कौन हैं अली लारीजानी?: कभी शांति नेता के रूप में जाने जाते थे, अब अमेरिका-इस्राइल को सबक सिखाने की दी चेतावनी
अली लारीजानी ईरान के वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता हैं, जो खामेनेई की हत्या के बाद सुरक्षा रणनीति के केंद्र में आ गए हैं। पहले व्यावहारिक और संतुलित नेता माने जाने वाले लारीजानी अब अमेरिका और इस्राइल को कड़ा जवाब देने की बात कर रहे हैं।
विस्तार
ईरान में सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद देश की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया है। इस कठिन समय में जो नाम सबसे आगे आया है, वह है अली लारीजानी। कभी शांत और व्यवहारिक नेता माने जाने वाले लारीजानी अब अमेरिका और इस्राइल को खुली चेतावनी दे रहे हैं। उन्होंने कहा है कि ईरान इस हमले का ऐसा जवाब देगा जिसे दुनिया याद रखेगी।
खामेनेई और आईआरजीसी कमांडर मोहम्मद पाकपोर की मौत के 24 घंटे के भीतर लारीजानी ने सरकारी टीवी पर आकर कड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका और जियोनिस्ट शासन ने ईरानी राष्ट्र के दिल में आग लगा दी है, अब हम उनके दिलों में आग लगाएंगे। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पर इस्राइली जाल में फंसने का आरोप भी लगाया। इस समय लारीजानी ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव हैं और संक्रमण काल में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
ईरान का प्रभावशाली परिवार
अली लारीजानी का जन्म 3 जून 1958 को इराक के नजफ में हुआ था। उनका परिवार ईरान की राजनीति में बेहद प्रभावशाली माना जाता है। उनके पिता मिर्जा हाशेम आमोली बड़े धार्मिक विद्वान थे। उनके भाई भी न्यायपालिका और असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स जैसे अहम पदों पर रह चुके हैं। इसी कारण कभी इस परिवार को ईरान का केनेडी परिवार भी कहा गया।
ये भी पढ़ें- तेल रिफाइनरी पर हमले से चिंतित खाड़ी देश, क्रेमलिन बोला- ईरान से बात करेंगे राष्ट्रपति पुतिन
शिक्षा और बौद्धिक पृष्ठभूमि
लारीजानी सिर्फ धार्मिक पृष्ठभूमि से नहीं आए। उन्होंने शरीफ यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी से गणित और कंप्यूटर साइंस में डिग्री ली। बाद में तेहरान विश्वविद्यालय से पश्चिमी दर्शन में मास्टर्स और पीएचडी की। उनका शोध 18वीं सदी के जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट पर था। यही कारण है कि उन्हें लंबे समय तक एक बौद्धिक और व्यावहारिक नेता माना गया।
क्रांति के बाद का सफर
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद उन्होंने आईआरजीसी जॉइन किया। बाद में वह संस्कृति मंत्री बने और फिर 1994 से 2004 तक सरकारी प्रसारक आईआरआईबी के प्रमुख रहे। 2008 से 2020 तक वह लगातार तीन बार संसद यानी मजलिस के स्पीकर रहे। इस दौरान उन्होंने घरेलू और विदेश नीति में अहम भूमिका निभाई।
परमाणु वार्ता और मतभेद
2005 में वह सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव और मुख्य परमाणु वार्ताकार बने। हालांकि 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद से मतभेद के बाद उन्होंने पद छोड़ दिया। बाद में 2015 के परमाणु समझौते यानी जेसीपीओए को संसद से मंजूरी दिलाने में उनकी बड़ी भूमिका रही।
ये भी पढ़ें- पश्चिम एशिया संकट: पीएम मोदी ने ओमान और कतर से की बात, 48 घंटों में आठ देशों के नेताओं से शांति बहाली पर चर्चा
राजनीतिक उतार-चढ़ाव
उन्होंने 2005 और फिर 2021 में राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की कोशिश की, लेकिन उन्हें गार्जियन काउंसिल ने अयोग्य घोषित कर दिया। 2024 में भी उनका नाम खारिज कर दिया गया। इसके बावजूद अगस्त 2025 में राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने उन्हें फिर से राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का सचिव नियुक्त किया।
सख्त रुख की ओर बदलाव
हाल के महीनों में उनका रुख काफी सख्त हुआ है। अक्तूबर 2025 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ सहयोग समझौता रद्द करने की घोषणा की थी। अब अमेरिका और इस्राइल के साथ जारी युद्ध में वह ईरान की सुरक्षा रणनीति के केंद्र में हैं। माना जा रहा है कि संक्रमण काल में वह तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद के साथ मिलकर देश की दिशा तय करेंगे।
अन्य वीडियो-
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.