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कुरुक्षेत्रः लॉकडाउन समाप्त होते ही खत्म होगा कांग्रेस का भी लॉकडाउन
Fri, 17 Apr 2020 06:02 PM IST
Harendra Chaudhary
विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, नई दिल्ली
विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Fri, 17 Apr 2020 06:02 PM IST
सार
- कोरोना संकट को अवसर में बदलकर केंद्रीय भूमिका में आ रहे हैं राहुल गांधी
- गुरुवार को पत्रकारों के सवालों के जवाब में बेबाकी और परिपक्वता से अपनी बात कही
- कोरोना संकट के जरिये पुरानी छवि सुधारने और वापस विपक्ष की राजनीति की केंद्रीय भूमिका में आने का मौका
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राहुल गांधी
- फोटो : ANI (File)
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विस्तार
लॉकडाउन खत्म होते ही राहुल गांधी कांग्रेस का भी लॉकडाउन खत्म करेंगे। गुरुवार को कोरोना संकट पर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए पत्रकार सम्मेलन में समर्थन औऱ सहयोग के बहाने केंद्र सरकार को घेरने के बाद राहुल गांधी ने शुक्रवार को फिर एक ट्वीट के जरिए केंद्र सरकार पर तंज कसा।
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ट्वीट में राहुल ने लिखा कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़ और पुद्दुचेरी कोविड-19 का डटकर सामना कर रहे हैं। नए विशेष अस्पताल तैयार किए जा रहे हैं, जैसे छत्तीसगढ़ में यह 200 बेड का विशेष कोरोना-अस्पताल, जो मात्र 20 दिन में इलाज के लिए तैयार किया गया है। जहां चाह,वहां राह।
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इस ट्वीट में जहां राहुल ने कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारों को कोरोना विरोधी लड़ाई में अव्वल बताया, वहीं आखिर में जहां चाह वहां राह के जरिए तंज कसते हुये बिना कहे भी इशारे से केंद्र सरकार और भाजपा शासित राज्यों की कोरोना के खिलाफ लड़ने की इच्छा शक्ति पर सवाल उठा दिया।
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इसके पहले गुरुवार को पत्रकारों के सवालों के जवाब में जिस बेबाकी और परिपक्वता से अपनी बात कही, इससे तो यही संकेत मिलता है। राहुल ने न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक शब्द बोला न ही केंद्र सरकार पर हमला बोला।
लेकिन उन्होंने यह भी संदेश नहीं दिया कि वह आंख मूंदकर प्रधानमंत्री की हां में हां मिला रहे हैं और केंद्र सरकार के पिछलग्गू बने हुए हैं। कोरोना संकट पर प्रेस कांफ्रेंस के जरिए देश को संबोधित करके राहुल गांधी सरकार के सामने विपक्ष की आवाज उठाने वाले पहले नेता बन गए हैं।
कोरोना संक्रमण के विरुद्ध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की रीति-नीति को लेकर पूछे जाने वाले हर सवाल के जवाब में राहुल गांधी ने एक ही जवाब दिया कि अभी आपस में लड़ने का नहीं एकजुट होकर कोरोना से लड़ने का समय है।
राज्यों को ज्यादा संसाधन और आर्थिक मदद व मुख्यमंत्रियों को ज्यादा छूट की राहुल की मांग के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने केंद्र से ज्यादा पैसे देने का मुद्दा उठाकर कांग्रेस की रणनीति का संकेत दे दिया है।
कांग्रेस में राहुल के करीबी माने जाने वाले नेताओं की मानें तो राहुल गांधी अब राजनीतिक अवसाद की उस अवस्था से बाहर आ चुके हैं जो मई 2019 में लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की दुर्दशा के बाद उन पर छा गई थी और उन्होंने सबकी अनसुनी करते हुए पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था।
