फिल्म समीक्षा/वेटिंग: मसाला फिल्मों से इतर एक शानदार कोशिश
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निर्माताः प्रीति गुप्ता-मनीष मूंदड़ा
निर्देशकः अनु मेनन
सितारेः नसीरूद्दीन शाह, कल्कि कोचलिन, रजत कपूर
रेटिंग ***
इंतजार करना किसको अच्छा लगता है? इंतजार में एक-एक घड़ी सदियों जैसी लगती है। शायरों-कवियों और कहानीकारों ने इस पर जाने कितना लिखा है। निर्देशक अनु मेनन की फिल्म में भी इंतजार है। मगर थोड़ा अलग। यहां इंतजार है अस्पताल में! कोई अपना आईसीयू में है। जिंदगी और मौत के बीच। यहां इंतजार के साथ एक अनजाना-अंधियारा डर है तो उम्मीद की किरण भी। दोनों के बीच झूलते किरदार हैं और जिंदगी को लेकर उनका नजरिया।
वेटिंग की कहानी एक पांच सितारानुमा अस्पताल में है, जहां प्रो.शिव नटराज (नसीरूद्दीन शाह) की पत्नी आठ महीने से कोमा में है। प्रोफेसर का मानना है कि एक ऑपरेशन पत्नी को वापस उनकी दुनिया में ला सकता है, मगर डॉक्टर (रजत कपूर) की राय जुदा है।
इसी अस्पताल में एक कार एक्सीडेंट के बाद तारा (कल्कि कोचलिन) के पति को लाया जाता है, जो गंभीर चोट से कोमा में है। उसके सिर में जमे गोल्फ की गेंद बराबर थक्के को अगर निकाला जाए तो वह बच सकता है। जी सकता है। मगर जिंदा रहने के बाद क्या वह हाथ-पैर हिला सकेगा? क्या अपने पैशन मैराथन दौड़ने और टेनिस खेलने के लायक रहेगा? ऐसा नहीं हुआ तो क्या वह अपनी लकवाग्रस्त जिंदगी कबूल कर सकेगा? अगर उसके मन का जीवन न हो तो जिंदगी बेकार नहीं? क्या उसे विदा करना ही बेहतर है!! यह तारा का द्वंद्व है।
नसीर और कल्कि ने अपने अभिनय से फिल्म को देखने योग्य बनाया
कहानी के दोनों अहम किरदार अपने जीवनसाथियों की जिंदगी को लेकर विपरीत छोर पर खड़े हैं। क्या होगा...? अनु मेनन ने खूबसूरती से शिव और तारा के द्वंद्व को साथ गूंथा है। कैसे वे एक-दूसरे के लिए सहारा बनते हैं और कैसे मतभेद उन्हें दूर करता है। दो विपरीत छोरों के बीच दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में जैसे नियति के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। एक अस्पताल के वेटिंग रूम में।
फिल्म में डॉक्टरों द्वारा तमाम गंभीर मामलों में ‘अगले 48 घंटे महत्वपूर्ण हैं’ जैसे जुमले का प्रयोग, इंश्योंरेंस कंपनियों के साथ डॉक्टरों के संबंध, रोगियों के प्रति उनके पेशेवर नजरिये पर टिप्पणियां भी हैं। आप यह भी देखते हैं कि व्यस्त जिंदगी में ऐन मौके पर लोग कैसे अकेले पड़ जाते हैं।
फिल्म में दो किरदारों की जिंदगी आर्थिक रूप से बहुत मजबूत है। अतः जिंदगी की यह सच्चाई फिल्मी लिहाज से गढ़ी हुई मालूम देती है। आम अस्पतालों की हालत और वहां अपनों के जीवन की आशा और मौत की आशंका के बीच इंतजार कितना बुरा है, यह वही जान सकता है, जिस पर गुजरी है। अगर आप इस एक बात को नजरअंदाज कर दें तो पंचतारा वेटिंग की संवेदनाएं सच्ची लग सकती हैं।
नसीर और कल्कि बेहतरीन कलाकार हैं। दोनों के अभिनय ने फिल्म को देखने योग्य बनाया है। निर्देशक ने अंत में कहानी के सिरे खुले छोड़ दिए हैं। जो दर्शक मसाला सिनेमा से इतर फिल्में देखने में रुचि रखते हैं, उन्हें यह इंतजार नहीं अखरेगा।