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Munjya Movie Review: हॉरर के जाल में दर्शकों को फंसाने की दयनीय कोशिश, ठीक से बस नहीं पा रही भूतों की दुनिया

Fri, 07 Jun 2024 03:58 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Fri, 07 Jun 2024 03:58 PM IST
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Munjya movie review by Pankaj Shukla Dinesh Vijan Stree Roohi Bhediya Sharvari Wagh Abhay Verma Dinesh Vijan
मुंजा रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
Movie Review
मुंजा
कलाकार
अभय वर्मा , शरवरी वाघ , मोना सिंह , सत्यराज और सुहास जोशी आदि
लेखक
योगेश चांदेकर, निरेन भट्ट
निर्देशक
आदित्य सरपोतदार
निर्माता
दिनेश विजन, अमर कौशिक
रिलीज:
7 जून 2024
रेटिंग
2/5

निरेन भट्ट और योगेश चांदेकर हिंदी सिनेमा में बीते 10 साल से सक्रिय लेखक हैं। योगेश चांदेकर की जोड़ी निर्देशक श्रीराम राघवन के साथ खूब जमती रही है। श्रीराम की फिल्म ‘अंधाधुन’ के अलावा उनकी ही देखरेख में बनी ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’ में भी योगेश की कल्पनाओं ने कैमरे के जरिये परदे पर कहानियों का चोला पहना। निरेन भट्ट ने गुजराती में बहुत काम किया है और हिंदी में ‘लव यात्री’, ‘मेड इन चाइना’ और ‘बाला’ जैसी फिल्मों में अपना ‘हुनर’ दिखाया। दिनेश विजन की भुतहा दुनिया में वह ‘भेड़िया’ के साथ जुड़े और योगेश इसके पहले श्रीराम के ही सहायक रहे राकेश सैन की हॉरर फिल्म ‘नानो सा फोबिया’ लिख चुके हैं। हॉरर फिल्मों का अपना एक व्याकरण होता है। दोनों लेखकों ने इसमें एक नया प्रयोग किया है फिल्म ‘मुंजा’ से। ये भी हिंदी सिनेमा में ही हो सकता है कि जिस फिल्म को जमाना अब तक ‘मुंज्या’ के नाम से जानता रहा, परदे पर उसका नाम ‘मुंजा’ निकले। फिल्म का हिंदी में भी एकाध पोस्टर आया होता तो शायद ये भ्रम नहीं रहता।

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Munjya movie review by Pankaj Shukla Dinesh Vijan Stree Roohi Bhediya Sharvari Wagh Abhay Verma Dinesh Vijan
मुंजा रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

ये विजन हैं, कुछ भी कर सकते हैं
लेकिन, हिंदी सिनेमा को भ्रम में काम करने की आदत है। इन दिनों फिल्मों के अपनी लागत जितनी रकम वसूलते ही उनके हिट हो जाने का पीआर हंगामा शुरू हो जाता है। ये कोई न तो पूछता है और न ही कोई बताता है कि जिस हिट फिल्म के ढोल पीटे जा रहे हैं, उसका कुल बजट कितना है और सिनेमाघरों तक फिल्म को पहुंचाने में कितनी रकम (लैंडिंग प्राइस) खर्च हुई है। और जो रकम फिल्म ने टिकट खिड़की पर कमाई है, उसमें निर्माता का हिस्सा कितना है? निर्माता दिनेश विजन की ‘भेड़िया’ समेत तमाम फिल्मों के साथ भी ऐसा हो चुका है और पूरी संभावना है कि फिल्म ‘मुंजा’ को भी दो हफ्ते बाद ही हिट करार दे दिया जाए। लेकिन, खुद को भ्रम में रखकर जीने की हिंदी सिनेमा की ये ऐसी अदा है जिसका दूसरा कोई उदाहरण पूरी दुनिया में टॉर्च लेकर तलाशने पर भी शायद ही मिले। फिल्म ‘मुंजा’ खत्म होने के बाद इसके ‘स्त्री’ और ‘भेड़िया’ की कहानी से जुड़े होने का प्रसंग आता है। संदर्भ अतृप्त आत्माओं का है और हिंदी सिनेमा के दर्शकों को तृप्त करने वाली एक हॉरर फिल्म का इंतजार ‘मुंजा’ के बाद भी अभी बना रहेगा।

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Munjya movie review by Pankaj Shukla Dinesh Vijan Stree Roohi Bhediya Sharvari Wagh Abhay Verma Dinesh Vijan
मुंजा रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