राहुल को इस सियासी अवसाद से निकलने में करीब दस महीने लगे। इस बीच उनकी मां सोनिया गांधी ने अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर पार्टी की कमान संभाली और बहन प्रियंका लगातार सोशल मीडिया के जरिए (हालांकि उनकी राजनीति का केंद्र उत्तर प्रदेश तक ही सीमित है) अपनी मौजूदगी दर्ज कराती रही हैं।
कोरोना संकट ने राहुल गांधी को एक राजनीतिक अवसर दिया है, जिससे वह अपनी पुरानी छवि सुधार सकें और वापस विपक्ष की राजनीति की केंद्रीय भूमिका में आ सकें। राहुल इस काम में जुट गए हैं।
राहुल के करीबी एक सूत्र के मुताबिक कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष का आत्मविश्वास इसलिए भी बढ़ गया है कि देश में कोरोना संक्रमण के संकट को समझने वाले और सावधान करने वाले वह पहले नेता थे, जिन्होंने सोशल मीडिया के जरिए 31 जनवरी को इस बीमारी को लेकर पहला ट्वीट किया, हालांकि उसका संदर्भ चीन से था, लेकिन 12 फरवरी को राहुल ने भारत पर मंडराने वाले कोरोना संकट की तरफ सीधे तौर पर चेताया।
उसके बाद उनके ट्विटर तीर लगातार चलते रहे। सत्ता पक्ष ने उन्हें अनसुना और अनदेखा किया, सोशल मीडिया पर उनका मजाक उड़ाया गया, लेकिन 15-16 मार्च के बाद के घटनाक्रम ने राहुल को सही साबित किया।
इस कांग्रेसी युवा नेता के मुताबिक इससे पार्टी के पूर्व अध्यक्ष का आत्मविश्वास बढ़ा। इसके बाद उन्होंने केरल के कांग्रेस नेताओं से कोरोना को लेकर लगातार बात की और कुछ आर्थिक विशेषज्ञों और चिकित्सा विशेषज्ञों खासकर सामुदायिक चिकित्सा विज्ञान के विशेषज्ञों से भी कोरोना के खतरे और समाधान के उपायों पर चर्चा की।
बताया जाता है कि इसके बाद राहुल गांधी ने कोरोना को लेकर बेहद सियासी समझदारी से सरकार को घेरना शुरु कर दिया है। वह पहले की तरह सरकार के सीधे विरोध की गलती न दोहराकर सुझावों के रूप में अपनी बात कहते हुए सरकार की कमजोरियों की तरफ इशारा कर रहे हैं।
चाहे ट्वीट के जरिए या फिर गुरुवार को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए पत्रकार सम्मेलन करके राहुल गांधी ने बहेद सधे हुए अंदाज में सरकार का समर्थन और सहयोग की बात करते हुए भी यह कह दिया कि अकेले लॉकडाउन के भरोसे कोरोना से निबटना मुमकिन नहीं है।
लॉकडाउन को महज पॉजज बटन बताते हुए कोरोना जांच का दायरा बढ़ाने, डाक्टरों और चिकित्सा स्टाफ को ज्यादा बेहतर सुरक्षा किट देने, बीमारी से लड़ने के लिए केंद्र सरकार द्वारा ज्यादा से ज्यादा संसाधन और छूट राज्यों को देने, राज्यों को धन मुहैया कराने, प्रवासी मजदूरों और गरीबों के लिए सरकारी गोदामों में भरे अनाज को खोल देने, छोटे मझोले उद्योगों को राहत पैकेज देने, किसानों को राहत देने जैसे कदम उठाने का सुझाव सरकार को देकर राहुल गांधी ने सियासत की नजर से शांत इस माहौल में एक लकीर खींचने की कोशिश की जिसके सामने अगर केंद्र सरकार बड़ी लकीर खींचती है तो उसका कुछ श्रेय राहुल ले सकेंगे और अगर केंद्र की लकीर छोटी रह जाती है तो कोरोना की बाढ़ का पानी उतरने पर होने वाले राजनीतिक कीच युद्ध में राहुल अपने तरकश के इन तीरों का इस्तेमाल मोदी सरकार के खिलाफ कर सकेंगे।
इसीलिए जब उनसे पूछा गया कि वह सरकार की देरी और कमजोरियों के खिलाफ कब बोलेंगे तो राहुल ने जवाब दिया कि अभी वक्त नहीं है, जब सही वक्त आएगा तब बोलेंगे। पत्रकारों द्वारा बार बार सरकार के खिलाफ उकसाने वाले सवालों के जबाव में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने यही कहा कि अभी आपस में लड़ने का नहीं मिलकर कोरोना से लड़ने की जरूरत है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपने मतभेदों को साफगोई से स्वीकारते हुए उन्होंने कहा कि मतभेदों के बावजूद वह इस लड़ाई में प्रधानमंत्री और सरकार के साथ हैं। राहुल गांधी के ये तेवर कुछ कुछ वैसे ही हैं जैसे कि दिसंबर 2017 में गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान और उसके बाद थे।
