फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Entertainment ›   Movie Review ›   movie review of dangal

फिल्म समीक्षाः जिद और जीत की फिल्म है दंगल, जरूरी काम की तरह देखें

Fri, 23 Dec 2016 02:51 PM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Fri, 23 Dec 2016 02:51 PM IST
विज्ञापन
movie review of dangal
-निर्माताः सिद्धार्थ रॉय कपूर/आमिर खान
विज्ञापन


-निर्देशकः नितेश तिवारी

-सितारेः आमिर खान, साक्षी तंवर, फातिमा सना शेख, सानिया मल्होत्रा

रेटिंग ****


न छोरियां छोरों से कम हैं और न आमिर दूसरे किसी खान से पीछे हैं। फिल्म की सीधी रेखा के साथ चलें तो यह भावनाओं का पारा उस ऊंचाई तक उठाती है जहां पैसा वसूल होने का एहसास जागता है। आप पाते हैं कि दंगल धाकड़ है। नोटबंदी के बाद आपने खुद को सिनेमाघर से दूर रखा है तो बेधड़क इसे देख सकते हैं। इमोशन, एक्शन, फैमिली और ड्रामे से एक कदम आगे यह देशभक्ति के जज्बे तक जाती है और अंत में जयोल्लास को समर्पित राष्ट्रगान की धुन बजती है तो आप सीट छोड़ सावधान की मुद्रा में खड़े होकर तिरंगे को सलाम करते हैं।

राष्ट्रवाद को समर्पित इस दौर में सफलता का इससे बेहतर पैमाना क्या हो सकता है? दंगल की कहानी ऐसे समाज में स्थित है जहां स्त्री अपनी भूमिका को सार्थक सिद्ध करने का संघर्ष कर रही है और एक पहलवान, पत्नी से बेटे की उम्मीद पाले है। उसे लगता है कि बेटा ही उसका सपना पूरा कर सकता है। 

विज्ञापन

छोरियां क्या छोरों से कम हैं?

movie review of dangal

सपना है, विश्व कुश्ती का स्वर्ण पदक। एक के बाद एक चार बेटियों से निराश पिता अचानक पाता है कि उसकी बेटियों ने बदतमीजी करने वाले कुछ छोरों को खूना-खून करके पीट दिया है। तब उसकी चेतना जागती है कि छोरियां क्या छोरों से कम हैं? वह बेटियों को पहलवान बनाने की जिद ठान लेता है और गांववालों के हंसी-ठठ्ठे के बीच उन्हें अखाड़े में उतारता है। दुनिया में हर नई शुरुआत पर हंसने वाला जमाना अंततः जिद और जीत को सलाम करता है। वही यहां होता है।

दंगल राष्ट्रीय स्तर के पहलवान महावीर सिंह फोगट और उनकी बेटियों गीता-बबीता के जीवन की घटनाओं से प्रेरित सिनेमा है। यह बताता है कि कैसे महावीर ने महिलाओं को चारदीवारी में कैद रखने वाले अपने समाज की सोच के विरुद्ध बेटियों को अंतरराष्ट्रीय पहलवान बनाया। गीता फोगट का नाम तब लोगों की जुबान पर चढ़ा जब उन्होंने दिल्ली में 2012 के राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता। इन खेलों में स्वर्ण जीतने वाली वह देश की पहली महिला पहलवान बनीं।

'दंगल' अपनी मिट्टी की फिल्म

movie review of dangal
दंगल फिल्म के टीजर का एक दृश्य

दंगल एक पिता के सपने और जिद का साकार होना है। हालांकि कई बार वह बेटियों की सेहत के लिए हानिकारक बापू लगता है मगर वह उन्हें ऊंचे मुकाम तक पहुंचा कर ही मानता है। आमिर शानदार परफॉरमेंस के साथ हैं।

कहानी की बुनावट ऐसी है कि वह जब पर्दे पर नहीं होते तब भी अदृश्य उपस्थिति दर्ज कराते हैं। उनके जैसा अभिनेता-सितारा बॉलीवुड में दूसरा नहीं है। पिता की चिंता, परेशानी, नाकामी और सफलता सब उनके चेहरे पर साफ आते हैं।

दंगल ‘अपनी मिट्टी की फिल्म’ है। ऐसी फिल्में ही बॉलीवुड की धड़कनें डूबने से बचा सकती हैं। गीता की भूमिका में फातिमा उपस्थिति दर्ज कराती हैं। बबीता बनी सानिया भी पीछे नहीं रहतीं। साक्षी तंवर छोटी मगर उल्लेखनीय भूमिका में है। नितेश तिवारी की कहानी सधी और निर्देशन कसा है। संगीत में थोड़ी कसर बाकी दिखती है मगर मुख्य विषय का उससे सीधा संबंध नहीं है।

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें Entertainment News से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। मनोरंजन जगत की अन्य खबरें जैसे Bollywood News, लाइव टीवी न्यूज़, लेटेस्ट Hollywood News और Movie Reviews आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed