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भारत में 84 फीसदी लोगों को नहीं मालूम कि सड़क हादसे में किसी की मदद करने पर पूछताछ नहीं होगी
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
Updated Mon, 26 Nov 2018 08:59 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने सेव लाइफ फाउंडेशन की जनहित याचिका पर मार्च 2016 में नोटिफ़िकेशन जारी कर 'गुड सेमेरिटन लॉ' को एक कानून की शक्ल दे दी थी। इसमें कहा गया था कि सड़क हादसे में अगर कोई व्यक्ति किसी घायल की मदद करता है तो कोई भी एजेंसी उसे पूछताछ या गवाही के नाम पर परेशान नहीं करेगी। अब दो साल बाद हालत यह है कि देश में 84 फीसदी लोगों को इस कानून के बारे में पता ही नहीं है।
नतीजा, सड़क हादसों में घायल होने वाले लोगों को फौरी तौर पर मदद नहीं मिल पाती, जिससे वे दम तोड़ जाते हैं।फाउंडेशन के सर्वे में 96 प्रतिशत चिकित्सा पेशेवरों ने स्वीकार किया है कि उनके अस्पतालों में 'गुड सेमेरिटन लॉ' कमेटी ही नहीं है।इसके अलावा 64 प्रतिशत पुलिस अफसरों ने माना है कि वे गुड सेमेरिटन के निजी विवरण लेते हैं। चार में से तीन लोग सड़क हादसे में घायल लोगों की मदद इसलिए नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे वे खुद किसी मुसीबत में फंस जाएंगे।
सेव लाइफ फाउंडेशन के संस्थापक पीयूष तिवारी ने सोमवार को कॉन्स्टिटूशन क्लब में यह सर्वे रिपोर्ट पेश करते हुए कहा, देश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पूरी तरह उल्लंघन हो रहा है। किसी भी अस्पताल ने अपने प्रवेश पर 'गुड सेमेरिटन लॉ चार्टर' का बोर्ड नहीं लगाया है। अनुसंधान एजेंसी एमडीआरए के सहयोग से किए गए इस सर्वे में 11 शहरों को शामिल किया गया है। इनमें दिल्ली, जयपुर, कानपुर, वाराणसी, लुधियाना, बंगलूरू, हैदराबाद, चेन्नई, मुंबई, इंदौर और कोलकाता शामिल हैं।
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2018 से लेकर अब तक 3667 लोगों से की गई बातचीत पर आधारित इस सर्वे रिपोर्ट में सामने आया है कि गुड सेमेरिटन कानून लागू होने के बाद भी नागरिकों को सड़क पर किसी घायल व्यक्ति की मदद करने के उनके नए अधिकारों की जानकारी ही नहीं है। नतीजन, लोग आज भी सहायता करने से हिचकते हैं। पुलिस और डॉक्टर, घायलों की मदद करने वालों से उनकी जानकारी मांगते हैं। कई मामलों में तो उन्हें जबरन गवाह बना देते हैं। कई जगह पर देखा गया है कि मददगार को ही अपराधी ठहरा दिया जाता है।
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नतीजा, सड़क हादसों में घायल होने वाले लोगों को फौरी तौर पर मदद नहीं मिल पाती, जिससे वे दम तोड़ जाते हैं।फाउंडेशन के सर्वे में 96 प्रतिशत चिकित्सा पेशेवरों ने स्वीकार किया है कि उनके अस्पतालों में 'गुड सेमेरिटन लॉ' कमेटी ही नहीं है।इसके अलावा 64 प्रतिशत पुलिस अफसरों ने माना है कि वे गुड सेमेरिटन के निजी विवरण लेते हैं। चार में से तीन लोग सड़क हादसे में घायल लोगों की मदद इसलिए नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे वे खुद किसी मुसीबत में फंस जाएंगे।
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सेव लाइफ फाउंडेशन के संस्थापक पीयूष तिवारी ने सोमवार को कॉन्स्टिटूशन क्लब में यह सर्वे रिपोर्ट पेश करते हुए कहा, देश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पूरी तरह उल्लंघन हो रहा है। किसी भी अस्पताल ने अपने प्रवेश पर 'गुड सेमेरिटन लॉ चार्टर' का बोर्ड नहीं लगाया है। अनुसंधान एजेंसी एमडीआरए के सहयोग से किए गए इस सर्वे में 11 शहरों को शामिल किया गया है। इनमें दिल्ली, जयपुर, कानपुर, वाराणसी, लुधियाना, बंगलूरू, हैदराबाद, चेन्नई, मुंबई, इंदौर और कोलकाता शामिल हैं।
