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एक राष्ट्र, एक चुनाव के समर्थन में भाजपा, अमित शाह ने विधि आयोग को लिखा पत्र
अमर उजाला डिजिटल ब्यूरो, नई दिल्ली
Updated Mon, 13 Aug 2018 09:29 PM IST
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अमित शाह
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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने विधि आयोग को एक पत्र लिखकर 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' के समर्थन की बात कही है। लोकसभा के एक पांच वर्षीय कार्यकाल में औसतन हर साल पांच से सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होते रहते हैं। इससे समूचा देश कभी राष्ट्रीय स्तर पर, राज्य स्तर या स्थानीय स्तर पर किसी न किसी चुनावी मोड में ही रहता है। यह चुनाव प्रक्रिया सार्वजनिक खजाने पर भारी बोझ डालती है। इस व्यय को पांच साल में सभी चुनाव एक साथ कराकर आसानी से कम किया जा सकता है।
शाह ने शुक्रवार को विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति बलबीर चौहान को लिखे अपने पत्र में एक चौंकाने वाले तथ्य का जिक्र किया है। महाराष्ट्र में 2016-17 के दौरान 365 दिन में से कोई न कोई हिस्सा 307 दिन के लिए आचार संहिता के अधीन था। सारा प्रशासन इन्हीं चुनावों में लगा रहता है। चुनाव में व्यस्त रहने के कारण अधिकारी एवं कर्मचारी विकास योजनाओं पर ध्यान नहीं दे पाते।
एक राष्ट्र, एक चुनाव की अवधारणा नई नहीं है। 1983 में प्रकाशित भारतीय निर्वाचन आयोग की पहली वार्षिक रिपोर्ट में एक राष्ट्र-एक चुनाव का सिद्धांत नजर आया था। साल 2015 में संसद की स्थायी समिति की 79वीं रिपोर्ट में इस सिद्धांत की झलक देखने को मिलती है।
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5 सितंबर 2016 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने समकालिक चुनाव आयोजित करने के विचार को स्पष्ट करते हुए कहा था, 'वर्तमान में पूरे देश में कहीं न कहीं चुनाव हो रहे हैं। इस वजह से नियमित कार्य रुक जाते हैं, क्योंकि उस दौरान आचार संहिता लागू होती है।
इससे न केवल राज्यों के, बल्कि केंद्र सरकार के काम भी बंद हो जाते हैं। हमारी संसदीय नीतियों को सफलतापूर्वक कार्यान्वित कर हमने अपनी क्षमता साबित की है। राजनीतिक दलों के सभी सदस्यों को इस समस्या और राजनीतिक स्थिरता निर्धारित करने के मुद्दों के बारे में सोचना होगा।'
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शाह ने शुक्रवार को विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति बलबीर चौहान को लिखे अपने पत्र में एक चौंकाने वाले तथ्य का जिक्र किया है। महाराष्ट्र में 2016-17 के दौरान 365 दिन में से कोई न कोई हिस्सा 307 दिन के लिए आचार संहिता के अधीन था। सारा प्रशासन इन्हीं चुनावों में लगा रहता है। चुनाव में व्यस्त रहने के कारण अधिकारी एवं कर्मचारी विकास योजनाओं पर ध्यान नहीं दे पाते।
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एक राष्ट्र, एक चुनाव की अवधारणा नई नहीं है। 1983 में प्रकाशित भारतीय निर्वाचन आयोग की पहली वार्षिक रिपोर्ट में एक राष्ट्र-एक चुनाव का सिद्धांत नजर आया था। साल 2015 में संसद की स्थायी समिति की 79वीं रिपोर्ट में इस सिद्धांत की झलक देखने को मिलती है।
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5 सितंबर 2016 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने समकालिक चुनाव आयोजित करने के विचार को स्पष्ट करते हुए कहा था, 'वर्तमान में पूरे देश में कहीं न कहीं चुनाव हो रहे हैं। इस वजह से नियमित कार्य रुक जाते हैं, क्योंकि उस दौरान आचार संहिता लागू होती है।
इससे न केवल राज्यों के, बल्कि केंद्र सरकार के काम भी बंद हो जाते हैं। हमारी संसदीय नीतियों को सफलतापूर्वक कार्यान्वित कर हमने अपनी क्षमता साबित की है। राजनीतिक दलों के सभी सदस्यों को इस समस्या और राजनीतिक स्थिरता निर्धारित करने के मुद्दों के बारे में सोचना होगा।'
4500 करोड़ रुपए खर्च होंगे
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अमित शाह ने लिखा है कि भाजपा ने अपने 2014 के चुनावी घोषणा पत्र में यह उल्लेख किया था कि पार्टी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ आयोजित करने की एक विधि विकसित करेगी। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में भारत सरकार ने 1,115 करोड़ रुपए खर्च किए थे।
अगली बार यानी 2014 में यह राशि 3870 करोड़ हो गई। राज्यसभा की स्थायी समिति को पेश अपनी रिपोर्ट में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कहा था कि अभी लोकसभा और विधानसभा चुनाव, दोनों एक साथ होते हैं तो इन पर करीब 4500 करोड़ रुपए खर्च होंगे।
यह राशि मौजूदा समय में चुनावों पर हो रहे खर्च से काफी कम है। भाजपा अध्यक्ष का कहना है, हम एक राष्ट्र, एक चुनाव के विषय पर बहस करने के लिए तैयार हैं। दूसरे दलों के रचनात्मक सुझावों, संशोधन, विकल्प और उनकी भागीदारी का स्वागत है।
भाजपा विधि आयोग से आग्रह करती है कि वह इस सिद्धांत को आगे बढ़ाने में अपने सार्थक प्रयास करे। यह विषय अन्य राजनीतिक दलों के साथ बहस के दरवाजे खोलेगा। यह आयोग इस बहस को इसके तार्किक निष्कर्ष की ओर अवश्य ले जाएगा।
अगली बार यानी 2014 में यह राशि 3870 करोड़ हो गई। राज्यसभा की स्थायी समिति को पेश अपनी रिपोर्ट में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कहा था कि अभी लोकसभा और विधानसभा चुनाव, दोनों एक साथ होते हैं तो इन पर करीब 4500 करोड़ रुपए खर्च होंगे।
यह राशि मौजूदा समय में चुनावों पर हो रहे खर्च से काफी कम है। भाजपा अध्यक्ष का कहना है, हम एक राष्ट्र, एक चुनाव के विषय पर बहस करने के लिए तैयार हैं। दूसरे दलों के रचनात्मक सुझावों, संशोधन, विकल्प और उनकी भागीदारी का स्वागत है।
भाजपा विधि आयोग से आग्रह करती है कि वह इस सिद्धांत को आगे बढ़ाने में अपने सार्थक प्रयास करे। यह विषय अन्य राजनीतिक दलों के साथ बहस के दरवाजे खोलेगा। यह आयोग इस बहस को इसके तार्किक निष्कर्ष की ओर अवश्य ले जाएगा।