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अमित शाह का प्लान 'बी', 26 राज्यों में भगवा परचम लहराने की 100% गारंटी

Sat, 19 May 2018 12:53 AM IST
हरेन्द्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
हरेन्द्र, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 19 May 2018 12:53 AM IST
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Amit Shah's plan 'B', 100 percent guarantee to win 26 states

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की डिक्शनरी में "बी" अक्षर की बहुत अहमियत है। चाहे पार्टी कार्यकारिणी की बैठक हो या कार्यकर्ताओं के साथ बैठक "बी" का जिक्र जरूर होगा। अमित शाह जानते हैं कि उन्हें किस संसाधन का इस्तेमाल कब और कहां करना है। चाहे चुनाव गुजरात के हों या कर्नाटक के या फिर राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों के हर विधानसभा क्षेत्र से जुड़े आंकड़े उन्हें मुंह जुबानी याद हैं। 

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हाल ही में कर्नाटक चुनावों में बीजेपी 104 सीटें हासिल कर सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। वहीं 2013 के कर्नाटक चुनावों की बात करें, तो आंकड़ें बेहद उलझाने वाले थे, मात्र 39 सीटें बीजेपी को मिली थीं। आज हालात एकदम उलट हैं और यह करिश्मा किया पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की चुनावी रणनीति ने। उन्हीं के नेतृत्व में 2014 से लेकर अभी तक हुए 15 चुनावों में बीजेपी को लगातार जीत हासिल हुई है और पूरे 26 राज्यों में भगवा परचम लहराने का उनका सपना है। 
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शाह की युवा टीम

सूत्र बताते हैं कि कर्नाटक चुनावों में बीजेपी की राज्य यूनिट ने पूरे देश के 400 से ज्यादा वॉलंटियर्स और प्रोफेशनल्स की मदद ली। वहीं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की पर्सनल टीम में तकरीबन 70-80 प्रोफेशनल्स भी थे, जो यूपी और गुजरात समेत कई चुनावों में उनकी मदद कर चुके हैं। इनका काम कर्नाटक चुनावों के लिए प्रतिक्रिया, योजना, रणनीति, निष्पादन और फीडबैक एकत्रित करने का रहा। इस टीम ने राज्य यूनिट के साथ मिल कर उनकी गतिविधियों पर निगरानी की। इनमें से अधिकांश ने विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों तक पहुंचने के लिए जमीन के स्तर पर काम किया। 
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सूत्र बताते हैं कि उनकी पर्सनल टीम में ज्यादातर लोग एसोसिएशन ऑफ ब्रिलिएंट माइंड्स (एबीएम) से जुड़े हुए हैं, जो उन्हें सोशल मीडिया, फाइनेंस, एडवरटाइजिंग, एनालिसिस, चुनाव क्षेत्र की प्रोफाइलिंग, कैंपेन डिजाइन और रणनीति बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। सूत्रों के मुताबिक शाह के वॉर रूम से जुड़े लोग उन्हें पहले यूपी, गुजरात चुनावों में भी अहम भूमिका निभा चुके हैं। कर्नाटक चुनावों के बाद अब वे राजस्थान और मध्य प्रदेश में आगामी होने वाले चुनावों की तैयारियों में जुट जाएंगे। खास बात यह है कि इन टीमों के ज्यादातर सदस्य गुजरात से हैं। सूत्रों के मुताबिक साल 2013 के मुकाबले इस बार टीम मैंबर्स की संख्या ज्यादा थी। उनकी रणनीति इतनी जबरदस्त थी कि प्रत्येक चुनावी क्षेत्र के लिए दो इंचार्ज बनाए गए, एक कर्नाटक से और दूसरा बाहरी राज्य से। सूत्र बताते हैं कि यह कुछ वैसा ही है कि जैसे पार्टी कैडर में चार निर्वाचन क्षेत्रों के लिए एक इंचार्ज चुना जाता है। 

शक्ति केन्द्रों की अहम भूमिका

Amit Shah's plan 'B', 100 percent guarantee to win 26 states

पार्टी सूत्रों के मुताबिक जमीनी स्तर की बात करें तो कर्नाटक चुनावों से ठीक पांच महीने पहले ही उन्होंने अपनी रणनीति बना ली थी। पांच महीनों में उन्होंने 34 दिन कर्नाटक में बिताए। इस दौरान उन्होंने 28 जिलों का दौरा किया और तकरबीन 57 हजार किलोमीटर की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने 59 रैलियां, 25 रोड शो और 38 से ज्यादा जनसभाएं की। उन्होंने 33 मंदिर और मठों का दौरा किया और "शक्ति केन्द्र" स्तर की 18 संगठनात्मक बैठकों में हिस्सा लिया। 

