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सियासी दोस्ती में चूक रहा अजित का हर दांव
शादाब रिजवी/ अमर उजाला, दिल्ली
Updated Sun, 22 May 2016 03:30 AM IST
सार
- भाजपा में जबरदस्त विरोध, जेडीयू से बात टूटी , बसपा-सपा दोस्ती करने को तैयार नहीं
- कांग्रेस से भी अभी पहल नहीं, अब खुद की चुनावी रणनीति का एलान जल्द
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अजित सिंह
- फोटो : PTI
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विस्तार
राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) का यूपी में अपनी खोई सियासी जमीन फिर हासिल करने के लिए राजनीतिक दलों की तरफ चला दोस्ती का दांव उल्टा साबित हो रहा है। किसी भी दल की तरफ से रालोद का साथ देने की ठोस पहल फिलहाल होती नहीं दिख रही है। हालात ऐसे हैं कि पिछले दिनों मजबूरी में पार्टी को खुद के बलबूते चलने का संदेश अपने कार्यकर्ताओं को देना पड़ा।
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अब पार्टी जल्द अपने बूते चुनावी जंग की रणनीति का एलान करने की तैयारी में है। 2012 के विधानसभा चुनाव में 2.33 प्रतिशत वोट हासिल कर नौ विधायक जिताने वाले रालोद को 2014 के लोकसभा चुनाव में शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा था। यहां तक कि पार्टी मुखिया अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी को नरेंद्र मोदी की आंधी में पराजय झेलनी पड़ी थी। अब 2017 में सूबे में अपनी पकड़ बनाने और सत्ता में दखल रखने के लिए बेताब रालोद मुखिया की तरफ से फेंका गया गठबंधन का पासा एक तरह से उल्टा ही साबित हो रहा है। इस साल के शुरू में रालोद की पहली कोशिश बसपा से दोस्ती की हुई, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। सूबे की सत्ता में कभी दोस्त रही सपा ने इस मुद्दे पर रालोद से बात ही करना मुनासिब नहीं समझा।
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जेडीयू से बात परवान चढ़ी लेकिन पार्टी में वर्चस्व की जंग में आखरी पायदान पर दोस्ती धड़ाम हो गई। भाजपा के साथ गठबंधन का पासा फेंका गया, दोनों दलों के कुछ नेता इसके लिए राजी भी हुए, लेकिन यूपी खासकर वेस्ट यूपी के नेताओं ने इसका विरोध कर दिया। अजित सिंह के सजातीय भाजपा नेताओं ने आरएसएस तक विरोध की आग सुलगा दी। भाजपा रालोद की दोस्ती की यह कोशिश भी खटाई में पड़ गई। दूसरे दलों के प्रेम के मद्देनजर पिछले चुनाव में साथ रही कांग्रेस से भी अभी तक फिर से चुनावी सियासी पारी खेलने की कोई पहल शुरू नहीं हो सकी।
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हताश रालोद अब कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए अपने बूते चुनावी मैदान मारने का संदेश देकर जल्द नई रणनीति के एलान की तैयारी में है। रालोद का टारगेट फतह यूपी नहीं बल्कि वेस्ट यूपी है। हालांकि रालोद के कुछ नेताओं का मानना है कि वक्त की नजाकत के मद्देनजर गठबंधन जरूरी है, इसके प्रयास जारी रखने चाहिए। उन्होंने अपनी यह बात हाईकमान तक पहुंचा भी दी है। इन लोगों की राय में दोस्ती के लिए बसपा सबसे मजबूत विकल्प है, दूसरे नंबर पर भाजपा और तीसरे पर जेडीयू। गठबंधन की सोच वाले रालोद कार्यकर्ता वोट बैंक में इजाफे के लिए कांग्रेस से भी गठबंधन करने पक्ष में राय रखते हैं।