सबसे बड़े माओवादी हमले के 4 अनसुलझे सवाल
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25 मई को जगदलपुर के कांग्रेस भवन में पार्टी के केंद्रीय और प्रदेश के नेता एकत्रित होकर झीरम हत्याकांड के तीन साल पर श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। तीन साल पहले यानी 25 मई, 2013 को कांग्रेस की एक राजनीतिक रैली पर माओवादी हमला हुआ था।
स हमले में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ला, प्रदेश के पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद महेंद्र कर्मा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और पूर्व विधायक उदय मुदलियार सहित कुल 29 लोग मारे गए थे।
आजाद भारत के इतिहास में यह सबसे बडा माओवादी हमला था। और राजनेताओं की हत्या की दृष्टि से भी यह सबसे बडा था।
लेकिन इस बडे हमले के बाद जो कुछ भी हुआ, उसने कई बडे सवाल खडे किए हैं। ये सवाल न केवल कांग्रेस के लिए आवश्यक हैं, मारे गए लोगों के परिजनों के लिए आवश्यक हैं बल्कि ये लोकतंत्र के लिए भी आवश्यक हैं। वैसे तो सवाल बहुत से हैं लेकिन इन्हें चार बिंदुओं में बांटा जा सकता है।
पहला सवाल सुरक्षा व्यवस्था को लेकर है
हमले के बाद सबसे बडा सवाल उठा कि क्या यह सुरक्षा व्यवस्था में चूक थी? झीरम कांड की जांच कर रहे आयोग की सुनवाई में जो तथ्य सामने आए हैं वे तो इसकी चुगली ही करते हैं।
बस्तर इस समय देश के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित इलाकों में से एक है। झीरम घाटी को माओवादियों गतिविधियों का गढ माना जाता है।
तथ्य बताते हैं कि हमले के कुछ दिन पहले इसी झीरम इलाके में मुख्यमंत्री रमन सिंह की विकास यात्रा हुई थी, तब वहां उनकी सुरक्षा के लिए 1786 सुरक्षाकर्मी तैनात थे। लेकिन कुछ ही दिन बाद कांग्रेस की विकास यात्रा के लिए इसी झीरम घाटी में सुरक्षा के लिए 218 कर्मियों की तैनाती थी। इसमें उन सुरक्षाकर्मियों की संख्या शामिल नहीं है, जो नेताओं की व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए तैनात होते हैं।
दूसरा सवाल राजनीति को लेकर है
राज्य के अधिकारियों के सामने यह बडा सवाल है कि क्यों उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर रखी। वह भी तब जबकि महेंद्र कर्मा पर जाहिर तौर पर नक्सली हमले का खतरा था। उन्हें जेड श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई थी। नंदकुमार पटेल पर एकाधित बार नक्सली हमला हो चुका था। क्यों कांग्रेस के पहले से घोषित कार्यक्रम के लिए राज्य सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं रखी।
दूसरा सवाल राजनीति को लेकर है। जिस समय हमला हुआ राज्य में भाजपा की सरकार थी और छह महीने बाद नई सरकार के गठन के लिए चुनाव होने वाले थे। दोनों दलों के बीच पिछले चुनावों में वोटों का अंतर सिर्फ एक फीसद था। इस अंतर को पाटने के लिए कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष नंदकुमार पटेल अच्छी रणनीति के साथ पार्टी को खडा कर रहे थे और भाजपा जाहिर तौर पर डरी हुई थी।
सवाल यह भी है कि क्या सत्तारूढ पार्टी और माओवादियों के बीच कोई तालमेल है?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद माओवादियों के खिलाफ चल रहा कथित जनांदोलन सलवा जुडुम बंद हो चुका था और जैसा कि लोग कहते हैं महेंद्र कर्मा की उपयोगिता सरकार के लिए खत्म हो चुकी थी।
फिर ये सवाल लगातार उठ रहे थे कि क्या सत्तारूढ पार्टी और माओवादियों के बीच कोई तालमेल है?
