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आसान नहीं है विपक्ष के लिए मोदी-शाह की व्यूह रचना तोड़ पाना
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 19 Jun 2018 12:43 AM IST
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2019 के आम चुनाव के पहले विपक्ष चाहे अपनी एकता का जितना दंभ भर रहा हो, लेकिन उसके लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यूह रचना तोड़ पाना आसान नहीं है। भाजपा ने नये व्यूह रचना की तैयारी शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री खुद राज्यवार तैयारी और स्थिति तथा आगे की रणनीति में दिलचस्पी ले रहे हैं। वह इसके लिए समय भी दे रहे हैं। अंदरखाने के सूत्र बताते हैं कि 2019 से पहले भाजपा उत्तर से दक्षिण भारत तक नई व्यूह रचना तैयार कर रही है। इसमें न केवल सहयोगी दलों की संख्या बढ़ाना है, बल्कि चुनाव में विरोधी दलों को संख्याबल में नियंत्रित रखने का उपाय भी शामिल है।
तमिलनाडु
तमिलनाडु में भाजपा काफी दिलचस्पी ले रही है। वहां फिलहाल पार्टी का जनाधार नहीं है, लेकिन सहयोगियों के सहारे चुनावी गणित पर प्रभाव बनाना चाहती है। तमिलनाडु में मुख्यमंत्री ई पलानिसामी, ओ पनीरसेल्वम और टीटीवी दिनाकरण में एकता की कोशिश हो रही है। इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी को विश्वास में लेकर पहल हो रही है। अगले महीने तमिलनाडु के नेता दिल्ली प्रवास आ सकते हैं। सूत्र बताते हैं तीनों धड़े के एक साथ आने के बाद राज्य की राजनीतिक परिस्थिति में बदलाव लाया जा सकता है। इसी तरह से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व डीएमके के साथ भी अच्छे रिश्ते का पक्षधर है।
केरल और आंध्र प्रदेश
केरल में भाजपा का खाता खुलने की संभावना कम है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को वोट प्रतिशत बढ़ने का पूरा भरोसा है। ऐसे में नतीजे को प्रभावी बनाकर खाता खोलने के लिए जरूरी प्रयास किए जा रहे हैं। केरल जैसी स्थिति ही आंध्र प्रदेश में है। सूत्र बताते हैं कि तेलुगु देशम पार्टी भले ही एनडीए से अलग होने का ऐलान कर रही हो लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के निजी रिश्ते काफी मधुर हैं। भाजपा को आंध्रप्रदेश में एक अच्छे सहयोगी की तलाश है। यह काम तेजी से चल भी रहा है। पार्टी के नेता कांग्रेस (वाईएसआर) के नेता जगन मोहन रेड्डी के संपर्क में हैं। जगन मोहन रेड्डी राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के लोकप्रिय नेता वाईएस राजशेखर रेड्डी के पुत्र हैं। जगनमोहन रेड्डी के सामने भाजपा के साथ आने पर दलित और अल्पसंख्यक वोट के बिदकने का खतरा है। इसी तरह से वह कांग्रेस के साथ भी दूरी बनाकर चल रहे हैं। भाजपा यहां नया पैंतरा अपना सकती है।
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कर्नाटक
भाजपा को सबसे अधिक उम्मीद कर्नाटक से हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को कर्नाटक में नई बनी सरकार कम जंच रही है। भाजपा के एक महासचिव का कहना है कि राज्य की अवसरवाद के बल पर बनी सरकार कभी भी गिर सकती है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह खुद कहते हैं कि कर्नाटक की सरकार को हमारी शुभकामनाएं, लेकिन वह सफलता पूर्व पांच साल का कामकाज पूरा करले तो बड़ी बात है। दरअसल भाजपा का आलाकमान मानकर चल रहा है कि कर्नाटक की सरकार कभी भी गिर सकती है। वहां कांग्रेस नेताओं के जद (एस) के साथ कामकाजी और सामान्य रिश्ते नहीं बन पा रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि कर्नाटक भाजपा के नेता राज्य में सत्ताधारी दल के असंतुष्ट नेताओं के साथ संपर्क में हैं। पार्टी के रणनीतिकारों कर्नाटक में बदला राजनीतिक घटनाक्रम हजम नहीं हो रहा है। आम चुनाव में यहां से लोकसभा की अच्छी खासी सीटें आने की संभावना है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 17 सीटें मिली थी। 