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अंकल-आंटी के रोमांस के लिए देखें 'सिंघम रिटर्न्स'

Sat, 16 Aug 2014 08:40 AM IST
Updated Sat, 16 Aug 2014 08:40 AM IST
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singham returns film review

अगर आप चार दिन का वीकेंड मना रहे हैं और इसे उत्सव में बदलना चाहते हैं तो परिवार के साथ वक्त बिताएं। आज की व्यस्त और भागदौड़ भरी जिंदगी में एक साथ इतना वक्त संयोग से मिलता है।

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फिल्में तो हर हफ्ते आती हैं। उसमें भी ऐसी फिल्में कभी कभार आती हैं जो अवश्य देखने योग्य हों।

दुर्भाग्य से ‘सिंघम रिटर्न्स’ वह फिल्म नहीं है। सिंघम से आप दूर रह सकते हैं क्योंकि वह खास नया नहीं ऑफर करता। इसमें वह ‘एंटरटेनमेंट’ भी नहीं है, जिसके बारे में फिल्मकार दावा करते हैं कि हमारा तो धंधा ही यही है!
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अगर आप अजय देवगन के फैन नहीं हैं, उनकी बारीक और भावुक आंखों में डूब नहीं जाते और रोहित शेट्टी की कच्ची कहानियों ने पहले आपका मनोरंजन नहीं किया है तो ‘सिंघम रिटर्न्स’ आपको बहुत निराश करेगी।

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इस बार एक ‘बाबा’ है व‌िलेन

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इस मसाला फिल्म में नए के नाम पर यह है कि यहां मुख्य खलनायक कोई आतंकी, राजनेता, बिल्डर या बिजनेसमैन न होकर धर्म का धंधा करने वाला एक ‘बाबा’ है। इसी बात को लेकर कुछ हिंदू संगठनों ने आपत्ति की थी कि फिल्म में हमारे धर्म की छवि धूमिल की जा रही है।

इस बार बाजीराव सिंघम (अजय देवगन) मुंबई में है। उसका काम करने का अंदाज पुराना है। ऐक्शन वाला। वह कमिश्‍नर और मुख्यमंत्री से ऐसे बात करता है जैसे वे उसके जूनियर हैं! सिंघम के आगे दोनों मेमने बने रहते हैं।

एक राजनीतिक पार्टी चुनाव में नए-युवा उम्मीदवार खड़ा करना चाहती है, लेकिन पार्टी का एक वरिष्ठ नेता यह नहीं चाहता।

मानो कोई अंकल-आंटी रोमांस कर रहे हैं

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वह एक ‘बाबा’ (अमोल गुप्ते) की मदद से पार्टी के मुख्य विचारक आचार्यजी (अनुपम खेर) की हत्या करा देता है। इससे पहले सिंघम की टीम का एक पुलिसवाला भी बाबा का शिकार हो चुका है। बाजीराव दोनों की मौत का बदला लेता है।

फिल्म में चुनाव, कालेधन, बाबाओं की पोल खोल जैसी बातों को केंद्र में रखा गया है।

इन विषयों पर आप रोज टीवी और अखबारों में खबरें/बहस देखते हैं। उनसे मन न भरा हो तो सिंघम रिटर्न्स का आनंद उठा सकते हैं। अजय और करीना को साथ देख कर लगता है मानो कोई अंकल-आंटी रोमांस कर रहे हैं। गीत-संगीत भी याद रखने लायक नहीं है।

यह कहानी धीमी और बोरियत से भरी है। फिल्म के संवाद सुन कर आप खुद से कहने लगते हैं, ‘अता माझी सटकली’। अजय देवगन स्टार हैं। स्टार कभी न ऐक्टिंग करता है और न अंदाज बदलता है। करीना कपूर भी ऐक्टिंग नहीं करतीं।

कैमरा ऑन होते ही बस ‘ऑन’ हो जाती हैं। उन्हें ब्रेक लेकर सोचना चाहिए कि कैसी फिल्में करें? वर्ना यह उनके कैरियर की अंतिम घड़ियां हैं।

किरदार खास उत्सुकता पैदा नहीं कर पाते

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अमोल गुप्ते प्रभावित करते हैं, लेकिन बाबाओं के बारे में ऐसा कुछ नहीं है जो लोग अब नहीं जानते। अतः उनका किरदार खास उत्सुकता पैदा नहीं कर पाता। न ही उसे रोचक ढंग से लिखा गया है।

अनुपम खेर, जाकिर हुसैन और महेश मांजरेकर खाली स्थान भरने के लिए हैं। रोहित शेट्टी की इस फिल्म में न उनकी पिछली फिल्मों जैसे रंग हैं और न ऐक्शन। कॉमिक दृश्यों में भी वे गुदगुदा नहीं पाते। सिनेमा संवाद और सामाजिक-राजनीतिक बदलाव का एक शक्तिशाली माध्यम साबित हो सकता है।

लेकिन यह भी वंशानुगत राजनीतिक करने वालों की तरह ज्यादातर ऐसे हाथों में है जो इसे कला के नाम पर व्यवसाय की तरह चला रहे हैं। जिन्होंने इसे नकली और खोखला बना रखा है। सिनेमा को भी आजादी की जरूरत है और यह सिर्फ दर्शक दिला सकते हैं। अच्छे सिनेमा के पक्ष में खड़े होकर।

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