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विचार: उत्तर प्रदेश में कानून के शासन का नव-उत्कर्ष
Sat, 16 May 2026 10:41 PM IST
Rahul Kumar
बद्री प्रसाद सिंह
बद्री प्रसाद सिंह
Published by: Rahul Kumar
Updated Sat, 16 May 2026 10:41 PM IST
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सीएम योगी
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महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देते हुए कहा था- ‘दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति, दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः।’ अर्थात, यह दण्ड (कानून का शासन) ही है जो समस्त प्रजा पर शासन करता है और उनकी रक्षा करता है, जब सब सो जाते हैं, तब भी दण्ड जागता रहता है, इसीलिए विद्वानों ने दण्ड को ही धर्म का साक्षात स्वरूप माना है। इसी दार्शनिक आधारभूमि पर आज उत्तर प्रदेश में सुशासन का दंड देदीप्यमान हो रहा है। यह विडंबना ही थी कि एक राज्य जो अपनी विशाल भौगोलिक सीमाओं और सांस्कृतिक विविधता के कारण भारत की आत्मा कहा जाता है, लंबे समय तक अराजकता की धुंध में लिपटा रहा। इस अराजकता ने न सिर्फ यहां की सामाजिक समरसता को चोट पहुंचाई बल्कि आर्थिक प्रगति के पहियों को भी जाम कर दिया था। 'सुरक्षित यूपी' अब केवल एक राजनीतिक उद्घोष नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के उन शुष्क लेकिन ठोस आंकड़ों का जीवंत सच है, जो प्रति लाख जनसंख्या पर गिरती अपराध दर की गवाही दे रहे हैं।
लोकतंत्र में कानून व्यवस्था को अक्सर शासन के एक तकनीकी पहलू की तरह देखा जाता है- पुलिस, जेल, अदालत, और इनके बीच का सामंजस्य। परंतु यह दृष्टिकोण अधूरा है। कानून का शासन वास्तव में उस सामाजिक संविदा की अभिव्यक्ति है जो नागरिक और राज्य के बीच होती है। यह संविदा तब टूटती है, जब धन से कानून खरीदा जाने लगता है, जब पीड़ित थाने से निराश लौटते हैं, जब समाज में अपराधियों का भय बोलता है और जब किसी परिवार में महिलाओं, बेटियों को लेकर असुरक्षा का भाव घर करने लगता है। उत्तर प्रदेश में जो बदलाव आया, उसे समझने के लिए राजधर्म की उस मूल प्रतिज्ञा को याद करना होगा कि अपराधी की कोई जाति नहीं होगी, कोई धर्म नहीं होगा, कोई राजनीतिक संरक्षण नहीं होगा। माफिया की संपत्तियों पर बुलडोजर, गैंगस्टर एक्ट का कठोर अनुप्रयोग, और पुलिस को यह स्पष्ट संदेश कि राजनीतिक दबाव में आकर कानून से समझौता नहीं किया जाएगा, का मिलाजुला असर यह हुआ कि अपराधी वर्ग में पहली बार वह भय उत्पन्न हुआ जो न्यायपूर्ण राज्य के लिए अनिवार्य है।
आंकड़े भावनाओं से अधिक ईमानदार होते हैं, और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के नवीनतम आंकड़े इस बदलाव की निर्विवाद गवाही देते हैं। प्रति लाख जनसंख्या पर दर्ज यूपी की क्राइम रेट 180.2 है, जो राष्ट्रीय औसत 252.3 से काफी कम है। लेकिन इससे भी अधिक चौंकाने वाला है दोषसिद्धि का आंकड़ा...यह वह पैमाना है जो बताता है कि न्याय केवल कागजों पर नहीं, वास्तव में मिलता है। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में उत्तर प्रदेश की दोषसिद्धि दर 76.6 प्रतिशत है, देश में बड़े राज्यों में सर्वोच्च। पश्चिम बंगाल में यह मात्र 1.6 प्रतिशत और केरल में 17 प्रतिशत है। इसका अर्थ यह है कि उत्तर प्रदेश में किसी महिला के विरुद्ध अपराध करने वाले अपराधी के बचने की संभावना न्यूनतम है, जबकि खुद को 'प्रगतिशील' कहनेवाले कई राज्यों में 80 से 98 प्रतिशत अपराधी बिना दंड के छूट जाते हैं।
