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जंजीर: ओरिजनल से तुलना की, तो कुछ हाथ नहीं लगेगा!

Fri, 06 Sep 2013 06:10 PM IST
हरि मृदुल
हरि मृदुल Updated Fri, 06 Sep 2013 06:10 PM IST
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Zanjeer movie review

काफी कुछ पुराना ही है। हीरो का नाम विजय। हीरोइन का नाम माला। मुख्य जोड़ी के अलावा दूसरे किरदारों की बात करें, तो भी वही शेर खान, वही तेजा और वही मोना।

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लेकिन एक पुरानी कहावत कि नाम में क्या रखा है? आखिरकार बोलता तो काम ही है। लेकिन अपूर्व लाखिया के निर्देशन में बनी रीमेक फिल्म 'जंजीर' से क्लासिकल होने की कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। यह विशुद्ध रूप से मनोरंजन के लिए बनाई गई फिल्म है, इसलिए इससे ज्यादा की मांग बेमानी है।
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दरअसल यह आज की 'जंजीर' है। साउथ की फिल्मों के पैटर्न पर तरह-तरह के मसालों से सजी। स्टाइलिश हीरो। स्मार्ट हीरोइन। मसखरा किस्म का विलेन। कहानी में आज का दौर दिखाने के बावजूद विश्वसनीय लगने जैसा कुछ भी नहीं।
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चालीस साल पहले रिलीज हुई फिल्म 'जंजीर' से इसकी तुलना का कोई मतलब ही नहीं है। अगर यह तुलना होगी, तो कुछ भी हाथ नहीं लगने वाला।

कहानी
कहानी एक एनआरआई लड़की माला से शुरू होती है, जो कि बॉलीवुड फिल्मों की दीवानी है और इन फिल्मों के जरिए ही हिंदुस्तान को समझने की कोशिश करती है।

माला एक शादी में शामिल होने अमेरिका से मुंबई आती है और यहीं फंस कर रह जाती है। दरअसल उसके सामने एक मर्डर हो जाता है और वह न चाहते हुए भी चश्मदीद गवाह बन जाती है। मामला ऑयल माफिया तेजा के अवैध कारोबार का है, जिसका सालाना टर्नओवर 1000 करोड़ का है।

इस माफिया के काले कारनामों का पर्दाफाश करने के उद्देश्य से एक अधिकारी सबूत जुटा रहा होता है कि उसकी हत्या कर दी जाती है। आए दिन होने वाले अपने ट्रांसफर के लिए चर्चित एसीपी विजय खन्ना को यह केस सुलझाना है, जो कि स्वभाव से ईमानदार और व्यवहार में दबंग है।

केस को सुलझाने के लिए चश्मदीद गवाह की बड़ी जरूरत है, लेकिन माला तो अमेरिका की उड़ान भरने की तैयारी में है। भला एसीपी विजय के रहते यह कैसे संभव है? वैसे भी हीरोइन अमेरिका के लिए उड़ जाएगी, तो हीरो अकेला फिल्म को कैसे संभालेगा!! पापा के बीसियों फोन आने के बावजूद हीरोइन मुंबई में ही रुक जाती है। जाहिर है कि ऐसे हालात में उसे हीरो से प्यार होना ही है...।

एसीपी विजय का किस्सा यह है कि वह जब आठ साल का था, तभी उसके माता पिता की हत्या कर दी जाती है। वह खुद अपने माता पिता की हत्या का चश्मदीद गवाह है। उसे इस हत्यारे की तलाश है। उसके दिमाग में हत्यारे की एक ऐसी निशानी फीड है, जो अक्सर उसके सपनों में कौंधती रहती है।

खैर, तेल माफिया तक पहुंचने के लिए वह लोकल लेवल के 'इज्जतदार' गुंडे शेर खान की मदद लेता है। जुबान के पक्के शेर खान से हीरो की भिड़ंत होती है, जो जल्द ही दोस्ती में तब्दील हो जाती है। यही शेर खान बाद में विजय के लिए ढाल बन जाता है और उसे मंजिल तक पहुंचाता है। कहानी में ट्विस्ट यह है कि एसीपी विजय को तेल माफिया के सरगना के रूप में माता पिता का हत्यारा भी मिल जाता है...।

अपूर्व लाखिया ने एक चलताऊ किस्म की मसालेदार फिल्म बनाई है। वही भारी भरकम डायलॉग। वही हीरो और विलेन की एक दूसरे को मात देने वाली चिर परिचित पैंतरेबाजी।

डॉयलॉग
खामोशी से काम करते करते तुम तो खामोश हो गए..., हिंदुस्तान में शेर और दोस्त दोनों की कमी है..., जो हाथ कंधे पर होते हैं, वही सबसे पहले गरदन तक पहुंचते हैं...जैसे घिसपिटे डायलॉग सिंगल स्क्रीन के दर्शकों से ताली जरूर बजवा सकते हैं, लेकिन कुछ नया चाहने वाले दर्शकों को पूरी तरह निराश कर देते हैं। ये पुलिस स्टेशन है, तेरे बाप का घर नहीं...जैसा चर्चित डायलॉग भी फुसफुसा ही साबित होता है।

अभिनय
अदाकारों के अभिनय की बात करें, तो विजय का किरदार राम चरण तेजा ने पूरे आत्मविश्वास के साथ निभाया है। उनमें साउथ के स्टारडम की ठसक साफ दिखती है, जो बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करती है। उनमें बॉलीवुड में जमने लायक टेलेंट फिलहाल नहीं दिखता।

प्रियंका चोपड़ा ने चुलबुली माला की भूमिका सहजता से निभाई है, लेकिन वे ओवर कॉन्फिडेंट नजर आई हैं। प्रकाश राज जरूर ध्यान खींचते हैं। एक दमदार विलेन के तौर पर बॉलीवुड में भी उनकी पहचान पुख्ता होती जा रही है। हर डायलॉग में म्याऊं म्याऊं करती मोना डार्लिंग के रोल में माही गिल चलताऊ हैं, तो शेर खान बने संजय दत्त काफी थके नजर आए हैं।

गीत संगीत
गीत संगीत में उल्लेखनीय जैसा कुछ नहीं है। पिंकी है पैसे वालों की... जैसा आइटम फिल्म की शुरूआत में ही खर्च हो जाता है। दूसरे गाने किसी काम के नहीं। वे मधुर संगीत से ज्यादा शोरगुल लगते हैं।


अंत में यही कि सिर्फ कहानी के लिए सलीम जावेद की जोड़ी को करोड़ों रुपए देने से बेहतर यही था कि उनसे ही स्क्रीन प्ले भी लिखवा लिया होता। फिल्म में नयापन होता, तो परिणाम भी कुछ अलग होता। मेहरा बंधुओं से इस मामले में बड़ी चूक हुई है।

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