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Movie Review: एक खटारा में सफर की तरह है फिल्म 'मशीन'
रवि बुले
Updated Fri, 17 Mar 2017 01:39 PM IST
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मश्ाीन
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-निर्माताः अब्बास-मस्तान/पैन मूवीज
-निर्देशकः अब्बास-मस्तान
-सितारेः मुस्तफा बरमावाला, कियारा आडवाणी, रोनित रॉय
रेटिंग *
कोई भी मशीन तभी सही चलती है जब सारे कलपुर्जे ढंग से काम करें। इसके लिए तेल-पानी- बिजली लगती है। अब्बास-मस्तान की मशीन का मूल आइडिया है, हीरो को संवेदनहीन मशीन की तरह पाला-पोसा गया है। वह हृदयहीन है। इसका नतीजा क्या होगा? इस विचार को अच्छी स्क्रिप्ट, अच्छे एक्टर, कर्णप्रिय संगीत और थ्रिल पैदा करने वाले दृश्यों जरूरत थी। परंतु यह कहीं नहीं दिखता। आप सवा दो घंटे तक ‘खटारा’ में सफर के एहसास से रू-ब- रू रहते हैं। मशीन की चर्चा हो रही थी कि निर्देशक जोड़ी के अब्बास बरमावाला के बेटे मुस्तफा इससे हीरो बनकर बॉलीवुड में आ रहे हैं।
अब्बास-मस्तान ने बाजीगर, सोल्जर से लेकर रेस सीरीज की कामयाब रोमांटिक थ्रिलर बनाई हैं। उम्मीद थी कि मुस्तफा के लिए भी वे ऐसी रोमांचक कहानी लाएंगे। परंतु फिल्म बेहद निराश करती है। मुस्तफा सुस्त दिखते हैं। उनमें वह बात नहीं, जो किरदार की मांग थी। कहानी का केंद्रीय आइडिया जहां उनसे हृदयहीन हीरो जैसा दिखने की मांग करता है, वहीं उनका चेहरा सरल और रूमानी झलक दिखाता है। उनका किरदार और हाव-भाव कनफ्यूज लगते हैं। आप सिर्फ यही आशा कर सकते हैं कि भविष्य में वह अपनी कमियों को दूर कर लेंगे।
देखें फिल्म ट्रैप्ड का फिल्म रिव्यू
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-निर्देशकः अब्बास-मस्तान
-सितारेः मुस्तफा बरमावाला, कियारा आडवाणी, रोनित रॉय
रेटिंग *
कोई भी मशीन तभी सही चलती है जब सारे कलपुर्जे ढंग से काम करें। इसके लिए तेल-पानी- बिजली लगती है। अब्बास-मस्तान की मशीन का मूल आइडिया है, हीरो को संवेदनहीन मशीन की तरह पाला-पोसा गया है। वह हृदयहीन है। इसका नतीजा क्या होगा? इस विचार को अच्छी स्क्रिप्ट, अच्छे एक्टर, कर्णप्रिय संगीत और थ्रिल पैदा करने वाले दृश्यों जरूरत थी। परंतु यह कहीं नहीं दिखता। आप सवा दो घंटे तक ‘खटारा’ में सफर के एहसास से रू-ब- रू रहते हैं। मशीन की चर्चा हो रही थी कि निर्देशक जोड़ी के अब्बास बरमावाला के बेटे मुस्तफा इससे हीरो बनकर बॉलीवुड में आ रहे हैं।
अब्बास-मस्तान ने बाजीगर, सोल्जर से लेकर रेस सीरीज की कामयाब रोमांटिक थ्रिलर बनाई हैं। उम्मीद थी कि मुस्तफा के लिए भी वे ऐसी रोमांचक कहानी लाएंगे। परंतु फिल्म बेहद निराश करती है। मुस्तफा सुस्त दिखते हैं। उनमें वह बात नहीं, जो किरदार की मांग थी। कहानी का केंद्रीय आइडिया जहां उनसे हृदयहीन हीरो जैसा दिखने की मांग करता है, वहीं उनका चेहरा सरल और रूमानी झलक दिखाता है। उनका किरदार और हाव-भाव कनफ्यूज लगते हैं। आप सिर्फ यही आशा कर सकते हैं कि भविष्य में वह अपनी कमियों को दूर कर लेंगे।
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अब्बास-मस्तान ने किया निराश
मश्ाीन
सबसे अधिक निराश अब्बास-मस्तान करते हैं क्योंकि आप उनसे बासी थ्रिल वाले सिनेमा की अपेक्षा नहीं करते। मुस्तफा के साथ यहां वे ‘बाजीगर’ (1993) को ही घुमा-फिरा कर बनाने की कोशिश करते हैं। कुछ नए के बजाय अपनी पुरानी फिल्मों के मसाले आजमाते हैं। जो कारगर नहीं हैं। रंश (मुस्तफा) और सारा (कियारा आडवाणी) संयोग से मिलते हैं। दोनों कॉलेज में स्टूडेंट और कार रेसिंग के खिलाड़ी है। चंद मुलाकात में वे प्यार में पड़ जाते हैं। सारा से दो अन्य क्लासमेट भी प्यार करते हैं और एक ही समय पर अलग-अलग हादसों में मारे जाते हैं। अरब-खरबपति पिता (रोनित रॉय) की बेटी सारा रंश को चाहती है। पहली ही मुलाकात में सारा के पिता रंश से प्रभावित होते हैं और चट मंगनी पट ब्याह हो जाता है। हनीमून पर नवदंपति की कहानी में मोड़ तब आता है जब रंश अचानक सारा को ऊंची पहाड़ी से घाटी में फेंक देता है!
आपको याद आता है कि बाजीगर में शाहरुख खान ने शिल्पा शेट्टी को ऐसे ही ऊंची इमारत से धक्का दिया था। जबकि अमीर बाप की बेटी उससे खूब प्यार करने लगी थी। इस घटना के बाद मशीन में ऐसे राज नहीं खुलते जो रोमांचित करे। फिल्म 1990 के दशक के फार्मूलों के साथ आगे बढ़ती है। आप और निराश होते हैं। कियारा आडवाणी में धोनीः अनटोल्ड स्टोरी की तरह ही यहां भी ऐसी बात नहीं दिखती कि उन्हें याद रखें। फिल्म में संगीत के नाम पर कुछ पुराने बढ़िया गानों के साथ बेसाख्ता छेड़छाड़ की गई है, जो कतई ‘मस्त’ नहीं लगती। मशीन समय, धन और फिल्मों से प्यार करने की इच्छा को नष्ट करती है।
आपको याद आता है कि बाजीगर में शाहरुख खान ने शिल्पा शेट्टी को ऐसे ही ऊंची इमारत से धक्का दिया था। जबकि अमीर बाप की बेटी उससे खूब प्यार करने लगी थी। इस घटना के बाद मशीन में ऐसे राज नहीं खुलते जो रोमांचित करे। फिल्म 1990 के दशक के फार्मूलों के साथ आगे बढ़ती है। आप और निराश होते हैं। कियारा आडवाणी में धोनीः अनटोल्ड स्टोरी की तरह ही यहां भी ऐसी बात नहीं दिखती कि उन्हें याद रखें। फिल्म में संगीत के नाम पर कुछ पुराने बढ़िया गानों के साथ बेसाख्ता छेड़छाड़ की गई है, जो कतई ‘मस्त’ नहीं लगती। मशीन समय, धन और फिल्मों से प्यार करने की इच्छा को नष्ट करती है।