगदड मची हुई थी।  हमें पता नहीं था कि राजीव गांधी जीवित हैं या नहीं। " श्रीपेरंबदूर में उस भयंकर धमाके के समय तमिलनाडु कांग्रेस के तीनों चोटी के नेता जी के मूपनार, जयंती नटराजन और राममूर्ति मौजूद थे।  जब धुआँ छटा तो राजीव गाँधी की तलाश शुरू हुई।  उनके शरीर का एक हिस्सा औंधे मुंह पडा हुआ था। उनका कपाल फट चुका था और उसमें से उनका मगज निकल कर उनके सुरक्षा अधिकारी पीके गुप्ता के पैरों पर गिरा हुआ था जो स्वयं अपनी अंतिम घडियाँ गिन रहे थे।



बाद में जी के मूपनार ने एक जगह लिखा, "जैसे ही धमाका हुआ लोग दौडने लगे। मेरे सामने क्षत-विक्षत शव पडे हुए थे। राजीव के सुरक्षा अधिकारी प्रदीप गुप्ता अभी जिंदा थे।  उन्होंने मेरी तरफ देखा।  कुछ बुदबुदाए और मेरे सामने ही दम तोड दिया मानो वो राजीव गाँधी को किसी के हवाले कर जाना चाह रहे हों।  मैंने उनका सिर उठाना चाहा लेकिन मेरे हाथ में सिर्फ मांस के लोथडे और खून ही आया।  मैंने तौलिए से उन्हें ढक दिया। "मूपनार से थोडी ही दूरी पर जयंती नटराजन अवाक खडी थीं। बाद में उन्होंने भी एक इंटरव्यू में बताया, "सारे पुलिस वाले मौके से भाग खडे हुए।  मैं शवों को देख रही थी, इस उम्मीद के साथ कि मुझे राजीव न दिखाई दें।  पहले मेरी नजर प्रदीप गुप्ता पर पडी... उनके घुटने के पास जमीन की तरफ मुंह किए हुए एक सिर पडा हुआ था...  मेरे मुंह से निकला ओह माई गॉड... दिस लुक्स लाइक राजीव। " वहीं खडी नीना गोपाल आगे बढती चली गईं, जहाँ कुछ मिनटों पहले राजीव खड़े हुए थे। नीना बताती है, "मैं जितना भी आगे जा सकती थी, गई।  तभी मुझे राजीव गाँधी का शरीर दिखाई दिया।  मैंने उनका लोटो जूता देखा और हाथ देखा जिस पर गुच्ची की घडी बँधी हुई थी।  थोडी देर पहले मैं कार की पिछली सीट पर बैठकर उनका इंटरव्यू कर रही थी।  राजीव आगे की सीट पर बैठे हुए थे और उनकी कलाई में बंधी घडी बार-बार मेरी आंखों के सामने आ रही थी।



इतने में राजीव गांधी का ड्राइवर मुझसे आकर बोला कि कार में बैठिए और तुरंत यहाँ से भागिए।  मैंने जब कहा कि मैं यहीं रुकूँगी तो उसने कहा कि यहाँ बहुत गड़बड़ होने वाली है।  हम निकले और उस एंबुलेंस के पीछे पीछे अस्पताल गए जहाँ राजीव के शव को ले जाया जा रहा था। "दस बज कर पच्चीस मिनट पर दिल्ली में राजीव के निवास 10, जनपथ पर सन्नाटा छाया था।  राजीव के निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज अपने चाणक्यपुरी वाले निवास की तरफ निकल चुके थे। जैसे ही वो घर में दाखिल हुए, उन्हें फोन की घंटी सुनाई दी। दूसरे छोर पर उनके एक परिचित ने बताया कि चेन्नई में राजीव से जुड़ी बहुत दुखद घटना हुई है। जॉर्ज वापस 10 जनपथ भागे।  तब तक सोनिया और प्रियंका भी अपने शयन कक्ष में जा चुके थे।  तभी उनके पास भी ये पूछते हुए फोन आया कि सब कुछ ठीक तो है।  सोनिया ने इंटरकॉम पर जॉर्ज को तलब किया।  जॉर्ज उस समय चेन्नई में पी. चिदंबरम की पत्नी नलिनी से बात कर रहे थे।  सोनिया ने कहा जब तक वो बात पूरी नहीं कर लेते वो लाइन को होल्ड करेंगीं। नलिनी ने इस बात की पुष्टि की कि राजीव को निशाना बनाते हुए एक धमाका हुआ है लेकिन जॉर्ज सोनिया को ये खबर देने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।  दस बज कर पचास मिनट पर एक बार फिर टेलीफोन की घंटी बजी। 