वरिष्ठ वकील और सामाजिक कार्यकर्ता सुदीप श्रीवास्तव कहते हैं, “आंकडे बताते हैं कि जब भी माओवादी चुनाव बहिष्कार की बात करते हैं तो माओवादी प्रभावित इलाके में भाजपा को राजनीतिक लाभ मिलता है।” सार्वजनिक वितरण प्रणाली के नान घोटाले में लीक हुई डायरी में भी माओवादियों को भाजपा के नेताओं के नाम से बडी धनराशि देने का जिक्र आता है।
तो क्या यह हमला राजनीतिक कारणों से भी हुआ था जिसमें सरकार की कोई भूमिका थी?
तीसरा सवाल इस घटना की जांच पर उठता है
तीसरा सवाल इस घटना की जांच पर उठता है। इतने बडे हमले के बाद राज्य सरकार को जिस तरह की कार्रवाई करनी थी, वह तो नहीं हुई। लेकिन इसके बाद एनआईए ने अपनी जांच के बाद जो चार्जशीट फाइल की है उसमें भी कई बडी खामियां नजर आती हैं।
एक तो यह कि एनआईए ने अपनी जांच में बस्तर के तीन बडे पुलिस अधिकारियों बस्तर के एसपी, सुकमा के एसपी और बस्तर के आईजी को पूछताछ के लिए ही नहीं बुलाया। दूसरा यह कि एनआईए जैसी एजेंसी ने भी इस हमले में किसी षड्यंत्र के कोण से जांच ही नहीं की।
जांच आयोग की सुनवाई जारी है। इसमें कई आंख खोलने वाले तथ्य सामने आए हैं। लेकिन उससे क्या निकलेगा यह तो आयोग की रिपोर्ट ही बताएगी। विधानसभा में चौतरफा घिरने के बाद रमन सिंह सरकार ने इस घटना की सीबीआई जांच की घोषणा की है। लेकिन इतने वक्त बाद सीबीआई की जांच क्या बताएगी कहना मुश्किल है।
चौथा सवाल कांग्रेस की चूक को लेकर है
चौथा सवाल कांग्रेस की चूक को लेकर है। भारतीय लोकतंत्र के सबसे बडे हादसे के बाद राज्य सरकार के कई मंत्री भी मान बैठे थे कि किसी भी क्षण राष्ट्रपति शासन की घोषणा की जा सकती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस के दोनों बडे नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने तत्परता से राज्य का दौरा किया।
लेकिन वे राष्ट्रपति शासन लगाने का फैसला लेने से चूक गए। शायद 356 के दुरुपयोग के पूर्व में लगे आरोपों की आंच वे तब तक महसूस कर रहे थे। इसके बाद भाजपा यह झूठा प्रचार करने में भी सफल रही कि यह हमला कांग्रेस की अंदरूनी कलह का नतीजा था। दूसरा यह कि ऐन वक्त पर परिवर्तन यात्रा का मार्ग बदलने की वजह से सुरक्षा पर्याप्त नहीं थी।
अगर यह कांग्रेस का अंदरूनी मामला था। जिसे कि कई कांग्रेस के कई नेता सही मानते हैं और अपनी ही पार्टी के एक बडे नेता का नाम लेते हैं। तो क्या यह सरकार के सहयोग के बिना संभव था?
दूसरा इस हमले के बाद स्तब्ध कांग्रेस का संगठन अपने ही नेताओं की मौत से उपजी सहानुभूति को चुनाव तक कायम न रख सका।
कांग्रेस के कार्यकर्ता भी इसके लिए एकजुट नहीं हो सके। क्या कांग्रेस तीन साल बाद यह पडताल करने की स्थिति में है कि किन परिस्थितियों में उनसे इतनी बडी राजनीतिक चूक हुई?
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)