अमरनाथ यात्रा से जुड़ी वो सभी बातें, जो आपका जानना ज़रूरी हैं
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अमरनाथ यात्रा की क्या अहमियत है। और इसको लेकर किस तरह की सुरक्षा व्यवस्था की जाती है। अमरनाथ यात्रा से जुड़ी हर बात एक नज़र में क्या है। सुरक्षा व्यवस्था हालांकि भारत प्रशासित कश्मीर में मौजूदा तनाव को देखते हुए इस साल इस यात्रा में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है। इस यात्रा की शुरुआत से पहले सुरक्षा बलों ने मीडिया को जो जानकारी दी थी। उसके मुताबिक 300 किलोमीटर लंबे रूट के लिए सेना, पैरामिलिट्री फ़ोर्स और राज्य पुलिस के क़रीब 14 हज़ार जवानों को तैनात किया गया है।
सेना की दो बटालियनों के अलावा सीआरपीएफ़ और बीएसएफ़ की 100 टुकड़ियों को तैनात किया गया है। यह संख्या पिछले साल अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा कर रहे जवानों की तुलना में दोगुनी है। कश्मीर में मौजूदा तनाव को देखते हुए सुरक्षा बलों को किसी चरमपंथी हमले की आशंका पहले से थी। लिहाजा इस बार ज़्यादा सुरक्षा बलों को अत्याधुनिक तकनीकों से भी लैस किया गया था। अलग से बटालियनों को कवर अप के लिए भी तैनात रखा गया।
ये गुफा बर्फ़ से ढंकी रहती है। लेकिन गर्मियों में थोड़े वक्त के लिए जब गुफा के बाहर बर्फ़ मौजूद नहीं होती। उस वक्त में तीर्थयात्री यहां पुहंच सकते हैं। श्रावण के महीने में ये यात्रा शुरू होती है। इन दिनों 45 दिनों तक तीर्थ यात्री यहां आ सकते हैं। हालांकि यात्रा की शुरुआत कब हुई इसकी आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस यात्रा के लिए आने वाले लोगों की बढ़ती संख्या को देखकर ही 2000 में अमरनाथ श्राइन बोर्ड का गठन किया गया जो राज्य सरकार से मिलकर इस यात्रा आयोजन को कामयाब बनाता है।
शिवलिंग के साथ गणेश और पार्वती की बर्फ़ से बनी मूरत भी नज़र आती है। इसके दर्शन के लिए हर साल लाखों हिंदू अमरनाथ यात्रा के लिए अपना पंजीयन कराते हैं। सोमवार की रात को हुए चरमपंथी हमले से पहले भी अमरनाथ यात्रियों पर हमले हुए हैं। इस हमले से पहले 2 अगस्त, 2000 को चरमपंथियों ने पहलगाम के बेस कैंप में पर हमला किया था।
बेस कैंप में 32 लोग मारे गए थे। जिसमें 21 अमरनाथ यात्री थे। इसके बाद अगले साल 20 जुलाई, 2001 को अमरनाथ गुफा के रास्ते की सबसे ऊंचाई पर स्थित पड़ाव शेषनाग पर हमला हुआ। जिसमें 13 लोगों की मौत हुई थी। जिनमें तीन महिलाएं और दो पुलिस अधिकारी शामिल थे। इन हमलों को देखते हुए 2002 में अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा बल के 15 हज़ार जवानों को तैनात किया गया। बावजूद इसके, 6 अगस्त, 2002 को चरमपंथियों ने पहलगाम में हमला किया जिसमें नौ लोगों की मौत हुई थी। और 30 अन्य लोग घायल हो गए थे।