महाकुंभ हादसा: न्याय और व्यवस्था की सही राह
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाकुंभ भगदड़ मामले पर सुनवाई के बाद 30 अप्रैल को स्पष्ट निर्देश दिए- मुआवजे के समस्त दावों का निपटारा 30 दिनों के भीतर जिला प्रशासन करेगा। न्यायिक आयोग का काम केवल भगदड़ के कारणों की जांच करना और भविष्य के लिए सुझाव देना है।
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गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर प्रयागराज में जब करोड़ों कंठ से ‘हर हर गंगे’ का उद्घोष उठता है, तो वह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं होता, वह भारत की आत्मा का स्पंदन होता है। महाकुंभ इस देश की उस अखंड आस्था का प्रतीक है जो सदियों से बहती आ रही है, जो राजाओं के उत्थान-पतन से नहीं डिगी, जो आक्रांताओं की तलवारों से नहीं टूटी। पिछले महाकुंभ में श्रद्धालुओं की संख्या ने तमाम रिकॉर्ड तोड़ डाले। ऐसे आयोजन में मौनी अमावस्या की उस रात भगदड़ में कई लोगों ने अपने प्रियजन खोए। उनका दर्द असली है, उनके आंसू असली है। इस दर्द को सरकार व न्यायपालिका, दोनों ने महसूस किया।
कहां है विसंगति?
न्याय की दुनिया में बार-बार एक बात दोहराई जाती है कि न्याय केवल होना नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। और वर्तमान में यही हो रहा है... खुली अदालत में, सबके सामने, पूरी प्रक्रिया के साथ। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाकुंभ भगदड़ मामले पर सुनवाई के बाद 30 अप्रैल को स्पष्ट निर्देश दिए- मुआवजे के समस्त दावों का निपटारा 30 दिनों के भीतर जिला प्रशासन करेगा। न्यायिक आयोग का काम केवल भगदड़ के कारणों की जांच करना और भविष्य के लिए सुझाव देना है। अब इसमें विसंगति कहां है?
प्रशासन को जिम्मेदारी सौंपना सही
जो लोग सवाल उठाते हैं, वस्तुतः वे न्यायिक प्रक्रिया को नहीं समझते या समझकर भी जानबूझकर गलत बता रहे हैं। मुआवजा जिला प्रशासन तय करे, इसमें गहरी समझ है। जिला प्रशासन वह इकाई है, जो जमीन पर है। जो हर पीड़ित परिवार की परिस्थिति जानती है। जो यह बता सकती है कि किस घर का कमाने वाला गया, किस परिवार में छोटे बच्चे हैं, किसके पास और कोई सहारा नहीं। कोई दूरस्थ समिति, कोई दिल्ली या लखनऊ में बैठा आयोग, वह यह संवेदनशील आकलन नहीं कर सकता। इसलिए कोर्ट ने यह जिम्मेदारी उन्हें सौंपी, जो सबसे करीब हैं। यह प्रशासनिक ठंडापन नहीं, यह व्यावहारिक संवेदनशीलता है।
विलंब नहीं निश्चितता
जांच को मुआवजे से अलग रखना, यह तो न्याय का बुनियादी सिद्धांत है। अगर एक ही संस्था जांच भी करे और मुआवजा भी तय करे, तो वह न्याय नहीं, सत्ता का एकाधिकार होगा। जांच अलग, मुआवजा अलग, ताकि पारदर्शिता रहे, जवाबदेही रहे, और किसी को शिकायत का कोई मौका न मिले। हाईकोर्ट ने डेडलाइन देकर एक अनिश्चितता को खत्म किया है। किसी भी हादसे में दावों के सत्यापन, तथ्य व दस्तावेज संकलित करने में समय लगता है। इसलिए जिला प्रशासन को मिली यह समय सीमा, ठोस और टिकाऊ जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया है।
सच सामने लाने के लिए आयोग
अब पीछे चलते हैं, 2025 महाकुंभ की उस रात, जब हादसा हुआ। देखना होगा कि सरकार ने क्या-क्या किया। तत्काल राहत और बचाव कार्य शुरू हुए। घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया। पीड़ित परिवारों से संपर्क किया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं स्थिति की निगरानी की। और सबसे महत्वपूर्ण.. एक स्वतंत्र न्यायिक आयोग का गठन। यह आयोग क्यों बनाया गया? इसलिए नहीं कि सच्चाई छिपाई जा सके, बल्कि इसलिए कि सच पूरी तरह, निष्पक्ष रूप से बिना किसी दबाव के सामने आए। जब आप किसी आयोग को उसकी रिपोर्ट आने से पहले ही ‘बेअसर’ घोषित कर देते हैं तो आप न्याय की मांग नहीं कर रहे, आप निष्कर्ष पहले ही तय कर रहे हैं। कोई 30 दिन की समय-सीमा को ‘देरी’ बताए तो मान लीजिए कि वह न्यायिक प्रक्रिया को नहीं समझता या निहित कारणों से समझना ही नहीं चाहता।
(ये लेखक रतन कुमार श्रीवास्तव के निजी विचार हैं। लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं।)