रशीद किदवई सोनिया की जीवनी में लिखते हैं, "फोन चेन्नई से था और इस बार फोन करने वाला हर हालत में जॉर्ज या मैडम से बात करना चाहता था।  उसने कहा कि वो खुफिया विभाग से है।  हैरान परेशान जॉर्ज ने पूछा राजीव कैसे हैं?  दूसरी तरफ से पाँच सेकेंड तक शांति रही, लेकिन जॉर्ज को लगा कि ये समय कभी खत्म ही नहीं होगा।  वो भर्राई हुई आवाज में चिल्लाए तुम बताते क्यों नहीं कि राजीव कैसे हैं?  फोन करने वाले ने कहा, सर वो अब इस दुनिया में नहीं हैं और इसके बाद लाइन डेड हो गई। " जॉर्ज घर के अंदर की तरफ मैडम, मैडम चिल्लाते हुए भागे।  सोनिया अपने नाइट गाउन में फौरन बाहर आईं।  उन्हें आभास हो गया कि कुछ अनहोनी हुई है। आम तौर पर शांत रहने वाले जॉर्ज ने इस तरह की हरकत पहले कभी नहीं की थी।  जॉर्ज ने काँपती हुई आवाज में कहा "मैडम चेन्नई में एक बम हमला हुआ है। "सोनिया ने उनकी आँखों में देखते हुए छूटते ही पूछा, "इज ही अलाइव? " जॉर्ज की चुप्पी ने सोनिया को सब कुछ बता दिया। 



रशीद बताते हैं, "इसके बाद सोनिया पर बदहवासी का दौरा पडा और 10 जनपथ की दीवारों ने पहली बार सोनिया को चीख कर विलाप करते सुना।  वो इतनी जोर से रो रही थीं कि बाहर के गेस्ट रूम में धीरे-धीरे इकट्ठे हो रहे कांग्रेस नेताओं को वो आवाज साफ सुनाई दे रही थी।  वहाँ सबसे पहले पहुंचने वालों में राज्यसभा सांसद मीम अफजल थे। उन्होंने मुझे बताया कि सोनिया के रोने का स्वर बाहर सुनाई दे रहा था।  उसी समय सोनिया को अस्थमा का जबरदस्त अटैक पडा और वो करीब-करीब बेहोश हो गईं।  प्रियंका उनकी दवा ढूँढ रही थीं लेकिन वो उन्हें नहीं मिली।  वो सोनिया को दिलासा देनी की कोशिश भी कर रही थीं लेकिन सोनिया पर उसका कोई असर नहीं पड़ रहा था। "इस केस की जाँच के लिए सीआरपीएफ के आईजी डॉक्टर डी आर कार्तिकेयन के नेतृत्व में एक विशेष जाँच दल का गठन किया।  कुछ ही महीनो में इस हत्या के आरोप में एलटीटीई को सात सदस्यों को गिरफ्तार किया गया।  मुख्य अभियुक्त शिवरासन और उसके साथियों ने गिरफ्तार होने से पहले साइनाइड खा लिया।
 


डॉक्टर कार्तिकेयन ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "आप कह सकते हैं हमारी पहली सफलता थी हरि बाबू के कैमरे से उन दस तस्वीरों का मिलना।  हमने आम लोगों से सूचनाएं लेने के लिए अखबारों में विज्ञापन दिया और एक टॉल फ्री नंबर भी दिया।  हमारे पास कुल तीन चार हजार टेलीफोन कॉल आए।  हर एक कॉल को गंभीरता से लिया गया।  हमने चारों तरफ छापे मारने शुरू किए और जल्द ही हमें सफलता मिलनी शुरू हो गई।" "पहले दिन से ही मैं इस काम में 24 घंटे, हफ्ते के सातों दिन बिना किसी आराम के लगा रहा।  मैं रोज रात के दो बजे काम के बाद कुछ घंटों की नींद लेने के लिए गेस्ट हाउस पहुंचता था।  सारी जाँच तीन महीने में पूरी हो गई लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट्स आने में समय लगा लेकिन हत्या की पहली वर्षगाँठ से पहले हमने अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी थी। " कुछ दिनों बाद सोनिया गांधी ने इच्छा प्रकट की कि वो नीना गोपाल से मिलना चाहती हैं।

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