9 कांग्रेस के और दो जद (एस) के खाते में गई थी। जबकि 2009 में यह आंकड़ा क्रमश: 19, 06 और 03 का था। भाजपा के नेताओं का अनुमान है कि यदि आम चुनाव से पहले कर्नाटक में कोई राजनीतिक फेरबदल हो जाता है तो पार्टी को 22-25 लोकसभा की सीटें मिल सकती हैं।
महाराष्ट्र
शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे चाहे जितनी तल्खी दिखाएं, लेकिन भाजपा वहां शिवसेना के साथ अपने संबंध बनाए रखने के पक्ष में है। अमित शाह भी चार के केंद्र सरकार के कामकाज के दौरान खुलकर कह चुके हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी शिवसेना से भाजपा के अलग होने का हिमायती नहीं है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि भाजपा और शिवसेना में दूरी से बहुत अच्छा संदेश नहीं जाएगा। इस तरह से शिवसेना के भाजपा अपने रिश्ते को मजबूत करने का प्रयास कर रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना को अच्छी सफलता मिली थी। जबकि कांग्रेस पार्टी और एनसीपी को महाराष्ट्र से करारा झटका लगा था। भाजपा को 18, शिवसेना को 16, एनसीपी को 4 और कांग्रेस पार्टी को दो सीट तथा एसडब्ल्यूपी को एक सीट से संतोष करना पड़ा था। 2019 का चुनाव एनसीपी और कांग्रेस मिलकर लड़ेगी। मोदी लहर भी कमजोर पड़ रही है, लेकिन इसके बावजूद भाजपा अपनी सीटों की संख्या में गिरावट नहीं देखना चाहती।
गुजरात
भाजपा यहां डैमेज कंट्रोल का कई फार्मूला अपना चुकी है, लेकिन जमीनी हालात में बड़ा बदलाव नहीं आ रहा है। माना जा रहा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह गुजरात में अधिक समय दे सकते हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में बड़े बदलाव के लिए प्रयासरत है। पिछले चुनाव में यहां से कांग्रेस का खाता ही नहीं खुला था, लेकिन विधानसभा चुनाव 2017 के नतीजे ने भाजपा आलाकमान के कान खड़े कर दिए हैं।
उत्तर भारत
पूरे उत्तर भारत में भाजपा की जोरदार मोदी लहर चली थी। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्सप्रदेश ने भाजपा के पक्ष में चौकाने वाले नतीजे दिए थे। शाह की कोर टीम 2019 को साधने के लिए यहां कड़ी मशक्कत कर रही है। इन राज्यों में प्लान-ए के साथ-साथ प्लान-बी की हर संभावना को अजमाने की पहल हो सकती है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को भी भरोसा है कि इन राज्यों में 2019 के चुनाव में एक बार फिर राज्य की जनता भजपा पर भरोसा जताएगी।
वह साफ कहते हैं कि अभी एक साल का समय है और तबतक हम अपनी कुछ कमी दूर कर लेंगे। पार्टी के रणनीतिकारों को इस बार उत्तर भारत में थोड़ा लड़ाई ज्यादा कठिन दिखाई दे रही है। लेकिन बताते हैं कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। सब ठीक हो जाएगा के पीछे भाजपा के रणनीतिकारों को विरोधी दलों के बीच में सर फुटव्वल होने और एक दूसरे की टांग खीचने जैसी स्थिति पैदा होने के पूरे आसार हैं।
उत्तर-पूर्व