अपने इन्हीं तेवरों की बदौलत राहुल ने गुजरात में कांग्रेस को जीत के करीब तक पहुंचा दिया था। यह अलग बात है कि चुनावी कबड्डी में जीत यानी बहुमत की रेखा छूने से कुछ पहले ही कांग्रेस की सांस उखड़ गई।
फिर राहुल के इन्हीं तेवरों ने मई 2018 में बहुमत न मिलने के बावजूद बिना एक क्षण गवाएं जद (एस) से गठबंधन करके कर्नाटक में भाजपा को बहुमत के बेहद निकट पहुंचने के बावजूद सत्ता से दूर कर दिया था।
गुजरात और कर्नाटक से उत्साहित राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने दिसंबर 2018 में मध्य प्रदेश, छत्तीगढ़ में 15 साल पुराने भाजपा शासन का अंत किया और राजस्थान में पांच साल बाद फिर सत्ता वापसी कर ली।
लेकिन इन सफलताएं न सिर्फ राहुल गांधी बल्कि उनकी पूरी टीम और कांग्रेस के तमाम नेताओं के सिर चढ़ कर बोलने लगीं और अप्रैल 2019 के लोकसभा चुनावों में राहुल और कांग्रेस ने कुछ एसी हिमालयी गलतियां की जिसने न सिर्फ ज्यादा बड़े बहुमत भाजपा और नरेंद्र मोदी की दोबारा सत्ता वापसी का रास्ता तैयार किया बल्कि कांग्रेस को महज 53 लोकसभा सीटों से आगे नहीं बढ़ने दिया।कई कांग्रेसी दिग्गजों के साथ खुद राहुल गांधी भी अमेठी से चुनाव हार गए।लेकिन केरल के वायनाड ने उनकी लाज रखी और वह संसद में पहुंच गए।
मई 2019 से लेकर करीब आठ महीने तक राहुल गांधी ने राजनीति के बियाबान में खुद को अकेले कर लिया।यहां तक पार्टी के तमाम बड़े नेता भी उनसे मिलने की कोशिश करके हार गए।लेकिन जनवरी से राहुल फिर सक्रिय हुए।
संसद के बजट सत्र में उन्होंने लोकसभा में सरकार से देश के 50 सबसे बड़े बैंक बकाएदारों के नाम भी पूछे और कोरोना को लेकर लगातार ट्वीट करते रहे।राहुल गांधी के बेहद भरोसेमंद युवा सिपहसालार माने जाने वाले एक कांग्रेसी नेता गुजरात की बढ़त, मध्य प्रदेश छत्तीसगढ राजस्थान की जीत और कर्नाटक की रणनीतिक कामयाबी गिनाते हैं।
लेकिन राहुल के अध्यक्ष पद से हटने के बाद कांग्रेस ने कर्नाटक खोया और मध्य प्रदेश खोया। राहुल समर्थकों को यह याद दिलाने पर कि राहुल के अध्यक्ष पद से हटने के बाद हरियाणा में कांग्रेस ने अपनी सीटें दोगुनी से ज्यादा कर लीं तो उनका जवाब है कि लेकिन सरकार तो नहीं बना सके जबकि खट्टर सरकार के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश था।
अगर उन्हें झारखंड की सफलता की याद दिलाएं तो जवाब होता है कि वहां कांग्रेस ने झामुमो की नाव पर सवार होकर अपनी इज्जत बचाई है और महाराष्ट्र की बात करने पर जवाब मिलता है कि उसका सारा श्रेय शरद पवार को जाता है।
कुल मिलाकर राहुल गांधी के सिपहसालारों का मानना है कि राहुल की अनुपस्थिति में कांग्रेस ने खोया ज्यादा है और जो पाया है वह दूसरों के भरोसे पाया है।
कांग्रेस में लंबे समय तक नेतृत्व के बेहद करीब रहे एक वरिष्ठ पूर्व कांग्रेसी के मुताबिक राहुल गांधी अब फिर केंद्रीय भूमिका के लिए तैयार हो चुके हैं। कोरोना संकट ने उन्हें यह अवसर दिया है कि जब देश के सभी राजनीतिक दल और उनके नेता खामोशी से सरकार की हां में हां मिला रहे हैं तब वह बेहद सियासी चतुराई और सावधानी से सरकार का समर्थन करते हुए भी वो मुद्दे उठा रहे हैं जिन्हें हर दल और हर मुख्यमंत्री उठाना चाहता है।
एक तरह से राहुल ने इस मामले में बढ़त ले ली है। आने वाले समय में जब कोरोना पर देश में राजनीति होगी तो सरकार विरोधी खेमे के अगुआ राहुल ही होंगे। इसके साथ ही जिस तरह उन्होंने राज्यों और मुख्यमंत्रियों को ज्यादा स्वतंत्रता देने और संसाधन देने की वकालत की है, उससे गैर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री असहमत नहीं हो सकते।
राहुल के इन बदले तेवरों से पार्टी के भीतर भी उन्हें फिर से अध्यक्ष बनाने का दबाव बढ़ेगा और देर सबेर जब स्थितियां सामान्य होंगी तो राहुल स्वाभाविक तौर पर फिर पार्टी की कमान संभाल सकते हैं।