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2018 से लेकर अब तक 3667 लोगों से की गई बातचीत पर आधारित इस सर्वे रिपोर्ट में सामने आया है कि गुड सेमेरिटन कानून लागू होने के बाद भी नागरिकों को सड़क पर किसी घायल व्यक्ति की मदद करने के उनके नए अधिकारों की जानकारी ही नहीं है। नतीजन, लोग आज भी सहायता करने से हिचकते हैं। पुलिस और डॉक्टर, घायलों की मदद करने वालों से उनकी जानकारी मांगते हैं। कई मामलों में तो उन्हें जबरन गवाह बना देते हैं। कई जगह पर देखा गया है कि मददगार को ही अपराधी ठहरा दिया जाता है।
सर्वे रिपोर्ट: मौखिक रुप से पूछें तो 88 फीसदी लोग कहते हैं कि हम मदद करेंगे, मगर सच्चाई बहुत कम होती है
2013 में 26 फीसदी लोग कहते थे कि वे घायलों की मदद करना चाहते हैं। 2018 में ऐसे लोगों की संख्या 88 फीसदी हो गई है। खास बात है कि जब इन लोगों से पूछा कि वे कैसे मदद करेंगे तो उनका दावा फुर्र होता दिखाई दिया। महज 29 प्रतिशत लोगों ने कहा, वे घायल को अस्पताल ले जाएंगे, जबकि 28 फीसदी बोले, वे एंबुलेंस को बुला देंगे। 12 फीसदी लोगों ने कहा, वे पुलिस को फोन कर देंगे।
पुलिस गुड सेमेरिटन की डिटेल मांगती है
-इंदौर में सौ फीसदी नहीं मांगती है
-चेन्नई में 5.6 प्रतिशत ने कहा, पुलिस डिटेल लेती है
-जयपुर में 7.7 बोले, पुलिस विवरण तो लेती है
-मुंबई में 9.5 फीसदी ने कहा, पुलिस वाले डिटेल मांगते हैं
-वाराणसी में 20 प्रतिशत मामलों में पुलिस विवरण लेती है
-हैदराबाद में यह प्रतिशत 21.1 है
-कोलकाता में 44.0 प्रतिशत मामलों में डिटेल मांगी जाती है
-लुधियाना में भी 40.0 केसों में पुलिस मददगार का विवरण मांगती है
-कानपुर में 44 प्रतिशत मामलों में पुलिस डिटेल के लिए बाध्य करती है
-बंगलुरु में 46.2 फीसदी केसों में डिटेल मांगी जाती है
-दिल्ली में 59.1 फीसदी मामलों में पुलिस मददगार व्यक्ति को जानकारी देने के लिए कहती है
पुलिस गुड सेमेरिटन की डिटेल मांगती है
-इंदौर में सौ फीसदी नहीं मांगती है
-चेन्नई में 5.6 प्रतिशत ने कहा, पुलिस डिटेल लेती है
-जयपुर में 7.7 बोले, पुलिस विवरण तो लेती है
-मुंबई में 9.5 फीसदी ने कहा, पुलिस वाले डिटेल मांगते हैं
-वाराणसी में 20 प्रतिशत मामलों में पुलिस विवरण लेती है
-हैदराबाद में यह प्रतिशत 21.1 है
-कोलकाता में 44.0 प्रतिशत मामलों में डिटेल मांगी जाती है
-लुधियाना में भी 40.0 केसों में पुलिस मददगार का विवरण मांगती है
-कानपुर में 44 प्रतिशत मामलों में पुलिस डिटेल के लिए बाध्य करती है
-बंगलुरु में 46.2 फीसदी केसों में डिटेल मांगी जाती है
-दिल्ली में 59.1 फीसदी मामलों में पुलिस मददगार व्यक्ति को जानकारी देने के लिए कहती है
गुड सेमेरिटन को घटना स्थल से जाने देती है पुलिस...कहां पर क्या चल रहा है, जानिये
-चेन्नई में 11.1 प्रतिशत मामलों में जाने देती है
-जयपुर में 15.4 फीसदी मामलों में मददगार को घटना स्थल से जाने दिया जाता है
-दिल्ली में केवल 27.3 प्रतिशत मामलों में यह हो पाता है
-मुंबई में 38.1 फीसदी मामलों में ही ऐसा होता है
-बंगलुरु में 46.2 प्रतिशत
-कानपुर में 48 फीसदी है
-इंदौर में 50 प्रतिशत मामलों में पुलिस मददगार को जाने देती है
-हैदराबाद में यह प्रतिशत 57.9 है
-कोलकाता में 61.9 प्रतिशत मामलों में ऐसा हो पाता है
-वाराणसी में 80 फीसदी मामलों में पुलिस जाने देती है
-लुधियाना में भी 80.0 प्रतिशत केसों में ऐसा होता है
अब आगे क्या होगा, ये सब तैयारी है...