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डॉ. भीमराव अंबेडकर का मानना था कि लोकतंत्र तभी सफल होगा जब कानून सबके लिए समान होगा, चाहे वह सत्ता में बैठा हो या झोपड़ी में। उत्तर प्रदेश में पहली बार यह भाव व्यावहारिक रूप ले रहा है कि माफिया का नाम चाहे जितना रसूखदार हो, कानून उससे नहीं डरता। महिला सुरक्षा, जो किसी भी समाज की सभ्यता का मापदंड होती है, उस क्षेत्र में यह परिवर्तन विशेष रूप से अर्थपूर्ण है। जब कोई बेटी बिना डर के शिक्षा पा सके, बाजार जा सके, सपने देख सके, तो वह केवल कानून व्यवस्था की नहीं, पूरे समाज की जीत होती है।
परंतु इस विमर्श को केवल पुलिसिया दृष्टिकोण से देखना अधूरा होगा, क्योंकि कानून व्यवस्था और आर्थिक विकास का संबंध अन्योन्याश्रित है। कानून का शासन किसी भी राज्य की दीर्घकालिक समृद्धि का मूल निर्धारक होता है। जहां अपराध का भय होता है, वहां उद्यमिता का बीज नहीं पनपता। उत्तर प्रदेश में सुरक्षित वातावरण बनने के साथ ही निवेश की नई धारा बही है- एयरपोर्ट, एक्सप्रेसवे, डेटा सेंटर, रक्षा उत्पादन गलियारा आदि। ये सब तभी संभव होते हैं जब निवेशक को विश्वास हो कि उसकी संपत्ति और उसके कर्मचारी सुरक्षित हैं। सुरक्षा केवल नागरिक सुख नहीं, आर्थिक विकास की पूर्वशर्त है।
फिर भी अभी कई चुनौतियां हैं। पुलिस का आधुनिकीकरण, फॉरेंसिक साइंस का बढ़ता उपयोग और साइबर अपराधों से निपटने के लिए बनाए गए विशेष सेल, कानून व्यवस्था की नई ताकत हैं, लेकिन इन क्षेत्रों में आगे बढ़ने की अभी काफी संभावनाएं हैं। फिर भी सुरक्षा से समृद्धि तक की इस यात्रा ने जन विश्वास अर्जित कर लिया है।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक बद्री प्रसाद सिंह, पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं।)
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लोकतंत्र में कानून व्यवस्था को अक्सर शासन के एक तकनीकी पहलू की तरह देखा जाता है- पुलिस, जेल, अदालत, और इनके बीच का सामंजस्य। परंतु यह दृष्टिकोण अधूरा है। कानून का शासन वास्तव में उस सामाजिक संविदा की अभिव्यक्ति है जो नागरिक और राज्य के बीच होती है। यह संविदा तब टूटती है, जब धन से कानून खरीदा जाने लगता है, जब पीड़ित थाने से निराश लौटते हैं, जब समाज में अपराधियों का भय बोलता है और जब किसी परिवार में महिलाओं, बेटियों को लेकर असुरक्षा का भाव घर करने लगता है। उत्तर प्रदेश में जो बदलाव आया, उसे समझने के लिए राजधर्म की उस मूल प्रतिज्ञा को याद करना होगा कि अपराधी की कोई जाति नहीं होगी, कोई धर्म नहीं होगा, कोई राजनीतिक संरक्षण नहीं होगा। माफिया की संपत्तियों पर बुलडोजर, गैंगस्टर एक्ट का कठोर अनुप्रयोग, और पुलिस को यह स्पष्ट संदेश कि राजनीतिक दबाव में आकर कानून से समझौता नहीं किया जाएगा, का मिलाजुला असर यह हुआ कि अपराधी वर्ग में पहली बार वह भय उत्पन्न हुआ जो न्यायपूर्ण राज्य के लिए अनिवार्य है।