असम और त्रिपुरा में भाजपा की सरकार है। मेघालय, मणिपुर में सहयोगी सरकार है। भाजपा की उम्मीद इस बार भी नार्थ-ईस्ट से है। चुनाव प्रचार के लिए काम करने वाले प्रोफेशनल्स की माने तो नार्थ-ईस्ट में भाजपा के लिए कोई अधिक मुश्किल खड़ी नहीं हुई है। बल्कि स्थिति पहले बेहतर है। त्रिपुरा का चुनाव हाल में हुआ है। वहां पार्टी के अच्छा करने की उम्मीद है। असम में भी नतीजे संतोषजनक आ सकते हैं।
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तमिलनाडु
तमिलनाडु में भाजपा काफी दिलचस्पी ले रही है। वहां फिलहाल पार्टी का जनाधार नहीं है, लेकिन सहयोगियों के सहारे चुनावी गणित पर प्रभाव बनाना चाहती है। तमिलनाडु में मुख्यमंत्री ई पलानिसामी, ओ पनीरसेल्वम और टीटीवी दिनाकरण में एकता की कोशिश हो रही है। इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी को विश्वास में लेकर पहल हो रही है। अगले महीने तमिलनाडु के नेता दिल्ली प्रवास आ सकते हैं। सूत्र बताते हैं तीनों धड़े के एक साथ आने के बाद राज्य की राजनीतिक परिस्थिति में बदलाव लाया जा सकता है। इसी तरह से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व डीएमके के साथ भी अच्छे रिश्ते का पक्षधर है।
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केरल और आंध्र प्रदेश
केरल में भाजपा का खाता खुलने की संभावना कम है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को वोट प्रतिशत बढ़ने का पूरा भरोसा है। ऐसे में नतीजे को प्रभावी बनाकर खाता खोलने के लिए जरूरी प्रयास किए जा रहे हैं। केरल जैसी स्थिति ही आंध्र प्रदेश में है। सूत्र बताते हैं कि तेलुगु देशम पार्टी भले ही एनडीए से अलग होने का ऐलान कर रही हो लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के निजी रिश्ते काफी मधुर हैं। भाजपा को आंध्रप्रदेश में एक अच्छे सहयोगी की तलाश है। यह काम तेजी से चल भी रहा है। पार्टी के नेता कांग्रेस (वाईएसआर) के नेता जगन मोहन रेड्डी के संपर्क में हैं। जगन मोहन रेड्डी राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के लोकप्रिय नेता वाईएस राजशेखर रेड्डी के पुत्र हैं। जगनमोहन रेड्डी के सामने भाजपा के साथ आने पर दलित और अल्पसंख्यक वोट के बिदकने का खतरा है। इसी तरह से वह कांग्रेस के साथ भी दूरी बनाकर चल रहे हैं। भाजपा यहां नया पैंतरा अपना सकती है।
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कर्नाटक
भाजपा को सबसे अधिक उम्मीद कर्नाटक से हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को कर्नाटक में नई बनी सरकार कम जंच रही है। भाजपा के एक महासचिव का कहना है कि राज्य की अवसरवाद के बल पर बनी सरकार कभी भी गिर सकती है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह खुद कहते हैं कि कर्नाटक की सरकार को हमारी शुभकामनाएं, लेकिन वह सफलता पूर्व पांच साल का कामकाज पूरा करले तो बड़ी बात है। दरअसल भाजपा का आलाकमान मानकर चल रहा है कि कर्नाटक की सरकार कभी भी गिर सकती है। वहां कांग्रेस नेताओं के जद (एस) के साथ कामकाजी और सामान्य रिश्ते नहीं बन पा रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि कर्नाटक भाजपा के नेता राज्य में सत्ताधारी दल के असंतुष्ट नेताओं के साथ संपर्क में हैं। पार्टी के रणनीतिकारों कर्नाटक में बदला राजनीतिक घटनाक्रम हजम नहीं हो रहा है। आम चुनाव में यहां से लोकसभा की अच्छी खासी सीटें आने की संभावना है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 17 सीटें मिली थी। 9 कांग्रेस के और दो जद (एस) के खाते में गई थी। जबकि 2009 में यह आंकड़ा क्रमश: 19, 06 और 03 का था। भाजपा के नेताओं का अनुमान है कि यदि आम चुनाव से पहले कर्नाटक में कोई राजनीतिक फेरबदल हो जाता है तो पार्टी को 22-25 लोकसभा की सीटें मिल सकती हैं।
