तेरे बिन लादेन: दर्शकों को बांध नहीं पाती है फिल्म
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निर्माताः वॉकवाटर मीडिया
निर्देशकः अभिषेक शर्मा
सितारेः मनीष पॉल, प्रद्युम्न सिंह, सिकंदर खेर, पियूष मिश्रा, इमान क्रॉसन, अली जफर
रेटिंग **
दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकी सरगनाओं में शुमार ओसामा बिन लादेन को अमेरिकी सेना ने बराक ओबामा के इशारे पर मार गिराया, किसने देखा? कोई सुबूत? यहीं से अमेरिकी राष्ट्रपति की मुश्किलें शुरू हुईं और फिर सीआईए के लोगों को पता चला कि बॉलीवुड में एक फिल्म बनी थी, तेरे बिन लादेन। उसमें एक ऐक्टर बिल्कुल ओसामा जैसा दिखता था।
प्लान बना कि उसे ही लेकर उड़ा दिया जाए और पूरा सीन शूट कर लिया जाए। फिर फुटेज दुनिया के सामने पेश कर दिया जाए। दूसरी तरफ ओसामा के नेतृत्व के अभाव में भटके हुए आंतकी हैं। वह भी बॉलीवुड फिल्म के बारे में जान जाते हैं। उनका आइडिया है कि ओसामा के डुप्लीकेट को पकड़ कर वीडियो बनाएं और दुनिया को दिखाएं कि वह मरा नहीं जिंदा है। किसे मिलेगा ओसामा बिन लादेन का डुप्लीपेक्ट पद्दी सिंह?
निर्देशक अभिषेक शर्मा छह साल बाद अपनी लोकप्रिय फिल्म का सीक्वल लाए हैं जो कुछ हिस्सों में तो ठीक लगती है लेकिन कुल मिला कर बांध नहीं पाती।
आप देखते हैं कि कैसे एक फिल्म के सीक्वल का आइडिया तैयार होता है और उसे कैसे शूट किया जाता है। फिल्म अपनी कहानी और प्रस्तुति में टीवी धारावाहिकों के एपिसोड्स जैसी लगती है। अतः फिल्म वाला मजा नहीं आता। जिन्हें पिछली फिल्म पसंद आई थी, वही इससे थोड़ा जुड़ाव महसूस कर सकते हैं। अन्यथा बोर होंगे।
फिल्म में कॉमेडी वाली हंसी नहीं है
यहां कॉमेडी हंसाने वाली नहीं है, बल्कि खुद समझ कर हंसने वाली है। अपना दिमाग सिनेमाहॉल में साथ लेकर जाएं। अगर आप अमेरिकी राष्ट्रपति में दिलचस्पी रखते हैं तो ठीक है वर्ना सोच में पड़ सकते हैं कि क्या किसी सस्ती हॉलीवुड फिल्म के कलाकार जबरन यहां ढूंस दिए गए हैं? राष्ट्रपति के मुख्य सलाहकार के रूप में सिकंदर खेर जमे हैं लेकिन यह मौका आगे के दरवाजे खोलेगा, कहना मुश्किल है। ओसामा बिन लादन के रूप में प्रद्युम्न सिंह फिल्म डायरेक्टर बने मनीष पॉल पर भारी पड़ गए हैं।
प्रद्युम्न के किरदार पद्दी की सरलता आकर्षित करती है। जबकि मनीष टीवी और फिल्म समारोहों के मंचों पर जो करते दिखते हैं, उससे अलग यहां नजर नहीं आए। मेहमान अली जफर का रोल अगर थोड़ा सा बड़ा होता तो मनीष हाशिये पर ही चले जाते।
चूंकि ओसामा बिन लादेन को मरे पांच साल हो चुके हैं और विश्व परिदृश्य में उसकी प्रासंगिकता खत्म हो चुकी है, ऐसे में फिल्म फीकी च्युंगम चबाने जैसी लगती है। लेखक-निर्देशक ने इसे कहीं भी वर्तमान फलक से जोड़ने की कोशिश नहीं की। जबकि आतंकवाद दुनिया के लिए विमर्श और संघर्ष का सबसे बड़ा मुद्दा और मैदान है। किसी को ओसामा मुर्दा चाहिए और किसी को जिंदा, इस विषय को इतना अहम बना दिया कि मनीष, प्रद्युम्न और सिकंदर के अलावा बाकी कलाकारों से बिल्कुल एक्स्ट्रा जैसा बर्ताव हुआ।
फिल्म में पियूष मिश्रा, सुगंधा गर्ग, मिया उयेदा जैसे कलाकार जाया चले गए। फिल्म केवल इस लिहाज से दिलचस्प है कि आप जान पाते हैं कि कैसे घटनाक्रम किसी कहानी का सीक्वल पैदा कर देते हैं। हालांकि यह दिलचस्पी यहां जल्द खत्म हो जाती है क्योंकि आइडिया खूबसूरत कारीगरी के साथ कारगर ढंग से अंजाम तक नहीं पहुंच पाता।