Madgaon Express Review: दिव्येंदु ने फिर किया ‘इक्कीस तोपों की सलामी’ वाला काम, जानिए कौन बना कॉमेडियन नंबर वन
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फिल्म ‘मडगांव एक्सप्रेस’ से पहले एक बात और। एक स्टैंड अप कॉमेडियन हैं, रवि गुप्ता। उनके स्टैंड अप शोज से ज्यादा लोकप्रिय उनके वे ट्रैवेलॉग हैं जो वह इन दिनों सोशल मीडिया पर बेहद हंसोड़ अंदाज में अपलोड करते रहते हैं। ‘मडगांव एक्सप्रेस’ लिखने से पहले कुणाल को ऐसे ही कुछ फनी ट्रैवेलॉग जरूर देखने चाहिए थे। जैसा कि फिल्म का नाम है, ये फिल्म एक किस्म का ट्रैवलॉग ही ही। फरहान अख्तर और रितेश सिधवानी यात्राओं पर लिखी कहानियों पर फिल्में बनाने में कुछ ज्यादा ही उत्सुक रहते हैं। लेकिन, कभी डेविड धवन तो कभी दादा कोंडके की कथा शैली के बीच झूलती रहने वाली ‘मडगांव एक्सप्रेस’ न तो रोहित शेट्टी सरीखी ‘गोलमाल’ बन पाती है और न ही इंद्र कुमार जैसी ‘धमाल’। दर्शक बड़ी उम्मीदों से सिनेमाघरों में कदम रखते हैं कि शायद इस बार उनकी सैकड़ों लोगों के साथ बैठकर एक साथ ठहाके लगाने की तमन्ना पूरी हो जाएगी, लेकिन यहां तमन्ना नहीं नोरा फतेही हैं। उनके करीबी लोग बताते हैं कि मैडम को शादी से पहले आइटम नंबर गर्ल का टैग अपने नाम से छुटाना है। कोशिश वह कर भी खूब रही हैं इसकी।
तिवारी, गांधी और शर्मा की तिकड़ी की फिल्म है, ‘मडगांव एक्सप्रेस’। तीनों के किरदार साथ पढ़े हैं, साथ बिगड़े हैं, बस साथ में जवान नहीं हो पाए क्योंकि डोडो शुरू से गोली देने में उस्ताद है। आयुष और पिंकू को विदेश में काम मिल गया। दोनों वहां सैटल हो गए। डोडो मुंबई की एक चॉल में सोशल मीडिया पर सैटेल होता दिख रहा है, फोटोशॉप की हुई फोटोज का अंबार लगाकर। तीनों फिर मिलते हैं। बचपन से संजोए गोवा जाने के अपने सपने को पूरा करने के लिए तैयार होते हैं और गोवा पहुंचने से पहले ही ‘मालामाल’ हो जाते हैं, नहीं, ‘वीकली’ वाला नहीं। लावारिस बैग में मिली दौलत, पिस्तौल और होटल के कमरे की चाभी की कहानी इस फिल्म की कहानी का पूरा ‘कंकाल‘ बनती है। उसके ऊपर अच्छी लिखावट की बुनावट होती तो फिल्म सुंदर जरूर बन सकती थी लेकिन कुणाल ने फिल्म लिखी है, निर्देशित की है, इसका एक गाना भी लिखा है, उसका संगीत भी दिया है और शायद किसी ने बता दिया कि वह गाते अच्छा हैं तो फिल्म का एक गाना भी गा दिया है। किसी राजसी परिवार का दामाद बनने के बाद इतना ‘रुतबा’ तो बनता है ना!
