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26/11 हमला: पीड़ितों ने लिया आतंकियों से लोहा, कुछ को इंतजार है सहायता मिलेगी

Sat, 24 Nov 2018 12:15 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 24 Nov 2018 12:15 PM IST
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10 years of 26/11 mumbai blast- survivor speak
mumbai attack
वह 26 नवंबर 2008 की काली रात थी जब मुंबई अपनी मस्ती में चल रही थी और आतंकी इस चहल-कदमी को रोकने के लिए षडयंत्र रच अफरा-तफरी मचाने के लिए घुस चुके थे। आतंकियों ने दो-दो में बंटे थे और उन्होंने पांच गुट बनाया था। 
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महीनों पहले से रची गई इस साजिश का दर्द आज भी लोगों के जेहन को झकझोड़ रहा है। आतंकी सोची समझी साजिश के तहत यहूदी गेस्ट-हाउस नरीमन हाउस, सीएसटी, ताजमहल होटल, ट्राईटेंड, लियोपोल्ड कैफे की तरफ बढ़े और आतंक मचाया। अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले में 150 से लोग मारे गए थे। सैंकड़ों लोग प्रभावित हुए थे। कई लोगों की आंखों में आज भी उस दर्दनाक मंजर की यादें ताजा हैं।
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26 नवंबर को घटी उस हमले को आज दस साल बीत चुके हैं। इस हमले में दस आतंकियों में से नौ को मार गिराया गया था और अजमल कसाब को जिंदा पकड़ा गया था जिसे 2012 में फांसी पर लटकाया गया। 
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मैं घुटनों के बल चली और छुपी रही
सारिका उपाध्याय- आज भी तेज आवाज सुनकर घबरा जाती हैं। सारिका उस दिन को याद करते हुए कहती हैं कि वह और उनकी दोस्त रात के खाने के लिए लियोपोल्ड कैफे पहुंची थीं। उस भयानक रात को याद करते ही उनकी आंखों में आज भी एक अजीब सा भय दिखता है। वह उस भयावह रात को याद करते हुए बताती हैं कि कुछ रात के साढ़े नौ बजे होंगे, हमलोगों ने डिनर खाना शुरू ही किया था कि पीछे से गोलियां चलने की आवजें आईं। पहले मुझे लगा कि शॉर्ट शर्किट हुआ, फिर लगा गैंगवार है। लेकिन कुछ देर में चारों तरफ चीख-पुकार मच चुकी थी।

मैं घुटनों के बल पर चलती हुई कैफे के करीब बनी हुई सीढ़ियों के पीछे जा छुपी। तभी ग्रेनेड मेरे करीब फटा और मेरा शरीर छलनी हो गया। लेकिन मैं वहीं छुपी रही और अपने आस-पास लोगों को मरता हुआ देख रही थी। मैं बहुत डरी हुई थी लेकिन भाग्यशाली थी कि आतंकी उधर नहीं आए। मैं बेहोश हो चुकी थी। सारिका ने बताया कि वह करीब दो वर्षों तक बिस्तर पर रहीं। सारिका अपनी बेटे की सिंगल पैरेंट है। वह शुक्रगुजार हैं ताज ट्रस्ट कि जिन्होंने उनके बेटे की शिक्षा का पूरा खर्च ही नहीं उठाया बल्कि उनकी दवा और इलाज का भी पूरा खर्चा उठाया।
 

10 years of 26/11 mumbai blast- survivor speak
mumbai-attack
नहीं मिली सहायता आज तक 

सबीरा खान- शिक्षक हैं, अब 52 साल की हो  चुकी हैं। उनकी आंखों में उस 26 नवंबर की काली रात का नजारा आज भी ताजा है। वह बताती हैं कि उनकी टैक्सी में विस्फोट हुआ था और वह 20 फीट दूर जा गिरी थीं, उनका छोटा बेटा हामिद को भी काफी चोटें आईं थीं। वह कहती हैं मैं उस काली रात को कभी नहीं भूलूंगी। वह कहती हैं कि 26/11 का दंश आज भी उन्हें मार रहा है। पिछले हफ्ते भी उनका आठ ऑपरेशन हुआ है। उन्होंने बताया कि अभी तक उनके ईलाज में करीब 15 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं लेकिन सरकार ने सिर्फ दस हजार रुपये दिए हैं। 

