हाईकोर्ट के जज ने हिंदी में दिया पहला फैसला
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हाईकोर्ट में अपर न्यायमूर्ति के पद की शपथ लेने वाले न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने अपने पिता न्यायमूर्ति दिवंगत प्रेमशंकर गुप्त के पद चिह्नों पर चलते हुए न सिर्फ हिंदी में शपथ ग्रहण की बल्कि पहला निर्णय भी हिंदी में ही सुनाया।
शपथ ग्रहण के बाद न्यायमूर्ति अशोक कुमार हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायमूर्ति वीके शुक्ल के साथ खंडपीठ के सदस्य के रूप में बैठे। यह न्यायपीठ मिसलेनियस रिट का क्षेत्राधिकार रखती है।
उन्होंने एक मुकदमे में हिंदी में निर्णय लिखाया, जिसकी अधिवक्ताओं के बीच खासी प्रशंसा रही।
परंपरा निभा रहे हैं जज साहब
न्यायमूर्ति अशोक कुमार न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त के तीन पुत्रों में सबसे छोटे हैं। उनसे बड़े प्रदीप कुमार और दिलीप कुमार भी हाईकोर्ट में वकालत करते हैं तथा अधिवक्ता के तौर वह बहस हिंदी में ही करते हैं।
अधिवक्ता प्रदीप कुमार बताते हैं कि न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त ने अपने कार्यकाल में चार हजार से अधिक निर्णय हिंदी में ही दिए तथा पूरे जीवन हिंदी के प्रचार प्रसार में समर्पित रहे।
उन्होंने इटावा हिंदी निधि केे नाम से एक संस्था भी स्थापित की, जिसके प्रतिवर्ष कार्यक्रम होते हैं। इसमें हिंदी की सेवा करने वालों को सम्मानित किया जाता है। न्यायमूर्ति गुप्त को हिंदी सेवा के लिए हिंदी गौरव सम्मान और विश्व हिंदी सम्मेलन में विश्व हिंदी सम्मान भी प्राप्त हो चुका है।