असम में महागठबंधन ने विधानसभा चुनाव को बनाया दिलचस्प
- 35 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट रखने की चुनौती
- भाजपा ने गैरमुस्लिम बिरादरी की अस्मिता को असम की अस्मिता से जोड़ा
विस्तार
पूर्वोत्तर की राजनीति की धुरी असम है। बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एजीपी-बीपीएफ के साथ सत्ता हासिल कर चमत्कार कर दिखाया था। तब कांग्रेस को अचानक सक्रिय राजनीति में उतरे इत्र व्यवसायी बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ से चुनाव पूर्व गठबंधन न करने की टीस थी। इस बार न सिर्फ यह टीस खत्म हुई है, बल्कि कांग्रेस ने अजमल से हाथ मिलाने के अलावा वामदलों और आंचलिक गणमोर्चा के साथ महागठबंधन बना कर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।
भाजपा की रणनीति
मुकाबला असम की अस्मिता बनाम धर्मनिरपेक्ष राजनीति है। भाजपा ने असम की अस्मिता के साथ गैरमुस्लिम बिरादरी की अस्मिता को जोड़ कर नया समीकरण बनाया है। इसके उलट विपक्षी महागठबंधन की पूरी कोशिश गैरराजग वोट को बिखरने से रोकने पर है। महागठबंधन के रणनीतिकारों का मानना है कि अगर मुस्लिम वोट नहीं बंटे तो राज्य से राजग की सत्ता से विदाई की पटकथा लिखी जा सकती है।
बिखराव का भाजपा को मिला है लाभ
बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एजीपी और बीपीएफ के साथ गठबंधन बना कर कांग्रेस की डेढ़ दशक पुरानी सत्ता को खत्म कर दिया था। मुस्लिम राजनीति के पैरोकार एआईयूडीएफ के उदय के कारण इस बिरादरी के मतों में हुए बंटवारे ने पूर्वोत्तर की राजनीति में नई पटकथा लिखी थी। इसके बाद लोकसभा चुनाव में भी विपक्षी मतों में बंटवारे का सीधा लाभ भाजपा को मिला और पार्टी 14 में से नौ सीटें जीतने में कामयाब रही।
जिधर मुसलमान, उधर सत्ता
राज्य में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी 35 फीसदी है। नौ जिले मुस्लिम बहुल हैं। राज्य की पचास से अधिक ऐसी सीटें हैं जहां मुसलमानों का एकमुश्त वोट किसी भी दल के लिए सत्ता का दरवाजा खोल देते हैं। हालांकि बीते लोकसभा और विधानसभा चुनाव में एआईयूडीएफ के कारण मुस्लिम मतों में बंटवारा हुआ और इसके साथ ही भाजपा ने पूर्वोत्तर के सबसे अहम राज्य पर कब्जा जमाया।
महागठबंधन क्यों अहम?
राजनीति में हमेशा दो और दो चार नहीं होते। बीते कुछ सालों में ध्रुवीकरण के समांतर दूसरे वर्ग के ध्रुवीकरण ने सियासत में बड़ा बदलाव किया है। हालांकि, आंकड़ों के लिहाज से देखें तो कांग्रेस की अगुआई में बना महागठबंधन भाजपा के लिए बड़ी चुनौती पेश कर सकता है। मसलन जिन चार दलों के बीच महागठबंधन हुआ है उनका वोट शेयर बीते चुनाव में 49 फीसदी था। जबकि राजग को 41.5 फीसदी वोट मिले थे। बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस-एआईयूडीएफ का संयुक्त वोट राजग के 36 फीसदी से सात फीसदी अधिक था।
भाजपा की चुनौती
- विपक्ष का महागठबंधन
- पार्टी में तीन अलग-अलग ताकतवर गुट के बीच वर्चस्व की लड़ाई
- पांच साल की सत्ता के कारण सत्ता विरोधी रुझान पाटने की चुनौती
ताकत
- पीएम की लोकप्रियता
- असम अस्मिता का सवाल
- राज्य में कराए गए विकास कार्य
विपक्ष की ताकत
- पहली बार महागठबंधन का अस्तित्व में आना
- एनआरसी पर फैला भ्रम
- मुस्लिम मतों के एकजुट होने की संभावना
कमजोरी
- कद्दावर चेहरे का अभाव
- महागठबंधन में एक चेहरे पर आमसहमति नहीं
- बदरुद्दीन अजमल की राजनीतिक महात्वाकांक्षा
विधानसभा चुनाव 2016
| पार्टी | वोट प्रतिशत | सीट |
| भाजपा | 29.5 | 60 |
| एजीपी | 8.1 | 14 |
| बीपीएफ | 3.9 | 12 |
| कांग्रेस | 30.9 | 26 |
| एआईयूडीएफ | 13 | 13 |
लोकसभा चुनाव 2019
| पार्टी | वोट प्रतिशत | सीट |
| राजग | 45 | 9 |
| कांग्रेस | 35 | 3 |
| एआईयूडीएफ | 8 | 1 |