महाराष्ट्र
शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे चाहे जितनी तल्खी दिखाएं, लेकिन भाजपा वहां शिवसेना के साथ अपने संबंध बनाए रखने के पक्ष में है। अमित शाह भी चार के केंद्र सरकार के कामकाज के दौरान खुलकर कह चुके हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी शिवसेना से भाजपा के अलग होने का हिमायती नहीं है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि भाजपा और शिवसेना में दूरी से बहुत अच्छा संदेश नहीं जाएगा। इस तरह से शिवसेना के भाजपा अपने रिश्ते को मजबूत करने का प्रयास कर रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना को अच्छी सफलता मिली थी। जबकि कांग्रेस पार्टी और एनसीपी को महाराष्ट्र से करारा झटका लगा था। भाजपा को 18, शिवसेना को 16, एनसीपी को 4 और कांग्रेस पार्टी को दो सीट तथा एसडब्ल्यूपी को एक सीट से संतोष करना पड़ा था। 2019 का चुनाव एनसीपी और कांग्रेस मिलकर लड़ेगी। मोदी लहर भी कमजोर पड़ रही है, लेकिन इसके बावजूद भाजपा अपनी सीटों की संख्या में गिरावट नहीं देखना चाहती।
गुजरात
भाजपा यहां डैमेज कंट्रोल का कई फार्मूला अपना चुकी है, लेकिन जमीनी हालात में बड़ा बदलाव नहीं आ रहा है। माना जा रहा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह गुजरात में अधिक समय दे सकते हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में बड़े बदलाव के लिए प्रयासरत है। पिछले चुनाव में यहां से कांग्रेस का खाता ही नहीं खुला था, लेकिन विधानसभा चुनाव 2017 के नतीजे ने भाजपा आलाकमान के कान खड़े कर दिए हैं।
उत्तर भारत
पूरे उत्तर भारत में भाजपा की जोरदार मोदी लहर चली थी। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्सप्रदेश ने भाजपा के पक्ष में चौकाने वाले नतीजे दिए थे। शाह की कोर टीम 2019 को साधने के लिए यहां कड़ी मशक्कत कर रही है। इन राज्यों में प्लान-ए के साथ-साथ प्लान-बी की हर संभावना को अजमाने की पहल हो सकती है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को भी भरोसा है कि इन राज्यों में 2019 के चुनाव में एक बार फिर राज्य की जनता भजपा पर भरोसा जताएगी।
वह साफ कहते हैं कि अभी एक साल का समय है और तबतक हम अपनी कुछ कमी दूर कर लेंगे। पार्टी के रणनीतिकारों को इस बार उत्तर भारत में थोड़ा लड़ाई ज्यादा कठिन दिखाई दे रही है। लेकिन बताते हैं कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। सब ठीक हो जाएगा के पीछे भाजपा के रणनीतिकारों को विरोधी दलों के बीच में सर फुटव्वल होने और एक दूसरे की टांग खीचने जैसी स्थिति पैदा होने के पूरे आसार हैं।
उत्तर-पूर्व
असम और त्रिपुरा में भाजपा की सरकार है। मेघालय, मणिपुर में सहयोगी सरकार है। भाजपा की उम्मीद इस बार भी नार्थ-ईस्ट से है। चुनाव प्रचार के लिए काम करने वाले प्रोफेशनल्स की माने तो नार्थ-ईस्ट में भाजपा के लिए कोई अधिक मुश्किल खड़ी नहीं हुई है। बल्कि स्थिति पहले बेहतर है। त्रिपुरा का चुनाव हाल में हुआ है। वहां पार्टी के अच्छा करने की उम्मीद है। असम में भी नतीजे संतोषजनक आ सकते हैं।