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विचार: भूगोल को मात देता उत्तर प्रदेश
Fri, 15 May 2026 09:00 PM IST
Rahul Kumar
डॉ. अवनीश मिश्रा
डॉ. अवनीश मिश्रा
Published by: Rahul Kumar
Updated Fri, 15 May 2026 09:00 PM IST
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सीएम योगी।
- फोटो : अमर उजाला।
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'लैंडलॉक्ड' राज्य होना यानी समुद्र से कटा हुआ, बंदरगाहों से दूर, चारों ओर से भूमि से घिरा होना। यह स्थिति किसी समय विकास की राह में एक बेड़ी की तरह देखी जाती थी, लेकिन आज उसी उत्तर प्रदेश ने लीड्स (LEADS) 2025 की रैंकिंग में सर्वोच्च स्थान ‘एग्जेम्प्लर (Exemplar)’ यानी एक जीवंत मिसाल का दर्जा प्राप्त कर लिया है। यह उपलब्धि उस जिजीविषा का उद्घोष है, जिसने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे समुद्र जितने गहरे हों, तो तटों की अनुपस्थिति भी प्रगति के कदम नहीं रोक सकती।
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लैंडलॉक्ड होने का बोझ केवल मानचित्र पर नहीं, बल्कि आम उद्यमी की जेब पर भी पड़ता है। जब गुजरात का कोई व्यापारी अपना माल कांडला बंदरगाह पर उतारता है और सीधे जहाज़ में लदवा देता है, तो उसी काम के लिए उत्तर प्रदेश का व्यापारी पहले ट्रक से मुंबई तक, फिर बंदरगाह की लंबी कतारों में, और फिर कहीं जाकर जहाज़ तक पहुंचता है। इस पूरी यात्रा में समय लगता है, पैसा लगता है, और कभी-कभी माल की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। देश में लॉजिस्टिक्स लागत का सबसे कठिन बोझ लैंडलॉक्ड राज्यों पर ही पड़ता था। यही कारण है कि लंबे समय तक बड़े उद्योग तटीय राज्यों की ओर आकर्षित होते रहे और एक दशक पहले तक सरकारों ने इस राज्य को उसकी क्षमता के अनुरूप विकसित करने की दिशा में सोचा ही नहीं।
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प्रदेश की जीएसडीपी का 30 लाख करोड़ रुपये से आगे निकलना उस सोच का परिणाम है, जो लॉजिस्टिक्स को विकास की बुनियाद मानती है। एक्सप्रेस-वे केवल सड़कें नहीं हैं, वे उम्मीदों के राजमार्ग हैं। 2017 में प्रदेश के पास यमुना और आगरा-लखनऊ जैसे गिने-चुने मार्ग थे। आज प्रदेश के पास देश का सबसे बड़ा एक्सप्रेस-वे नेटवर्क है। पूर्वांचल, बुंदेलखंड और 594 किलोमीटर के गंगा एक्सप्रेस-वे ने दूरियों को समेट दिया है। जहां कभी किसान का ट्रैक्टर घंटों में कुछ किलोमीटर तय करता था, वहां अब रेफ्रिजरेटेड ट्रक रात भर में सैकड़ों किलोमीटर की दूरी पार कर लेते हैं।
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इस सपने को साकार करने में जो एक कड़ी सबसे अहम रही, वह है दादरी का मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स हब। दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर के साथ जुड़ा यह केंद्र उत्तर प्रदेश के लिए वह ‘आभासी बंदरगाह’ बन गया, जो भूगोल ने नहीं दिया था। यहां रेल, सड़क और हवाई मार्ग एक साथ आकर मिलते हैं। माल आता है, छंटता है, पैक होता है, और देश के किसी भी कोने या विदेश की ओर रवाना हो जाता है। निर्यात तत्परता सूचकांक में 2022 में सातवें पायदान पर खड़ा उत्तर प्रदेश 2024 में चौथे स्थान पर आ गया और आज लैंडलॉक्ड राज्यों में वह पहले नंबर पर है। इस छलांग के पीछे ज़मीन पर बिछाई गई इन्फ्रास्ट्रक्चर की वह नींव है, जिसे एक-एक ईंट रखकर तैयार किया गया।
लीड्स में सर्वोच्च रैंकिंग का महत्व इसलिए भी विशेष है, क्योंकि यह केवल सड़कों और गोदामों की गिनती नहीं करती, वह यह भी देखती है कि सरकारी प्रक्रियाएं कितनी सरल हैं, कारोबार करना कितना आसान है, और व्यापारी को कितनी पारदर्शिता मिलती है। उत्तर प्रदेश 2022, 2023 और 2024 में लगातार तीन वर्ष ‘अचीवर’ श्रेणी में रहा था और अब 2025 में वह सीधे ‘एग्जेम्प्लर’ की श्रेणी में छलांग लगा गया। यह प्रगति की रेखा नहीं, एक उड़ान है।
हालांकि आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश के सामने अनेक चुनौतियां भी हैं। लैंडलॉक्ड होने की मूलभूत सीमा समाप्त नहीं होगी, समंदर अब भी दूर है। लेकिन इस दूरी को मात दी जा सकती है। जब देश के अन्य लैंडलॉक्ड राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ अपनी लॉजिस्टिक्स नीतियां बनाएंगे, तो उनके सामने उत्तर प्रदेश का यह मॉडल एक दीपस्तंभ की तरह खड़ा होगा। ‘एग्जेम्प्लर’ का शाब्दिक अर्थ ही यही है- वह जो अनुकरण के योग्य हो, जो रास्ता दिखाए, जो दूसरों को यह विश्वास दे कि यह संभव है।
(अस्वीकरण: यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक डॉ. अवनीश मिश्रा डॉ. शकुंतला मिश्रा विश्वविद्यालय के पूर्व डीन हैं।)