सबीरा वंचित बच्चों को पढ़ाती हैं और करीब 8000 रुपये  महीना कमाती हैं। सबीरा मौजूदा और पिछली सरकार से काफी नाराज हैं यही नहीं वह कहती हैं कि मीडिया भी तभी हमारा हाल पूछने आती है जब मुंबई 26/11 की वर्षगांठ मनाती है। हमलोग आज भी वित्तीय सहायता के लिए लड़ रहे हैं।

मेरे सामने मेरी पड़ोसन और उसके बच्चे के परखच्चे उड़े
अब्दुल शेख- पेशे से रसोइया हैं। वह बताते हैं कि उस शाम वह अपने माजगांव स्थित घर के बाहर अपनी पत्नी और बेटे सोहेल के साथ बैठे हुए थे जब टैक्सी में धमाका हुआ। टैक्सी के परखच्चे उड़ गए थे। वह उस दिन को याद करते हुए कहते हैं मेरी पड़ोसन जरीना और उनकी बेटी कुछ देर पहले ही उस टैक्सी से उतरे थे, उन्होंने मुझसे कुछ चेंज मांगा था।

मेरे पास चेंज नहीं था। मैंने पैसे न होने की बात कही तब वह किसी और से लेने गईं। मैंने तब तक टैक्सी वाले से गाड़ी आगे बढ़ाने के लिए कहा। जरीना वापस आकर ड्राइवर को पैसे दे रही थी कि तभी टैक्सी में विस्फोट हुआ था। उस विस्फोट में जरीना, टैक्सी ड्राइवर सहित कई लोगों मारे गए थे।  

 

10 years of 26/11 mumbai blast- survivor speak
आतंकी कसाब
एएसआई जिसने आतंकियों से लिया लोहा

मोहन शिंदे- मुंबई पुलिस के एएसआई पद से रिटायर होने वाले मोहन शिंदे ने बताया कि वो उस समय आजाद मैदान पुलिस थाने में हेड कॉन्सटेबल के पद पर तैनात थे। जब आतंकी अबु इस्माइल और कसाब कामा अस्पताल में घुसने की कोशिश कर रहे थे, तब उन्होंने आतंकियों ने काफी देर तक बाहर ही उलझाए रखा, ताकि लोगों को अस्पताल से बाहर निकाला जा सके।

इस दौरान उन्हें गोली भी लगी। उन्होंने भी कई फायर किए, लेकिन आतंकी बच निकलने में कामयाब रहे। हालांकि इस मुठभेड़ में कांस्टेबल विजय खांडेकर और एसआई प्रकाश मोरे शहीद हो गए। इसके अलावा आतंकियों के हमले में एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे, पीआई विजय सालसकर और अतिरिक्त कमिश्नर अशोक कामते भी शहीद हो गए।  

टैक्सी के पीछे छुप कर बचाई जान

अनामिका गुप्ता- मुंबई हमले में बच निकलने वाली अनामिका गुप्ता ने बताया कि मैं उस समय अपने दोस्तों के साथ लियोपोल्ड कैफे में थी, तभी आतंकी कैफे में घुसे और बैग से हैंड ग्रेनेड निकालकर फेंक दिया। उसके बाद बंदूक निकालकर ताबड़तोड़ फायरिंग करने लगे। इस दौरान उनकी आंखें बंद थी, वो बिना देखे लगातार गोलियां बरसा रहे थे। इसी बीच मैं कैफे से बाहर की तरफ भागी और एक टैक्सी के पीछे जाकर छुप गई। करीब आधे घंटे के बाद एक आदमी मेरे पास आया और मुझे अपने कंधे पर उठाकर वहां से ले गया और सेंट जॉर्ज अस्पताल में भर्ती कराया। मुझे तीन गोलियां लगी थी। मुझे पूरी तरह अपने पैरों पर खड़े होने में तीन साल लगे। 

हर तरफ चीख और पुकार थी

भरत गुर्जर- कोलाबा के लियोपोल्ड कैफे में किचन सुपरवाइजर भरत गुर्जर ने बताया कि मैं कैफे के अंदर किचन में था, तभी एक जोरदार धमाके की आवाज सुनी। आतंकियों के ग्रेनेड हमले से मैं बुरी तरह घायल हो गया था और मैं 18 दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहा था। मुझे अच्छी तरह याद है, जब आतंकी लगातार गोलियां बरसा रहे थे, चारों तरफ धुंआ भर गया था। हर तरफ खून ही खून बिखरे हुए थे। लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे। मैं वो रात कभी नहीं भूल सकता। वो बेहद ही डरावना था।
 
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