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Hindi News ›   India News ›   2008 Malegaon blast: Mere suspicion can't replace real proof; no evidence for conviction, says court

Malegaon Blast: 'संदेह वास्तविक सबूत की जगह नहीं ले सकता, दोषसिद्धि के लिए कोई साक्ष्य नहीं', कोर्ट का फैसला

Thu, 31 Jul 2025 02:22 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Thu, 31 Jul 2025 02:22 PM IST
सार

29 सितंबर, 2008 को मुंबई से लगभग 200 किलोमीटर दूर स्थित इस कस्बे में एक मस्जिद के पास एक मोटरसाइकिल पर बंधे विस्फोटक उपकरण में विस्फोट हो गया था। धमाके में छह लोगों की मौत हो गई थी और 101 अन्य घायल बताए गए थे।

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2008 Malegaon blast: Mere suspicion can't replace real proof; no evidence for conviction, says court
NIA Court - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

सिर्फ शक वास्तविक सबूत की जगह नहीं ले सकताएक विशेष कोर्ट ने गुरुवार को 2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में सात आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि केवल संदेह वास्तविक सबूत की जगह नहीं ले सकता और मामले में दोषसिद्धि के लिए कोई ठोस या विश्वसनीय सबूत नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई भी धर्म हिंसा नहीं सिखाता। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। अदालत केवल धारणा के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहरा सकती।

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'यूएपीए के प्रावधान इस मामले पर लागू नहीं होते'
कोर्ट ने कहा कि यह साबित करने के लिए भी कोई सबूत नहीं है कि लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित ने अपने घर में विस्फोटक पदार्थ ले जाए या रखे थे या उन्होंने बम बनाया था। जज ने यह भी माना कि कठोर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के प्रावधान इस मामले पर लागू नहीं होते, क्योंकि इसके लिए अनुमति देने से पहले उचित विचार-विमर्श नहीं किया गया था।
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सात आरोपियों को किया बरी
कोर्ट ने गुरुवार को सात आरोपियों पूर्व भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित, मेजर रमेश उपाध्याय (सेवानिवृत्त), अजय राहिरकर, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी और समीर कुलकर्णी को बरी कर दिया। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के मामलों की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधीश एके लाहोटी ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि आरोपियों के खिलाफ कोई विश्वसनीय और ठोस सबूत नहीं है, जो मामले को संदेह से परे साबित कर सके।
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'आरोपियों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए'
अभियोजन पक्ष का तर्क था कि नासिक जिले के सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील मालेगांव शहर में मुस्लिम समुदाय को डराने के इरादे से दक्षिणपंथी उग्रवादियों ने यह विस्फोट किया था। अदालत ने अपने फैसले में अभियोजन पक्ष के मामले और की गई जांच में कई खामियों को उजागर किया और कहा कि आरोपियों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।



'सिर्फ शक वास्तविक सबूत की जगह नहीं ले सकता'
अदालत ने कहा, 'सिर्फ शक वास्तविक सबूत की जगह नहीं ले सकता।' उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी सबूत के अभाव में आरोपियों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए। न्यायाधीश ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि समग्र साक्ष्य अदालत में आरोपियों को दोषी ठहराने का विश्वास नहीं जगाते। दोषसिद्धि के लिए कोई विश्वसनीय और ठोस सबूत नहीं है। यह साबित नहीं हुआ है कि विस्फोट में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल प्रज्ञा ठाकुर के नाम पर पंजीकृत थी, जैसा कि अभियोजन पक्ष ने दावा किया था।


'साबित नहीं हो सका कि विस्फोटक मोटरसाइकिल में लगाया गया था'
अदालत ने कहा, 'अभियोजन पक्ष ने यह साबित कर दिया है कि विस्फोट हुआ था, लेकिन यह साबित नहीं कर सका कि विस्फोटक मोटरसाइकिल में लगाया गया था।' अभियोजन पक्ष के इस तर्क पर कि अभियुक्तों ने भोपाल और नासिक में कई बैठकों में भाग लिया था, जहां विस्फोट की साजिश रची गई थी? अदालत ने कहा कि किसी भी गवाह ने इसका समर्थन नहीं किया और इसलिए न तो बैठक और न ही रची गई साजिश साबित हो सकी।

कोर्ट ने यह भी कहा?
अदालत ने कहा कि हालांकि, यह साबित करने के लिए सबूत मौजूद हैं कि दक्षिणपंथी समूह 'अभिनव भारत' की ओर से धन वितरित किया गया था, लेकिन यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है कि इसका इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए किया गया था। कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसा लगता है कि पुरोहित ने इस धन का इस्तेमाल अपने घर के निर्माण में किया था। कोर्ट ने कहा कि यह साबित करने के लिए भी कोई सबूत नहीं है कि पुरोहित ने अपने घर में विस्फोटक पदार्थ पहुंचाए या संग्रहीत किए थे या उन्होंने बम तैयार किया था।

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