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Hindi News ›   Events Coverage ›   Offering Namaz on Roads: A Matter of Law and Order, Not Religion

विचार: सड़क पर नमाज धर्म का नहीं, कानून-व्यवस्था का मुद्दा

Wed, 20 May 2026 06:59 PM IST
Rahul Kumar बृजलाल
बृजलाल Published by: Rahul Kumar Updated Wed, 20 May 2026 06:59 PM IST
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Offering Namaz on Roads: A Matter of Law and Order, Not Religion
सीएम योगी आदित्यनाथ - फोटो : अमर उजाला

अगर बिना लाग-लपेट मुझे अपनी बात कहनी हो तो पहले मैं पूछूंगा- मुख्यमंत्री के तार्किक बयान का आखिर विरोध क्यों?  क्या इस देश में नागरिक अधिकारों की रक्षा नहीं की जाएगी और कौन सा कानून यह अधिकार देता है कि सड़कों पर नमाज पढ़ी जाए? मैंने लंबे समय तक पुलिस अधिकारी का दायित्व निभाया है और कानून व्यवस्था की हजारों स्थितियां देखी हैं। इसलिए यह कहने में मुझे रंच मात्र भी हिचक नहीं कि सार्वजनिक सड़कों पर नमाज का मुद्दा न तो धर्म का है, न आस्था का, यह विशुद्ध रूप से कानून-व्यवस्था, अनुशासन और राज्य की संप्रभुता का प्रश्न है। मैं उत्तर प्रदेश सरकार और विशेष तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का धन्यवाद करना चाहूंगा, जिन्होंने धर्म के नाम पर होने वाली अराजकता पर अंकुश लगाया। उन्होंने जो रुख अपनाया है, वह न केवल संवैधानिक दृष्टि से सही है, बल्कि किसी भी सभ्य और विधि-सम्मत समाज को यह रुख अपनाना ही चाहिए।

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वोटबैंक की राजनीति में विरोध
तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों के बारे में मेरी यह धारणा रही है कि या तो वे भ्रमित हैं या फिर अपने वोटबैंक की राजनीति में न सच्चाई देखना चाहते हैं और न संविधान या कानून। ऐसे लोग मानवीय मूल्यों की भी अनदेखी करते हैं। क्या विरोध करने वालों ने कभी सोचा है कि एक एंबुलेंस जब किसी मरीज को लेकर जा रही हो और सड़क पर सैकड़ों लोग नमाज में बैठे हों, तो उस मरीज के परिजनों की क्या मनःस्थिति होगी? क्या उनकी पीड़ा कम महत्वपूर्ण है? क्या एक नागरिक, जो हिंदू, सिख, ईसाई या मुसलमान भी हो सकता है, जो उस सड़क से गुजरना चाहता है, उसका अधिकार किसी की सामूहिक धार्मिक गतिविधि से कमतर है?  यह प्रश्न असुविधाजनक हैं, लेकिन इनका उत्तर उन्हें देना होगा जो विरोध का झंडा उठाए घूम रहे हैं।
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स्वीकार नहीं तुष्टिकरण की राजनीति
भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता दोनों स्पष्ट हैं। सार्वजनिक मार्ग को बाधित करना एक दंडनीय अपराध है। ऐसे कार्य जो आम जनता के आवागमन में बाधा डालें, कानूनी रूप से प्रतिबंधित हैं। यह कानून किसी एक धर्म के लिए नहीं बना, यह सबके लिए है। इसका उल्लंघन करने वालों का यदि कोई राजनीतिक दल समर्थन करता है तो यह मान लिया जाना चाहिए कि इसके मूल में तुष्टिकरण ही है।  
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अतिक्रमण को मिला था सरकारी संरक्षण
मैंने उत्तर प्रदेश में वर्षों तक पुलिस सेवा की है। मैंने देखा है कि किस प्रकार धीरे-धीरे सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक अतिक्रमण होता है। पहले एक छोटा समूह एक कोने में नमाज पढ़ता है, फिर संख्या बढ़ती है, फिर सड़क का एक हिस्सा घिर जाता है, फिर पूरी सड़क। यह क्रमिक अतिक्रमण की प्रक्रिया है, जिसे प्रारंभ में ही न रोका जाए तो बाद में रोकना कठिन या असंभव जैसा हो जाता है। विडंबना यह कि उत्तर प्रदेश में पहले की सरकारों ने इस प्रवृत्ति को रोकने के बजाए, इसे संरक्षण देने का ही प्रयास किया। 

हनुमान गढ़ी के सामने इफ्तार का प्रयास
मैंने वह दिन भी देखा है जब सपा सरकार (स्व. मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली) में एक आईजी ने अयोध्या में हनुमान गढ़ी के ठीक सामने इफ्तार आयोजित करने का प्रयास किया और इसके लिए वहां के महंतजी को राजी भी कर लिया। लेकिन, एक कर्मठ, निष्ठावान आईपीएस अधिकारी जो वहां एसएसपी के रूप में तैनात थे, ने ऐसा नहीं होने दिया। अब जो लोग यह कह रहे हैं कि यह आदेश मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए है, उनसे मैं पूछना चाहता हूं कि क्या मस्जिदें नहीं हैं? क्या ईदगाहें नहीं हैं? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सुझाव दिया है कि जगह की कमी है तो शिफ्टों में नमाज पढ़ें। इसमें गलत क्या है?  यह एक व्यावहारिक और सम्मानजनक समाधान है। इसमें आपत्ति किसे है और क्यों है?  मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली और शिया धर्मगुरु मौलाना यासूब को तो इसमें कुछ भी गलत नहीं दिखाई देता और वह खुद मुस्लिमों से अपील कर रहे हैं कि सड़कों पर नमाज न पढ़ें। विरोध ऐसे लोगों को है, जो पूरे मुस्लिम समुदाय को अपने वोटबैंक के रूप में देखते हैं।  


धर्म की स्वतंत्रता असीमित नहीं
संविधान का अनुच्छेद-25 धर्म की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह असीमित नहीं है। संविधान यह भी कहता है कि यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन होगी। सड़क पर नमाज पढ़ना और यातायात बाधित करना निश्चित रूप से सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करता है। इसलिए जो लोग संविधान की दुहाई देते हैं, वे पूरा संविधान पढ़ें, केवल वह हिस्सा नहीं जो उनके एजेंडे के अनुकूल हो। मेरा स्पष्ट मत है कि योगी सरकार के इस निर्णय को दृढ़ता से लागू किया जाना चाहिए। कानून का राज स्थापित करना किसी के विरुद्ध नहीं होता, वह सबके पक्ष में, सबके हित में होता है।  

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक बृजलाल राज्यसभा सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक हैं।)

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