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शार्टकट रोमियोः पूरी तरह से उबा देगी फिल्म

Sat, 22 Jun 2013 09:16 AM IST
रोहित मिश्र
रोहित मिश्र Updated Sat, 22 Jun 2013 09:16 AM IST
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film review of shortcut romeo

'शार्टकट रोमियो' एक बेहद बचकानी और उबाऊ फिल्म है। फिल्म के पास न तो कहानी है, न ही स्क्रिप्ट है और न ही इस कहानी को अच्छी फिल्म में तब्दील करने की ईमानदारी। फिल्म किसी तरह से ढाई घंटे की बन जाए इसलिए कई सारे ऐसे अतार्किक दृश्य इसमें जोड़ दिए गए हैं जिनका फिल्म से कोई वास्ता ही नहीं है। तमिल फिल्म 'चिरुट्टू पयाले' की इस हिंदी रीमेक फिल्म का कथ्य इतना कमजोर है कि दर्शकों को एतबार ही नहीं होता कि वह मुख्य धारा की कोई फिल्म देख रहे हैं।

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सुशी गणेशन साउथ फिल्मों के जाने-पहचाने चेहरे हैं। हिंदी में यह उनकी पहली फिल्म है। फिल्म को देखकर नहीं लगता कि सुशी ने हिंदी दर्शकों का मिजाज समझने के लिए थोड़ी सी भी रिसर्च की है। बहुत जल्दबाजी में दो मिनट की मैगी स्टाईल में बना दी गयी यह फिल्म अपने किसी भी लम्हे में दर्शकों को अपने साथ नहीं जोड़ती। ताज्जुब इस बात का भी होता है अमीषा पटेल और नील नीतिन इतनी खराब ऐक्टिंग कर सकते हैं।
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बनाया वीडियो, फिर किया ब्लैकमेल

यह कहानी बेरोजगार और निट्ठले सूरज की है। अपने मां-बाप से लड़कर मुंबई अपने मामा के पास आया सूरज एक दिन गोल्फ के मैदान में एक महिला को किसी के साथ शारारिक संबंध बनाता देख लेता है। वह इसका वीडिया बना लेता है। वह महिला मोनिका (अमीषा पटेल) एक करोड़पति बिजनेसमैन की बीवी होती है। सूरज उसे ब्लैकमेल करना शुरू कर देता है।
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वह दो दिन में उसके क्रेडिट कार्ड से 75 लाख रूपए की शॉपिंग कर लेता है। मोनिका के ही खर्चे पर ही वह अपने दोस्तों के साथ केन्या घूमने जाता है। केन्या में ही उसे सीरी(पूजा गुप्ता) मिलती है। वह सीरी से प्यार कर बैठता है। इस बीच सीरी का अपहरण हो जाता है। सीरी का अपहरण मोनिका ने कराया होता है। इसके बदले वह शूट की गयी अपनी फिल्म का आखिरी वीडियो चाहती है।

सूरज उसे वीडियो दे देता है। बाद में पता चलता है सीरी दरअसल मोनिका द्वारा ही भेजी गयी लड़की होती है। बाद में जब सूरज सीरी से मिलता है तो सीरी उसे अपनी विवशता बताती है। आगे यह फिल्म सूरज के सीरी को बचाने और मोनिका से बदला लेने की बेहद घिसी-पिटी कहानी कहती है।

अच्छे कलाकारों का खराब अभिनय

यह देखकर ताज्जुब होता है कि अपनी पहली फिल्म 'जॉनी गद्दार' में बेस्ट डेब्यू का अवॉर्ड जीतने वाले नील नीतिन मुकेश को आखिर हो क्या गया है। इस फिल्म में उनके पास ब्रांडेड कपड़े पहनने, कुछ बिना मतलब के फाइट सीन करने के अलावा कुछ नहीं होता। फिल्म की स्क्रिप्ट और डायलॉग नेरेशन इतना सतही है कि उसमें कोई भी अच्छा कलाकार भी कमजोर नजर आएगा।

अमीषा पटेल हीरोईन नहीं लगतीं। फिर वह चाहें रोमांटिक गाने गाएं या फिर किसी का कत्ल करवाए। इस फिल्म में अमीषा का अभिनय साउथ पैटर्न वाली अभिनेत्रियों जैसा है। वह झटके से चहकने लगती हैं और अगले ही पल बड़े-बड़े आंसू बहाकर रो भी देती हैं।

पूजा गुप्ता ऐसी अभिनेत्री हैं जो किसी मल्टीस्टारर फिल्म में कई अभिनेत्रियों के साथ खप सकती है। सोलो हीरो साथ वह सोलो नायिका अभी हाल फिलहाल तो नहीं बन सकतीं।

बेहद कमजोर निर्देशन

इस फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी निर्देशन ही है। यदि कलाकारों ने खराब ऐक्टिंग की है। घटिया डायलॉग बोले हैं और खूब सारी ओवरऐक्टिंग की है तो इसके एकमात्र दोषी फिल्म के निर्देशक सुशी गणेशन हैं। वह इस फिल्म को बनाने के बाद यदि एक बार दर्शक के नजरिए से देख लेते तो शायद उन्हें खुद एहसास होता कि उन्होंने कितनी कमजोर फिल्म रची है।


सुशी इस फिल्म के लिए इतनी जल्दबाजी में दिखे हैं कि उन्होंने यह तक नहीं सूझा कि जिस घटना को वह कहानी का प्लाट बना रहे हैं यह दरअसल किसी हिंदी फिल्म की एक छोटी सी उपकथा भर हो सकती है। और माफ करें, बिगड़े हुए लड़के को रास्ते पर आते हुए दिखाने की कहानी देखने की हिम्मत अब दर्शकों में बची नहीं है।

एक गाना ठीक-ठाक

फिल्म का एक गाना "खाली सलाम दुआ" सुनने में अच्छा लगता है। इस गाने की फिल्मिंग भी बेहतर है। बाकी के गाने फिल्म की तरह की कहर सा बरपाते हैं।

क्यों देखे

यदि आप नील नीतिन मुकेश की कोई फिल्म न छोड़ रहे हों।

क्यों न देखें


अमीषा पटेल ने इस फिल्म में बहुत एक्सपोज किया है यह सोचकर फिल्म देखने न जाएं।

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