उनके साथ काम कर चुके पार्टी के एक नेता के मुताबिक "शक्ति केन्द्र" का कॉन्सेप्ट अमित शाह की ही देन है, जो बूथ कमेटियों का एकत्रिकरण है। 'बी फॉर बूथ' अमित शाह के लिए केवल शब्द मात्र नहीं हैं, बल्कि इसमें चुनाव जीतने की पूरी रणनीति समाई हुई है। हाल ही में 14 मई को राष्ट्रीय पदाधकारियों, समस्त प्रदेश अध्यक्षों और संगठन महामंत्रियों की बैठक में उन्होंने बूथ मैनेजमेंट पर पूरा जोर दिया। 

सूत्रों के मुताबिक हालिया कर्नाटक चुनावों का उदाहरण देते हुए वह बताते हैं कि राज्य में उन्होंने एक विस्तारक कार्यक्रम लॉन्च किया, जिसमें प्रत्येक नेता को अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में रात गुजारनी थी। प्रत्येक एमएलए को एक अन्य निर्वाचन क्षेत्र का प्रभार दिया गया, जहां से कोई बीजेपी विधायक निर्वाचित नहीं था। इसके अलावा प्रत्येक सांसद को 2 निर्वाचन क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई। बूथ मैनेजमेंट को मजबूती देने के लिए प्रमुख मतदाताओं, सेवादारों और धार्मिक नेताओं, सहकारी संघ के नेताओं, वकालत करने वालों और सेल्फ हेल्प ग्रुप के सदस्यों से संपर्क करने की जिम्मेदारी दी गई।

9 कार्यकर्ताओं को प्रत्येक बूथ की जिम्मेदारी दी गई, जिसमें जाति का खास ख्याल रखा गया। इसमें 2 महिलाएं, दो एससी-एसटी, दो ओबीसी सदस्यों को इसमें शामिल किया गया। इस प्रकार प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में 200 से ज्यादा बूथ बनाए गए, यहां तक कि कई जगहों पर 500 से ज्यादा बूथ भी बनाए गए। साथ ही यह सुनिश्चित किया गया कि प्रत्येक 5 बूथों पर बने शक्ति केन्द्र से जुड़े नेताओं को बूथ कमेटी पूरी रिपोर्टिंग करें।
 

प्लान "बी" 

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सूत्रों के मुताबिक उनका दूसरा प्लान "बी" बूथ मैनेजमेंट की रिपोर्ट को हकीकत में उतारने का होता यानी इसे दूसरा चरण भी कह सकते हैं। सूत्र उनकी रणनीति का खुलासा करते हुए बताते हैं कि बूथ कमेटी से पता चलता है कि मतदाता क्या चाहता है। इसका इस्तेमाल घोषणापत्र बनाने में किया जाता है। इसके लिए तकरीबन सभी इलाकों में घोषणापत्र सम्मेलन आयोजित किया जाता है, जिसमें उन लोगों को आमंत्रित किया जाता है जो बीजेपी से ताल्लुक नहीं रखते हैं। इसमें उनके विचार मांगे जाते हैं जिसका इस्तेमाल राज्य स्तर के घोषणापत्र को बनाने में किया जाता है। 

इसी प्लान में पार्टी ओबीसी, एससी-एसटी और किसान सम्मेलन जैसे आयोजन करती है। साथ ही कार्यकर्ताओं को नमो एप से संबोधन की रणनीति बनाई जाती है। लिंगायत मुद्दे का जिक्र करते हुए सूत्रों का कहना है कि जब सिद्धारमैया सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म घोषित करने की चुनावी दांव खेला तो शाह ने प्लान "बी" के तहत उनके मठों में पहुंचने की रणनीति तैयार की। साथ ही व्हाट्सअप ग्रुप्स और सोशल मीडिया को उन्होंने हथियार की तरह इस्तेमाल किया और वोटरों तक अपनी पहुंच बनाई। सूत्र बताते हैं कि प्लान "बी" में संघ परिवार का अहम किरदार होता है। आरएसएस, वीएचपी और बजरंग दल को डोर-टू-डोर कैंपेन में लगाया जाता है।

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