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युवाओं के फेफड़ों की सेहत पर बढ़ता खतरा, कम उम्र से किसी भी तरह के तंबाकू सेवन पर रोक जरूरी

Sun, 31 May 2026 12:03 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र डॉ अनिल कुमार सिंह, अमर उजाला
डॉ अनिल कुमार सिंह, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sun, 31 May 2026 12:03 PM IST
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India Youth Tobacco consumption Lungs Health disease Injurious to health news and updates
तंबाकू।
भारत में तंबाकू के खिलाफ लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं। सरकार सख्त नियम लागू कर रही है और तंबाकू उत्पादों पर बड़ी स्वास्थ्य चेतावनियां भी अनिवार्य कर दी गई हैं। लेकिन इन सबके बावजूद एक चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है देश का युवा काफी काम उम्र से ही धूम्रपान, हुक्का, वेपिंग की गिरफ्त में आ रहा है। 

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भारत में तंबाकू के खिलाफ लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं। सरकार सख्त नियम लागू कर रही है और तंबाकू उत्पादों पर बड़ी स्वास्थ्य चेतावनियां भी अनिवार्य कर दी गई हैं। लेकिन इन सबके बावजूद एक चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है देश का युवा काफी काम उम्र से ही धूम्रपान, हुक्का, वेपिंग की गिरफ्त में आ रहा है। 

आज के समय में तंबाकू सिर्फ सिगरेट तक सीमित नहीं रह गया है। हुक्का, वेपिंग और फ्लेवर्ड तंबाकू उत्पाद युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इन्हें अक्सर कूल या कम हानिकारक विकल्प माना जाता है, जबकि सच्चाई इससे बिलकुल अलग है। 

वैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि ई-सिगरेट्स  और वेपिंग डिवाइस में मौजूद हानिकारक रसायन और निकोटिन फेफड़ों और शरीर के समग्र स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं। निकोटिन की लत तेजी से लगती है और इससे बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो जाता है।

किसी भी तरह के तंबाकू सेवन से होने वाली निकोटिन निर्भरता एक गंभीर समस्या है। निकोटिन मस्तिष्क की रासायनिक संरचना को प्रभावित करता है और लत उत्पन्न करता है। किशोरावस्था में इसका प्रभाव और भी गहरा होता है, क्योंकि इस समय मस्तिष्क का विकास जारी रहता है। प्रारंभिक संपर्क से न केवल लत लगने का खतरा बढ़ता है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, एकाग्रता और दीर्घकालिक संज्ञानात्मक क्षमताओं पर भी प्रभाव डाल सकता है।

ट्रेंड बनता तंबाकू, बढ़ती चिंता 
एक पल्मोनोलॉजिस्ट के रूप में मुझे यह चिंता सताती है कि अब हम फेफड़ों की क्षति केवल लंबे समय से भारी धूम्रपान करने वालों में ही नहीं देख रहे हैं। इसके बजाय, हम युवा लोगों में फेफड़ों के स्वास्थ्य में कमी के शुरुआती संकेत देख रहे हैं, और उनमें से कई स्वयं को नियमित तंबाकू उपयोगकर्ता भी नहीं मानते। यह धारणा का अंतर गंभीर चिंता का विषय है।

हुक्का लाउंज, कैफे और सामाजिक आयोजनों में तंबाकू का सेवन अब एक “ट्रेंड और जीवनशैली  विकल्प” के रूप में देखा जा रहा है। फ्लेवर्ड तंबाकू उत्पाद और आकर्षक पैकेजिंग युवाओं को तेजी से अपनी ओर लुभा रहे हैं। आज के डिजिटल दौर में सोशल मीडिया पर तंबाकू और वेपिंग को “कूल” और “आधुनिक” जीवनशैली के रूप में दिखाया जा रहा है, जिससे युवा भ्रामक जानकारी का शिकार हो रहे हैं।

तंबाकू सेवन का असर सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं है। यह हृदय रोग, कैंसर (खासकर मुंह और फेफड़ों का कैंसर), श्वसन संबंधी बीमारियों और कई अन्य गंभीर रोगों से जुड़ा है। निष्क्रिय धूम्रपान भी उतना ही खतरनाक है, जिससे आसपास के लोग खासतौर पर बच्चे प्रभावित होते हैं।