कोंकण की दंतकथा का फिल्मी विस्तार
फिल्म ‘मुंजा’ कोंकण क्षेत्र की एक दंतकथा पर आधारित है। कहानी ये है कि सनातन संस्कृति में वर्णित संस्कारों में से एक को पूरा करते समय एक ऐसे बालक की मृत्यु हो जाती है जिसे अपने से बड़ी उम्र की एक युवती से इकतरफा प्यार था। उसकी आत्मा अब अशांत है और उसे शांति तभी मिलेगी जब उसकी ‘इच्छा’ पूरी हो जाएगी। हैरी पॉटर जैसी शक्ल और बालों वाला बिट्टू उसे समझ आता है। वह बिट्टू के सहारे अपनी तलाश पूरी करने की फिराक में है और बिट्टू को भी अपने से बड़ी उम्र की बेला से इकतरफा प्यार है। है न पूरा फिल्मी ट्विस्ट? लेकिन, कहानी अभी फिर से उसी गांव जानी है, जहां मुंजा की असमय मौत हुई थी। जहां के एक पेड़ की दूर तक फैली जड़ों पर मुंजा का नियंत्रण है। बिट्टू की मम्मी (गुल्लक वाली नहीं) यहां भी बिट्टू को लेकर परेशान हैं। और, दादी? बस यही एक किरदार है जो पूरी फिल्म में दर्शकों को आखिर तक साधे रखने में सफल होता दिखता है।

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मुंजा रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

क्या ‘कटप्पा’ मारेगा मुंजा को?
अभय वर्मा और शरवरी वाघ की मुख्य जोड़ी वाली फिल्म ‘मुंजा’ अपनी कहानी और इसकी पटकथा में मात खाती है। शरवरी के पास फिल्म में करने को कुछ खास है नहीं और कहानी भुतहा कहानी होने से ज्यादा एक मनोवैज्ञानिक कहानी ज्यादा नजर आती है। बिट्टू के असामान्य हरकतें करते ही जैसे ही सामने वाला उसके नशीली दवाओं के असर में होने की शंका जाहिर करता है, सवाल ये उठता है कि ये सवाल करने वाले को आखिर इसका अनुभव कैसे है? सामान्य परिस्थितियों में तो घर के किसी ऐसे सदस्य को तुरंत डॉक्टर को दिखाने की ही बात आती है। लेकिन, यहां ‘कटप्पा’ भी तो हैं। साउथ सिनेमा तक फिल्म की धमक बने तो फिल्म में ‘बाहुबली’ में ये दमदार किरदार निभाने वाले सत्यराज को एक ऐसे किरदार में लिया गया है कि जिसे देखकर ही कोफ्त होती है।

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'मुंजा' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

सरपट नहीं दौड़े ‘शोले गर्ल’ वाले सरपोतदार
डरावनी कहानियों के नाम पर दर्शकों के सामने परोसी गई फिल्म ‘मुंजा’ एक अधपकी फिल्म है। ठीक वैसे ही जैसे इस भूतहा दुनिया की पिछली दो फिल्में ‘रुही’ और ‘भेड़िया’ रही है। दिनेश विजन और अमर कौशिक की जिद है कि ‘स्त्री 2’ के रिलीज होने तक वह ‘स्त्री’ फिल्म के प्रशंसकों को ऐसे ही छकाते रहेंगे और डरावनी फिल्मों की मरीचिका में लोगों को उलझाए रहेंगे। पूरी फिल्म देखने के बाद समझ आता है कि मराठी फिल्मों के दमदार निर्देशक आदित्य सरपोतदार आखिर ओटीटी के लिए ‘द शोले गर्ल’ जैसे कमाल की हिंदी फिल्म बनाने के बाद भी अपनी मर्जी की हिंदी फिल्में सिनेमाघरों के लिए क्यों नहीं बना पा रहे हैं? ‘थोड़ी थोड़ी सी मनमानियां’ उनकी पहली हिंदी फिल्म थी। उनकी एक और फिल्म सोनाक्षी सिन्हा और रितेश देशमुख के साथ ‘काकुडा’ नाम से बनकर तीन साल से रिलीज की राह देख रही है। निर्माता के विजन के आगे समर्पित निर्देशक के सामने विडंबना यही होती है कि वह अपनी मन की फिल्म बनाने से जैसे ही चूकता है, अपनी आगे की राह अपने लिए ही कठिन कर लेता है।

Munjya movie review by Pankaj Shukla Dinesh Vijan Stree Roohi Bhediya Sharvari Wagh Abhay Verma Dinesh Vijan
सुहास जोशी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

कलाकारों में अव्वल नंबर सुहास
अभय वर्मा की डरी सहमी सी कोशिश उनकी शख्सीयत जैसी ही है। समझ ही नहीं आता कि वह अभिनय कर रहे हैं या बस अपने जैसा ही एक किरदार बिट्टू बनकर किए जा रहे हैं। शरवरी वाघ का गाना आपने यूट्यूब पर देख ही लिया होगा। वैसी ही उनकी एक्टिंग भी है फिल्म में। मोना सिंह भी पूरी फिल्म में कहीं किसी एक दृश्य में भी वैसा असर नहीं छोड़ पाती हैं जिसके लिए उनकी पहचान छोटे परदे पर रही है। ले देकर मामला दादी और पोते के बीच निपटता है और सुहास जोशी ने दादी के किरदार में अपनी पूरी क्षमता लगा दी है। निर्देशक एन चंद्रा की फिल्म ‘तेजाब’ अगर आपको याद हो तो उसमें वह माधुरी दीक्षित की मां बनी थीं। अनुराग कश्यप की फिल्म ‘पांच’ उनकी आखिरी हिंदी फिल्म रही है। उनको परदे पर देखना अपने आप में अलग और संतोषदायी अनुभव है, काश कि फिल्म ‘मुंजा’ के बारे में भी ऐसा ही कहा जा सकता।

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