छात्र जीवन में भी अरुण जेटली थे मिजाज के बादशाह, कभी नहीं फंसे खेमेबाजी में
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विजय कुमार अरुण जेटली के सहपाठी रहे हैं। बड़े चाव से अरुण जेटली का मिजाज बताते हुए कहते हैं कि छात्र जीवन में भी अरुण जेटली मिजाज के बादशाह थे। ऊंचा सोचना, अच्छा करना और गलत लोगों से दूरी बनाकर रहना जेटली की फितरत में था। अरुण जेटली के निधन के बाद उन्हें अपना गुरु मानने वाले सुधीर अग्रवाल भी कहते हैं कि जेटली ने हमेशा अपने मिजाज से राजनीति की। कभी किसी खेमेबाजी में नहीं फंसे और हमेशा अपनी अलग पहचान बनाए रखी।
जन नेता की जगह क्लास के नेता
जेटली ने कामकाज के बल पर हमेशा राजनीति की। जेटली हमेशा रणनीति बनाने के लिए जाने जाते थे और जननेता की बजाय वह हमेशा क्लास के नेता बने रहे। सूत्र बताते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में जेटली वाणिज्य मंत्री थे। बाद में राम जेठमलानी के कानून मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद वे कानून मंत्री बने, लेकिन उस समय भी वे किसी खेमे में शामिल नहीं हुए। तब युवा नेताओं में भाजपा नेता प्रमोद महाजन का दबदबा था।
भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के नेता लाल कृष्ण आडवाणी की मुट्ठी में संगठन रहता था। अटल और आडवाणी का खेमा था, लेकिन अरुण जेटली दोनों ही खेमे में अपनी जगह बनाए हुए थे। अरुण जेटली की मीडिया वर्ग में भी लगातार एक गहरी पैठ बनी रही।
अमित शाह के लिए बने थे तारणहार
2010 में भाजपा की केंद्रीय राजनीति निराले सफर पर थी। लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव 2009 में भाजपा को खास सफलता नहीं मिल पाई थी। यही वह समय था जब सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में वर्तमान गृहमंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तड़ीपार हो चुके थे। लेकिन तब अरुण जेटली ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से अपनी दोस्ती निभाई और शाह के लिए तारण हार बने थे। धीरे-धीरे अरुण जेटली ने दिल्ली में नरेन्द्र मोदी के लिए जमीन तैयार करनी शुरू की।
2013 में मोदी को प्रचार अभियान का प्रमुख बनाए जाने के बाद पूरी तरह से खुलकर सामने आ गए। भाजपा की राजनीति में अहम भूमिका निभाई और राजनीति की धारा बदलकर रख दी। स्वास्थ्य की गंभीर समस्या से अरुण जेटली जूझ रहे थे, लेकिन इसके बावजूद 2019 के लोकसभा चुनाव में भी वह अपनी भूमिका निभाने के लिए लगातार सक्रिय रहे।
अंग्रेजी और हिंदी के प्रखर वक्ता
अरुण जेटली मंच के वक्ता के तौर पहचान नहीं बना पाए, लेकिन संसदीय राजनीति में और खासकर राज्यसभा में वह प्रखर वक्ता थे। उनमें अपने तर्कों से विरोधियों को छलनी कर देने की अद्भुत क्षमता थी। सरल तरीके से अंग्रेजी में अपनी बात रखने के साथ उन्हें हिन्दी में भी बात रखने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती थी। इतना ही नहीं जानकारी का विषय भी व्यापक था। खेल से लेकर हर क्षेत्र पर ठीक-ठीक समझ रखते थे। विषय और मुद्दों पर उनके पास हमेशा अपना आब्जर्वेशन रहता था।
जेटली के खाने के शौक से पीएम थे चिंतित
अरुण जेटली खाने के बेहद शौकीन थे, पंजाबी खाना उनकी खास रुचियों में था। संसद की वीवीआईपी कैंटीन के बंशीलाल पुरोहित का कहना है कि उनके खाने की अपनी च्वाइस होती थी। संसद के केंद्रीय हाल से लेकर अपने कमरे तक में वह मनपसंद खाने के लिए जाने जाते थे। प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधानमंत्री मोदी के मीडिया सलाहकार रहे जगदीश ठक्कर ने जेटली के खाने के शौक को लेकर प्रधानमंत्री मोदी की चिंता को साझा किया था।
ठक्कर बताते थे कि डाक्टरों की मनाही के बावजूद अरुण जेटली मुंह का स्वाद पूरा करने से नहीं चूकते थे। जब उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा तो प्रधानमंत्री ने जेटली को खाने पर नियंत्रण के लिए टोकना शुरू कर दिया था। ठक्कर के मुताबिक प्रधानमंत्री समय निकाल कर जेटली के घर पर फोन करके उनके खान-पान की जानकारी लेने लगे थे।