लेकिन, कॉमेडी करते करते गीतकार, संगीतकार और गायक बन गए कुणाल जो असली काम इस फिल्म में करने निकले थे, वह कोकीन, कामकला और कोमड़ी में कहीं खो गया है। मुंबई से गोवा पहुंचे तीन युवाओं के अनजाने में कोकीन तस्करों की आपसी रंजिश में फंस जाने की कहानी कहती ‘मडगांव एक्सप्रेस’ की कॉमेडी उत्तर भारत के दर्शकों के लिए ‘एलियन’ है और मुंबई, गुजरात तरफ के लोगों के लिए घिसी पिटी। उनका निर्देशन बहुत औसत है। फिल्म में उनकी निर्देशकीय कल्पनाशीलता की बनागी कहीं नहीं मिलती। हां, कहीं कहीं वह प्रभावित करने की कोशिश करते हैं, मसलन कोमड़ी का अपने पति की बेइज्जती को लेकर एकदम से रौद्र रूप में आ जाने वाला दृश्य या फिर ताशा को देखते ही डोडो और आयुष का एकदम से सपने में चले जाने वाले दृश्य। लेकिन, इन दृश्यों में नयापन नहीं है। आम मुंबइया मसाला फिल्मों का कॉकटेल सरीखी दिखती फिल्म ‘मडगांव एक्सप्रेस’ अगर एक निर्देशक की काबिलियत जांचने को लगी परखी है तो बोरी का माल फिलहाल बहुच संतोषजनक नहीं है।
फिल्म ‘मडगांव एक्सप्रेस’ के सबसे सीनियर कलाकार 40 साल के हो चुके दिव्येंदु हैं। काम उन्होंने एक बार फिर ‘इक्कीस तोपों की सलामी’ वाला ही किया है। उनकी कॉमेडी की खासियत ये है कि वह इसे करने की कोशिश में परदे पर पकड़े जाते हैं। अविनाश तिवारी का डीलडौल ऐसा नहीं कि वह ऐसी कहानियों में खप सकें। माचो मैन की इमेज से निकलकर ‘चुपके चुपके’ लोगों को हंसा पाना हर एंग्री यंगमैन के बस का होता भी नहीं हैं। ले-देकर जो थोड़ी बहुत हंसी होठों तक आने की कोशिश में कहीं अटक कर रह जाती है, वह है प्रतीक गांधी के अभिनय में। वह नैसर्गिक कलाकार हैं। हास्य में उनको लेकर अच्छे किरदार लिखने की संभावना उन्होंने इस फिल्म में दिखाई है। नोरा फतेही के अभिनय के बारे में नहीं ही लिखते हैं क्योंकि अभिनय उनके बस का है नहीं। उपेंद्र लिमये यूं लगा कि ‘एनिमल’ के सेट से निकलकर सीधे यहीं शूटिंग करने आ गए। उनकी पत्नी और जवाबी गैंगवाली कंचन कोमड़ी बनीं छाया कदम ने पटकथा के हिसाब से बेहद लाउड एक्टिंग की है।
अंकुर तिवारी इन दिनों एक अलग ही ट्रिप पर हैं। लोग बताते हैं कि वह म्यूजिक की मेटगिरी करने लगे हैं। चूना डालकर मीटर बता देते हैं और बाजावालों को उसके हिसाब से दिन की दिहाड़ी पूरी करने लेने को बोल देते हैं। फिल्म ‘मडगांव एक्सप्रेस’ का संगीत ऐसा ही ही है, दिहाड़ी पूरी करने के लिए बनी धुनों जैसा। डायरेक्टर्स स्पेशल ‘हम यहीं’ पर अंकुर की खास मेहरबानी रही है और इसका काफिया और सरगम चारों तरफ से दुरुस्त है। आदिल अफसर की सिनेमैटोग्राफी कलरफुल है, आनंद सुबाया और संजय इंगले की एडिटिंग देखकर ऐसा लगता है कि ये हरकत स्टीनबेक (फिल्म एडीटिंग की रील के दौर वाली मशीन) पर की गई है। इस फिल्म से ज्यादा हंसी लोगों को इन दिनों रवि गुप्ता की ट्रैवेलॉग वाली रील्स पर आ रही है। लगता है कोई अंडरकवर एजेंट इस फिल्म की टीम में भी घुसकर सब तहस नहस कर आया है।
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