गुड सेमेरिटन लॉ की जानकारी स्कूल-कालेजों में दी जाएगी। लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने के लिए अभियान शुरु होगा। पीयूष तिवारी का कहना है कि इसके लिए राज्यों को आगे आना होगा। कर्नाटक देश का ऐसा पहला राज्य है, जिसने लोकल स्तर पर गुड सेमेरिटन लॉ बनाकर इसे प्रभावी तरीके से लागू कर दिया है। यही काम दूसरे राज्यों को भी करना होगा। फ्रांस की तरह कानून बनाना होगा, जहां पर यह व्यवस्था कि अगर कोई व्यक्ति सड़क हादसे में घायल व्यक्ति की मदद से दूर भागता है तो उसे समस्या का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा राज्यों को गुड सेमेरिटन को इनाम या दूसरी कोई सुविधा भी मुहैया करानी चाहिए, जिससे कि अन्य लोगों को भी प्रोत्साहन मिले।तिवारी ने कहा, अगर ये सब नहीं हो पाता तो फिर से अदालत में जाने पर विचार करेंगे।
-जयपुर में 15.4 फीसदी मामलों में मददगार को घटना स्थल से जाने दिया जाता है
-दिल्ली में केवल 27.3 प्रतिशत मामलों में यह हो पाता है
-मुंबई में 38.1 फीसदी मामलों में ही ऐसा होता है
-बंगलुरु में 46.2 प्रतिशत
-कानपुर में 48 फीसदी है
-इंदौर में 50 प्रतिशत मामलों में पुलिस मददगार को जाने देती है
-हैदराबाद में यह प्रतिशत 57.9 है
-कोलकाता में 61.9 प्रतिशत मामलों में ऐसा हो पाता है
-वाराणसी में 80 फीसदी मामलों में पुलिस जाने देती है
-लुधियाना में भी 80.0 प्रतिशत केसों में ऐसा होता है
अब आगे क्या होगा, ये सब तैयारी है...
गुड सेमेरिटन लॉ की जानकारी स्कूल-कालेजों में दी जाएगी। लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने के लिए अभियान शुरु होगा। पीयूष तिवारी का कहना है कि इसके लिए राज्यों को आगे आना होगा। कर्नाटक देश का ऐसा पहला राज्य है, जिसने लोकल स्तर पर गुड सेमेरिटन लॉ बनाकर इसे प्रभावी तरीके से लागू कर दिया है। यही काम दूसरे राज्यों को भी करना होगा। फ्रांस की तरह कानून बनाना होगा, जहां पर यह व्यवस्था कि अगर कोई व्यक्ति सड़क हादसे में घायल व्यक्ति की मदद से दूर भागता है तो उसे समस्या का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा राज्यों को गुड सेमेरिटन को इनाम या दूसरी कोई सुविधा भी मुहैया करानी चाहिए, जिससे कि अन्य लोगों को भी प्रोत्साहन मिले।तिवारी ने कहा, अगर ये सब नहीं हो पाता तो फिर से अदालत में जाने पर विचार करेंगे।