प्रारंभिक युवावस्था की महत्वपूर्ण अवधि के दौरान मानव फेफड़ों को होने वाला कोई भी नुकसान चाहे वह धूम्रपान, धूम्रपान के संपर्क में आना या वैकल्पिक निकोटिन उत्पादों के उपयोग के माध्यम से हो उन्हें अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुंचने से रोकता है। यह क्षति मौन और अदृश्य रह सकती है, बिना किसी स्पष्ट लक्षण के। हालांकि, भीतर ही भीतर सूजन शुरू हो जाती है, जिससे समय के साथ फेफड़ों की कार्यक्षमता कम होती जाती है और आगे चलकर श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, जिनमें अस्थमा और प्रारंभिक क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) शामिल हैं। 
 

प्रारंभिक हस्तक्षेप का महत्व
समाधान समय पर, सक्रिय हस्तक्षेप में निहित है, केवल प्रतिक्रिया देने तक सीमित रहने में नहीं। तंबाकू के नुकसान पर बातचीत की शुरुआत स्कूलों, कॉलेजों और समाज के भीतर पहले ही की जानी चाहिए। स्वास्थ्य पेशेवरों को युवाओं की सक्रिय रूप से जांच करनी चाहिए, यहां तक कि उन लोगों की भी जो केवल कभी-कभार तंबाकू का उपयोग करते हैं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेशों को तंबाकू के आधुनिक रूपों के उपयोग को संबोधित करने और उनसे जुड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए विकसित होना होगा। जो व्यक्ति धूम्रपान कर रहे हैं और छोड़ना चाहते हैं, उन्हें अपने डॉक्टर से बात करनी चाहिए या राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम (NTCP) के तहत उपलब्ध सुलभ सरकारी नशामुक्ति सेवाओं का उपयोग करना चाहिए।

इसकी गंभीरता को समझते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने महत्वपूर्ण पहल की है। राज्य सरकार ने शैक्षणिक संस्थानों को पूरी तरह तंबाकू मुक्त बनाने के निर्देश जारी किए हैं। इसका उद्देश्य छात्रों को कम उम्र में तंबाकू के संपर्क में आने से रोकना है और स्कूल-कॉलेजों को सुरक्षित वातावरण प्रदान करना है।

तंबाकू मुक्त दिवस: सिर्फ एक दिन नहीं, एक जिम्मेदारी
इस समस्या के निवारण के लिए सिर्फ कानून बनाना काफी नहीं है। जागरूकता अभियानों को और प्रभावी बनाना होगा। स्कूल, कॉलेज और समुदाय स्तर पर शिक्षा कार्यक्रम चलाने होंगे। साथ ही अभिभावकों और शिक्षकों को भी बच्चों पर नजर रखनी होगी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भूमिका भी अहम है। समय पर जांच, काउंसलिंग और नशामुक्ति सेवाओं को मजबूत करना जरूरी है। 

फेफड़ों के स्वास्थ्य का ध्यान केवल किसी बीमारी के लक्षण दिखाई देने के बाद ही दिया जाए ऐसा ज़रूरी नहीं है. पारंपरिक तंबाकू-विरोधी संदेश, जो कैंसर जैसे दीर्घकालिक परिणामों पर केंद्रित होते हैं, अक्सर युवाओं पर उतना प्रभाव नहीं डालते, क्योंकि वे स्वयं को इन जोखिमों से दूर मानते हैं। जिस बात पर अधिक जोर देने की आवश्यकता है, वह है फेफड़ों के स्वास्थ्य, शारीरिक क्षमता और जीवन की गुणवत्ता पर इसका तात्कालिक और अपरिवर्तनीय प्रभाव।

विश्व तंबाकू निषेध दिवस हमें याद दिलाता है कि रोकथाम ही सबसे प्रभावी उपाय है। अगर आज सही कदम उठाए जाएं, तो आने वाली पीढ़ियों को तंबाकू के खतरे से बचाया जा सकता है। तंबाकू से दूरी सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है और यही जिम्मेदारी एक स्वस्थ भारत की नींव रख सकती है। 

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक डॉ अनिल कुमार सिंह चंदन इंस्टिट्यूट ऑफ़ रेस्पिरेटरी एंड स्लीप मेडिसिन, लखनऊ के चेयरमैन हैं।)
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