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आंकड़े भावनाओं से अधिक ईमानदार होते हैं, और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के नवीनतम आंकड़े इस बदलाव की निर्विवाद गवाही देते हैं। प्रति लाख जनसंख्या पर दर्ज यूपी की क्राइम रेट 180.2 है, जो राष्ट्रीय औसत 252.3 से काफी कम है। लेकिन इससे भी अधिक चौंकाने वाला है दोषसिद्धि का आंकड़ा...यह वह पैमाना है जो बताता है कि न्याय केवल कागजों पर नहीं, वास्तव में मिलता है। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में उत्तर प्रदेश की दोषसिद्धि दर 76.6 प्रतिशत है, देश में बड़े राज्यों में सर्वोच्च। पश्चिम बंगाल में यह मात्र 1.6 प्रतिशत और केरल में 17 प्रतिशत है। इसका अर्थ यह है कि उत्तर प्रदेश में किसी महिला के विरुद्ध अपराध करने वाले अपराधी के बचने की संभावना न्यूनतम है, जबकि खुद को 'प्रगतिशील' कहनेवाले कई राज्यों में 80 से 98 प्रतिशत अपराधी बिना दंड के छूट जाते हैं।
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डॉ. भीमराव अंबेडकर का मानना था कि लोकतंत्र तभी सफल होगा जब कानून सबके लिए समान होगा, चाहे वह सत्ता में बैठा हो या झोपड़ी में। उत्तर प्रदेश में पहली बार यह भाव व्यावहारिक रूप ले रहा है कि माफिया का नाम चाहे जितना रसूखदार हो, कानून उससे नहीं डरता। महिला सुरक्षा, जो किसी भी समाज की सभ्यता का मापदंड होती है, उस क्षेत्र में यह परिवर्तन विशेष रूप से अर्थपूर्ण है। जब कोई बेटी बिना डर के शिक्षा पा सके, बाजार जा सके, सपने देख सके, तो वह केवल कानून व्यवस्था की नहीं, पूरे समाज की जीत होती है।
परंतु इस विमर्श को केवल पुलिसिया दृष्टिकोण से देखना अधूरा होगा, क्योंकि कानून व्यवस्था और आर्थिक विकास का संबंध अन्योन्याश्रित है। कानून का शासन किसी भी राज्य की दीर्घकालिक समृद्धि का मूल निर्धारक होता है। जहां अपराध का भय होता है, वहां उद्यमिता का बीज नहीं पनपता। उत्तर प्रदेश में सुरक्षित वातावरण बनने के साथ ही निवेश की नई धारा बही है- एयरपोर्ट, एक्सप्रेसवे, डेटा सेंटर, रक्षा उत्पादन गलियारा आदि। ये सब तभी संभव होते हैं जब निवेशक को विश्वास हो कि उसकी संपत्ति और उसके कर्मचारी सुरक्षित हैं। सुरक्षा केवल नागरिक सुख नहीं, आर्थिक विकास की पूर्वशर्त है।
फिर भी अभी कई चुनौतियां हैं। पुलिस का आधुनिकीकरण, फॉरेंसिक साइंस का बढ़ता उपयोग और साइबर अपराधों से निपटने के लिए बनाए गए विशेष सेल, कानून व्यवस्था की नई ताकत हैं, लेकिन इन क्षेत्रों में आगे बढ़ने की अभी काफी संभावनाएं हैं। फिर भी सुरक्षा से समृद्धि तक की इस यात्रा ने जन विश्वास अर्जित कर लिया है।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक बद्री प्रसाद सिंह, पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं।)