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Movie Review: सिनेमाई छूट लेने की कोशिश है ट्रैप्ड
रवि बुले
Updated Fri, 17 Mar 2017 12:09 PM IST
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trapped मूवी रिव्यू
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बड़े शहरों की अपनी समस्याएं हैं। कुछ वाजिब तो कुछ विचित्र। महानगर मुंबई में रिहायश की मुश्किलें हैं। रेल के डिब्बों जैसे कमरे। मोटा किराया। खड़ी-ऊंची इमारतें। पानी-बिजली की समस्या जुड़ जाए तो जीवन में साक्षात नर्क के दर्शन हो जाते हैं। फिल्म ट्रैप्ड का मुख्य किरदार ऐसे ही हालात में फंस जाता है।
उसे एक लड़की से प्यार हुआ है। वह जल्दी से शादी करके उसके साथ फ्लैट में रहना चाहता है। सुखी पारिवारिक जीवन की उम्मीद पाले युवक को गुमराह करके एक व्यक्ति स्वर्ग अपार्टमेंट्स की 35वीं मंजिल के फ्लैट में पहुंचा देता है।
इस पूरी इमारत में कोई नहीं रहता है। वहां शिफ्ट होने के अगले ही दिन युवक पाता है कि न तो यहां बिजली है और न पानी।
उस पर हादसा यह कि दरवाजे के ऑटोमैटिक ताले में चाबी बाहर लगी रह जाती है और तेज हवा से दरवाजा बंद हो जाता है।
अब न वह बाहर निकल सकता और न इतनी ऊंचाई से कहीं आवाज जा पाती है। जोरों से चिल्ला कर, बर्तन से रेलिंग पीट कर, कमरे का टीवी नीचे फेंक कर और बालकनी में बिस्तर-सोफा जलाकर भी वह किसी का ध्यान नहीं खींच पाता। बिजली के अभाव में फोन चार्ज नहीं होता और वह गुस्से में उसे तोड़ देता है।
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क्या वह यहीं बंद हुआ मर जाएगा? उसके पास खाना और पानी नहीं है। निर्देशक विक्रमादित्य ने हिंदी फिल्मों के हिसाब से नया विषय चुना है, जिसमें एक व्यक्ति कहीं अकेला फंस कर जीवन संघर्ष कर रहा है।
परंतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी फिल्में बनी और देखी-सराही गई हैं। विक्रमादित्य की ट्रैप्ड का फ्लैट स्क्रिप्ट में खेलने की काफी गुंजाइश देता है। मगर ऐसा होता नहीं। फिल्म आकर्षक ढंग से शुरू होती है, मगर आकर्षण को बरकरार नहीं रख पाती। कुछ समय तक परिस्थिति का तनाव बांधे रहता है परंतु जल्द ही कोशिशें रूटीन बन जाती हैं।
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उसे एक लड़की से प्यार हुआ है। वह जल्दी से शादी करके उसके साथ फ्लैट में रहना चाहता है। सुखी पारिवारिक जीवन की उम्मीद पाले युवक को गुमराह करके एक व्यक्ति स्वर्ग अपार्टमेंट्स की 35वीं मंजिल के फ्लैट में पहुंचा देता है।
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इस पूरी इमारत में कोई नहीं रहता है। वहां शिफ्ट होने के अगले ही दिन युवक पाता है कि न तो यहां बिजली है और न पानी।
उस पर हादसा यह कि दरवाजे के ऑटोमैटिक ताले में चाबी बाहर लगी रह जाती है और तेज हवा से दरवाजा बंद हो जाता है।
अब न वह बाहर निकल सकता और न इतनी ऊंचाई से कहीं आवाज जा पाती है। जोरों से चिल्ला कर, बर्तन से रेलिंग पीट कर, कमरे का टीवी नीचे फेंक कर और बालकनी में बिस्तर-सोफा जलाकर भी वह किसी का ध्यान नहीं खींच पाता। बिजली के अभाव में फोन चार्ज नहीं होता और वह गुस्से में उसे तोड़ देता है।
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क्या वह यहीं बंद हुआ मर जाएगा? उसके पास खाना और पानी नहीं है। निर्देशक विक्रमादित्य ने हिंदी फिल्मों के हिसाब से नया विषय चुना है, जिसमें एक व्यक्ति कहीं अकेला फंस कर जीवन संघर्ष कर रहा है।
परंतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी फिल्में बनी और देखी-सराही गई हैं। विक्रमादित्य की ट्रैप्ड का फ्लैट स्क्रिप्ट में खेलने की काफी गुंजाइश देता है। मगर ऐसा होता नहीं। फिल्म आकर्षक ढंग से शुरू होती है, मगर आकर्षण को बरकरार नहीं रख पाती। कुछ समय तक परिस्थिति का तनाव बांधे रहता है परंतु जल्द ही कोशिशें रूटीन बन जाती हैं।
जानें कैसा है राजकुमार राव की फिल्म 'ट्रैप्ड' का रिव्यू
'TRAPPED' के एक दृश्य में राजकुमार राव
फिल्म में नियमित रफ्तार नहीं दिखती। समय जहां ठहरा है, वहां कहानी छलांग लगाती है। तब ऐसा लगता कि रीयलिटी का रास्ता छोड़ कर निर्देशक सिनेमाई छूट ले रहा है। तार्किकता को भी कहीं-कहीं दरकिनार किया गया है।
फिल्म शौर्य (राजकुमार राव) के फ्रस्ट्रेशन और तोड़-फोड़ अधिक दिखाती है। शोर-शराबा ज्यादा है। शौर्य के जीवित रहने के संघर्ष में कुछ दृश्य विकृत हैं। निर्देशक ने एक समय के बाद दिन-रात का हिसाब नहीं रखा।
शौर्य का आखिरकार बंद फ्लैट से निकलना और फिल्म का अंत सपाट हैं। इंटरवेल नहीं है। अगर आप प्रयोगधर्मी सिनेमा के शौकीन हों तभी ट्रैप्ड देख सकते हैं।
वर्ना आप खुद को फंसा हुआ पाएंगे। राजकुमार राव ने जरूर अपने अभिनय से जान डाली है परंतु मोटवानी एक सीमा तक ही उनकी प्रतिभा का इस्तेमाल कर सके। राजकुमार की शाहिद और अलीगढ़ जैसी फिल्मों के प्रशंसक के रूप में आप उनसे ट्रैप्ड में संतुष्ट नहीं होते।
फिल्म शौर्य (राजकुमार राव) के फ्रस्ट्रेशन और तोड़-फोड़ अधिक दिखाती है। शोर-शराबा ज्यादा है। शौर्य के जीवित रहने के संघर्ष में कुछ दृश्य विकृत हैं। निर्देशक ने एक समय के बाद दिन-रात का हिसाब नहीं रखा।
शौर्य का आखिरकार बंद फ्लैट से निकलना और फिल्म का अंत सपाट हैं। इंटरवेल नहीं है। अगर आप प्रयोगधर्मी सिनेमा के शौकीन हों तभी ट्रैप्ड देख सकते हैं।
वर्ना आप खुद को फंसा हुआ पाएंगे। राजकुमार राव ने जरूर अपने अभिनय से जान डाली है परंतु मोटवानी एक सीमा तक ही उनकी प्रतिभा का इस्तेमाल कर सके। राजकुमार की शाहिद और अलीगढ़ जैसी फिल्मों के प्रशंसक के रूप में आप उनसे ट्रैप्ड में संतुष्ट नहीं होते।