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AI: विकसित और विकासशील देशों के बीच एआई बढ़ा सकता खाई, दुनिया की GDP में 15.7 ट्रिलियन डॉलर का करेगा इजाफा

Wed, 10 Sep 2025 08:30 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Wed, 10 Sep 2025 08:30 PM IST
सार

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीक को अपनाने में यह अंतर एक बार फिर अमेरिका जैसे देशों को और अधिक धनी और शक्तिशाली  बनाएगा, जबकि विकासशील और पिछड़े देश इस रेस में बहुत पीछे छूट सकते हैं।

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AI increase gap between developed and developing countries, will increase world GDP by 15.7t rillion dollar
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस - फोटो : AI

विस्तार

औद्योगिक संगठन फिक्की की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगले पांच वर्षों के अंदर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के कारण दुनिया की कुल जीडीपी में 15.7 ट्रिलियन डॉलर की बढ़ोतरी होगी। लेकिन इस अवसर का लाभ उठाने के लिए दुनिया के सभी देश एक समान गति से नहीं आगे बढ़ रहे हैं। विश्व के विकसित देश तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अपना रहे हैं और लगभग 66 प्रतिशत विकसित देशों ने इसको लेकर एक राष्ट्रीय नीति भी बना ली है, वहीं भारत जैसे विकासशील देश इस मामले में पिछड़ रहे हैं और केवल 30 प्रतिशत विकासशील देश ही इसको लेकर एक राष्ट्रीय नीति बना पाए हैं। सबसे पिछड़े देशों में यह हिस्सेदारी 12 प्रतिशत ही है। कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विकसित और अन्य देशों के बीच आर्थिक असमानता को बढ़ाने का एक बड़ा कारण साबित हो सकता है। 
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आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीक को अपनाने में यह अंतर एक बार फिर अमेरिका जैसे देशों को और अधिक धनी और शक्तिशाली  बनाएगा, जबकि विकासशील और पिछड़े देश इस रेस में बहुत पीछे छूट सकते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विकसित देशों की अमीरी को और तेजी से बढ़ाने और पिछड़े देशों की आर्थिक कमजोरी का कारण बन सकता है। 
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आर्थिक मामलों के जानकार डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तुलना बहुत हद तक औद्योगीकरण के दौर से की जा सकती है। उस समय जो देश अपने उद्योगों को मशीनों और नवीन तकनीक के साथ जोड़ पाए, वे विकास और धन संपदा अर्जित करने में बहुत आगे निकल गए, जबकि विकासशील या पिछड़े देश मशीनीकरण में पिछड़ने के कारण गरीब रह गए। उन्हें इसकी कीमत आज तक चुकानी पड़ रही है। 
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उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में पिछड़ने का असर ठीक मशीनीकरण और औद्योगीकरण की तरह हो सकता है। बल्कि, मशीनीकरण का जो असर सामने आने में 50 से सौ वर्षों का समय लगा था, अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक के कारण यही अंतर केवल 10-15 वर्षों के बीच सामने आ सकता है। ऐसे में समय की मांग यही है कि भारत जैसे देशों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भारी निवेश कर इस सेक्टर को अपनी ताकत बनाना चाहिए। 

भारत की कमजोरी बनेगी अमेरिका की ताकत
भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मामले में निवेश तो हो रहा है, लेकिन अमेरिका और चीन जैसे देशों की तुलना में यह बहुत कम है। यदि आने वाले समय में भारत को अमेरिका-चीन से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में मुकाबला करना है तो उसे इस सेक्टर में भारी निवेश करना होगा। भारत की सबसे बड़ी समस्या यह है कि भारत बहुत सारे एआई एक्सपर्ट तैयार तो कर रहा है, लेकिन ज्यादा बेहतर पैसा कमाने के चक्कर में ये एक्सपर्ट विदेश जाना पसंद कर रहे हैं। विदेश के मामले में भी उनकी पहली पसंद अमेरिका या कोई यूरोपीय देश होता है। 

ऐसे में भारत के एआई के टॉप टैलेंट अमेरिका जैसे देशों की तरफ जाना पसंद कर रहे हैं और उनकी तेज प्रगति का कारण बन सकते हैं, जबकि स्वयं भारत इस दौड़ में पिछड़ रहा है। यानी भारत की कमजोरी ही अमेरिकी-यूरोपीय देशों को ताकत दे रही है। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, यदि भारत को इस सेक्टर में मजबूत होना है तो उसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भारी निवेश के साथ-साथ ब्रेन-ड्रेन से बचने के उपाय भी खोजने होंगे।  

रिपोर्ट में क्या विशेष
फिक्की की एआई पर विशेष रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग ऐसे सेक्टर में तेजी से बढ़ रहा है जो आंकड़ों पर आधारित हैं। जैसे शिक्षा, बैंकिंग, इंश्योरेंस और मेडिकल सेक्टर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का तेजी से इस्तेमाल बढ़ रहा है। लेकिन कृषि और सामाजिक सेक्टर में इसका सबसे कम उपयोग हो रहा है। एआई के कारण विकसित देशों की जीडीपी में भारी बढ़ोतरी होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सेक्टर का तीन में से एक एक्सपर्ट इस समय अमेरिका से है या अमेरिका में काम कर रहा है। वहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर शोध के मामले में चीन भारी निवेश कर रहा है। रिपोर्ट में एआई नवाचार को अपनाने का सबसे बेहतर तरीका वर्तमान कर्मचारियों को ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में ट्रेंड करना बताया गया है। एआई को अपनाने में सबसे बड़ी बाधा तकनीक को नहीं, बल्कि इसको लागू करने में हिचक और देरी को बताया गया है।

'नौकरियों की प्रकृति बदलेगी'
आर्थिक विशेषज्ञ वीपी सब्बरवाल ने अमर उजाला से कहा कि पहले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर सबसे बड़ा डर यही था कि यह वर्तमान कर्मचारियों की नौकरी को खा जाएगा। लेकिन समय के साथ यह साफ हो रहा है कि एआई नौकरियों की प्रकृति में बदलाव करेगा, लेकिन सभी सेक्टर में इसका प्रभाव बहुत ज्यादा नकारात्मक नहीं रहेगा। 

उन्होंने कहा कि एआई कुछ सेक्टर में लोगों को कुछ नुकसान कर सकता है, लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि इसके कारण सेवा के अनेक नए अवसर विकसित होंगे। एआई के कारण वैश्विक जीडीपी में लाखों करोड़ की बढ़ोतरी होने जा रही है। विभिन्न देशों की सरकारें इसका उपयोग रोजगार के नए अवसर सृजित करने में कर सकेंगी। 


वीपी सब्बरवाल के अनुसार, समय के साथ एआई की सीमाएं भी सामने आ रही हैं। यह ज्यादा तकनीक दक्ष होता जा रहा है, लेकिन इसके बाद भी यह समझ आ गया है कि एआई सब कुछ नहीं करने वाला है। इसके द्वारा किए गए लेखन, कलात्मक कार्य, वीडियो भी स्वाभाविकता का भाव पैदा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में अब यह माना जा रहा है कि यह कला क्षेत्र के लोगों के सामने भी एक सीमित असर ही पैदा कर पाएगा। उन्होंने कहा कि समय के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर हमारी समझ बढ़ेगी और भ्रांतियां खत्म होंगी।
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